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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

रसाभास [ ३४६ श्रीमती राधारानी की एक सखी उनसे कहने लगी, "हे गान्धार्विके ! तू हमारे ग्राम की सबसे साध्वी युवती थी; परन्तु अब पूर्ण रूप से साध्वी नहीं रही । ऐसा कृष्ण को देखने और उसकी वंशी ध्वनि को सुनने से तुझ पर कामदेव के प्रभाव का ही परिणाम है ।" यह एक के अनेकों में रति से होने वाले उपरस का दृष्टान्त है । कतिपय विद्वानों के मतानुसार नायक-नायिका के भाव नाना प्रकार के रसाभासों को उत्पन्न करते हैं । "श्रीकृष्ण की दृष्टि पड़ने से गोपियाँ पवित्र हो गई हैं । ऐसी अवस्था में उनके शरीर पर कन्दर्प का प्रभाव स्पष्ट दीख रहा है ।" यद्यपि लौकिक दृष्टि से किसी युवक का किसी युवती को देखना दूषित समझा जाता है; परन्तु जब श्रीकृष्ण गोपियों पर अपनी दिव्य दृष्टि डालते तो वे पवित्र हो जातीं । भाव यह है कि श्रीकृष्ण परतत्त्व हैं और उनका प्रत्येक कार्य दिव्य और परम शुद्ध है । यमुनाजल में जिस समय श्रीकृष्ण कालिय नाग का शासन करने के लिये उसके सिरों पर नाच रहे थे तो कालिय की स्त्रियों ने श्रीकृष्ण से कहा, "अपनी मुरली ध्वनि से तुम क्यों हम नागकिशोरियों के चित्त का मन्थन कर रहे हो ।" कालिय की पत्नियाँ श्रीकृष्ण से ग्राम्यवार्ता कर रही थीं जिससे वे उनके पति को छोड़ दें । अतएव यह भी उपरस का लक्षण है । एक भक्त बोला, "हे गोविन्द ! यह रमणीय कैलास कुञ्ज है । मैं सुन्दर रमणी हूँ और हे माधव ! तुम विदग्ध हो । फिर इससे आगे और क्या कहना है, यह तुम ही सोचो ।" यह मधुररस में धृष्टतार्जनित उपरस का उदाहरण है । वृन्दावन से गुजरते हुए नारद मुनि ने भाण्डीर वन में एक वृक्ष के ऊपर उस तोते-तोती के जोड़े को देखा जो निरन्तर श्रीकृष्ण के साथ रहता था । वे दोनों वेदान्त दर्शन पर सुनी किसी वार्ता का अनुकरण करते हुए नाना प्रकार से वितण्डा कर रहे थे । यह देखकर नारद को बड़ा आश्चर्य हुआ और वे अपलक दृष्टि से देखने लगे । यह अनूरस का उदाहरण है । श्रीकृष्ण को युद्धभूमि से भागता देखकर दूर खड़ा चंचल नयनों वाला जरासन्ध बड़े गर्व का अनुभव कर रहा था । इस प्रकार विजय के अभिमानवश जोर-जोर से हँसने लगा । यह अपरस का उदाहरण है । श्रीकृष्ण से सम्बन्धित सम्पूर्ण भाव, भावाभास तथा रसाभास रस ही माने गये हैं । सारे कुशल भक्तों के मत में जो कुछ भी श्रीकृष्ण के प्रेम को उद्दीप्त करे वह दिव्यरस है ।

विज्ञप्ति श्रील रूपगोस्वामी अपने ग्रन्थ का उपसंहार करते हुए कहते हैं कि ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’ साधारण मनुष्यों के लिये समझने को अति दुरूह है। परन्तु उनकी अभिकांक्षा है कि सनातनस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण उनकी इस रचना से सन्तुष्ट हों। श्रील रूपगोस्वामी ने ‘श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु’ को गोकुल वृन्दावन में अनुमानतः १५५२ में समाप्त किया। संसार में अवस्थिति के काल में श्रील रूपगोस्वामी वृन्दावन के नाना भागों में रहा करते थे और उनका मुख्यालय वृन्दावन धाम के राधादामोदर मन्दिर में था। श्रील रूपगोस्वामी की भजनस्थली आज भी विद्यमान है। राधादामोदर में दो अलग-अलग स्तूप हैं। उनमें से एक को उनकी भजनकुटि कहा जाता है और दूसरी में उनकी समाधि है। इस समाधि के ठीक पीछे मेरी अपनी भजनस्थली है। परन्तु १६६५ से मैं वहाँ नहीं हूँ। अब मेरे शिष्य उस स्थान की देखभाल कर रहे हैं। श्रीकृष्ण की इच्छा से अब मैं अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ के लॉस एंजिल्स मन्दिर में निवास कर रहा हूँ। यह तात्पर्यप्रकाश आज ३० जून, १६६६ को समाप्त हुआ। इति भक्तिरसामृतसिन्धौ गौणभक्तिरसादिनिरूपणनामा उत्तर विभागः॥ इति भक्तिवेदान्त भाष्ये उत्तर विभागः ॥४॥ ॥इति श्रीभक्तिरसामृत सिन्धुः॥

भूमिका [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] ॥ [अस्पष्ट श्लोक पाद / पाठ] ॥ ॥ [अस्पष्ट श्लोक पाद / पाठ] ॥ ॥ [अस्पष्ट श्लोक पाद / पाठ] ॥

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भक्तिरसामृतसिन्धु की रचना श्रील रूप गोस्वामीने आज से प्रायः ५०० वर्ष पहले की थी। इस ग्रन्थ में उस विज्ञान का पूरा वर्णन है जिसके द्वारा दिव्य सेवाभाव में भगवान् से तुरन्त योग प्राप्त किया जा सकता है। भक्तियोग भगवत्प्राप्ति का सर्वोत्कृष्ट साधन तो है ही, साथ-साथ सरल और उदात्त भी है। आज के युग में यह के युग में यह सब के लिए बना। श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद