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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

भूमिका [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] ॥ [अस्पष्ट श्लोक पाद / पाठ] ॥ ॥ [अस्पष्ट श्लोक पाद / पाठ] ॥ ॥ [अस्पष्ट श्लोक पाद / पाठ] ॥

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भक्तिरसामृतसिन्धु की रचना श्रील रूप गोस्वामीने आज से प्रायः ५०० वर्ष पहले की थी। इस ग्रन्थ में उस विज्ञान का पूरा वर्णन है जिसके द्वारा दिव्य सेवाभाव में भगवान् से तुरन्त योग प्राप्त किया जा सकता है। भक्तियोग भगवत्प्राप्ति का सर्वोत्कृष्ट साधन तो है ही, साथ-साथ सरल और उदात्त भी है। आज के युग में यह के युग में यह सब के लिए बना। श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद