भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 126, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें११६ भक्तिसुधा वर्णनमें प्रयत्नशील होतीं। किंतु वेणुनाद महा-मोहनमन्त्र है, उससे वे मूर्च्छित हो जातीं। कथंचित् भगवत्कृपासे लब्धावस्थिति होकर पुनः वेणुगीत सुनती हैं। नाद तो नादमात्र है, गीतमें कुछ अर्थ होता है। अतः वेणुगीतार्थ श्रीकृष्ण व्रजांगनाओंके हृदयमें, अन्तःकरणमें, अन्तरात्मामें अभिव्यक्त होते हैं। फिर वे वर्णनकी चेष्टा करतीं और पुनः स्मरणसे मूर्च्छित होती हैं। पहले वेणुनादसे मूर्च्छित, फिर उसके उद्गमस्थान श्रीकृष्णचन्द्रके स्मरणसे मूर्च्छित, फिर गीतार्थानुभवसे मोहित होती हैं। अन्तमें जब वर्णन करना चाहतीं तो विक्षिप्तमनस्का होकर न कर सकतीं। उनकी इस अशक्तिको देखकर तन्मयावस्थाप्राप्त शुक ही स्वयं वर्णन करते हैं। इसमें हेतु यह कि यहाँ यह शुकवाक्य है। यदि गोपियोंका वर्णित होता तो 'गोप्य ऊचुः', ऐसा लिखते। वैसा न होनेसे स्पष्ट है कि लीलारसभावापन्न होकर गोपांगनाभावापन्न श्रीशुक स्वयं कहते हैं- 'इति वेणुरवं राजन्', दूसरा भाव यह है कि राजाको सम्बोधितकर शुकदेव कहते हैं कि व्रजांगनाओंके मनमें क्षोभ क्यों हुआ ? श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दका यादृश स्वरूप अभिव्यक्त होकर क्षोभकारक हुआ, वह है- 'बर्हापीडं' इत्यादि। ऐसे उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक स्वरूपका हृदयमें अनुभव करनेसे उनका हृदय स्मरवेगसे क्षुब्ध हुआ। अतः कहा गया है- 'यादृशं स्वरूपं मनःक्षोभकरं जातं तादृशमाह- बर्हापीडमिति।' इसीलिये भावुक कहते हैं कि श्रीशुक अन्तर्लीला-निविष्ट हैं, साक्षात् श्रीवृषभानुनन्दिनीके नित्यनिकुंजमें रहनेवाले हैं। उन्हींका यह अवतारविशेष है, जिनको श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीकृष्णका नाम पढ़ाती हैं और श्रीकृष्ण भी जिनको वृषभानुनन्दिनीका नाम पढ़ाते हैं। अतः ये लीलारसका प्रत्यक्ष आस्वादन करते हुए वर्णन करते थे। फिर भी उन्होंने अधिकारानुसार ही गुप्त शब्दोंमें वर्णन किया- 'इति वेणुरवम्।' यहाँ 'र' से अग्निबीज विप्रयोगात्मक शृंगार और 'व' से अमृतबीज संयोगात्मक शृंगार विवक्षित है। वह 'सर्वभूतमनोहरम्' है। श्रीजीवगोस्वामी कहते हैं कि यहाँ भूतपदसे चेतनाचेतन, स्थावर- जंगम सब लेना और मनोहर पदकी लक्षणा विकारकारी अर्थमें करनी चाहिये। वेणुरव-श्रवणका प्रभाव इस वेणुरवने सर्वप्राणिमात्र, चेतनाचेतनोंमें विकार उत्पन्न कर दिया। कहा है कि 'अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणाम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१९) जो गतिमान् थे, वे निश्चल हो गये, यमुनाका प्रवाह रुक गया, पर्वत-पाषाण द्रवित होकर बह चले। इसलिये यह मनोहर पद विकारकारीमें पर्यवसायी है। अतः स्थावर-जंगम सब क्षुब्ध हो उठे- 'श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वाः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।६) अन्य जगह क्षोभ तो हुआ ही, पर अधिक श्रीव्रजांगनाओंमें हुआ। वहाँ उसने अपना अत्यन्त पराक्रम व्यक्त किया। जहाँ चेतनाचेतनोंतक क्षोभ पहुँचा, फिर व्रजके लोगोंकी क्या कही जाय ? एक तो सबके मनको हरनेवाला, फिर जो प्रेमका प्रधानस्थान, वहाँ उसके प्रभावका कहना ही क्या है ? भक्ति वृद्धा होकर सर्वत्र घूमती हुई जहाँ आकर युवती हो गयी, जो भक्तिका परम दिव्य क्षेत्र है—चाहे ऊपरसे वह भले ही नीरस भूमि मालूम हो, पर अन्तरंग रूपसे अत्यन्त स्निग्ध और सरस है, उस व्रजके मनुष्य, उनमें भी स्त्रियाँ, जिनका हृदय अत्यन्त कोमल होता है और उनमें भी श्रीव्रजांगनाएँ, जिन्होंने उस मनोहर वेणुरवका श्रवण किया; उन कान्तभाववती और सख्यभाववती सौभाग्यवतियोंपर उसका विशेष प्रभाव पड़ा। किनपर प्रभाव पड़ा ? सबपर— 'सर्वाः।' इस पदसे नित्या, साधनसिद्धा आदि पूर्णतम, पुरुषोत्तम, परमरसामृतमूर्ति श्रीकृष्ण नित्य हैं, उनकी माधुर्याधिष्ठात्री श्रीवृषभानुनन्दिनी नित्या तथा उसकी अंशभूता व्रजांगनाएँ भी 'नित्या' हैं। सदा गोलोकधाममें परमानन्दकन्द भगवान् विराजते हैं। वहीं श्रीवृषभानुनन्दिनी और वहीं अन्तरंगा अंशभूता व्रजांगनाएँ भी विराजती हैं। साधनसिद्धामें दो भेद हैं—श्रुतिरूपा और ऋषिरूपा। यह कहा गया है कि 'अद्यापि यत्पदरजः