भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रुतिमृग्यमेव।' अर्थात् आजतक श्रुतियाँ पररसामृतमूर्ति भगवान्‌को ढूँढ़ रही हैं। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते इनको जब मूर्तिमान् प्रभु प्राप्त हुए और उनके अद्भुत गुणगणोंपर प्रसन्न हुए, तब उन्होंने ब्राह्मरसस्पर्शकी इच्छा प्रकट की। प्रभुने उनको ब्रजमें आनेको कहा। वे ही साधनसिद्धा हैं। वे भी नित्या ही हैं; क्योंकि ब्रह्ममें ही श्रुतियोंका निरन्तर रमण होता है। निष्कर्ष यह है कि 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठ० १।२।१५) समस्त वेद उस पूर्णतम पुरुषोत्तमका ही प्रतिपादन करते हैं। इस सिद्धान्तानुसार सर्व श्रुतियोंका तात्पर्य परमेश्वरमें ही है, वहीं उनका रमण है। इन श्रुतियोंमें दो भेद हैं—एक अनूढ़ा, दूसरी ऊढ़ा। उसमें अनूढ़ा कन्या वे हैं, जिन्होंने श्रीकृष्णप्राप्तिके लिये कात्यायनी-पूजन किया। दूसरी हैं ऊढ़ा—उनमें भिन्न-भिन्न पतियोंकी ममतामात्र थी। वास्तवमें तो यही था कि जिस समय ब्रह्माने वत्सगोपालादिकोंका हरण किया था और प्रभु स्वयं ही एक वर्षतक सब कुछ बने थे; उस समय सब गोप-कुमारियोंके विवाह ऊपरी दृष्टिसे दूसरे गोपोंके साथ हुए, परंतु वस्तुतः सबके विवाह प्रभुसे ही हुए थे; क्योंकि श्रीकृष्ण ही उस समय सब गोपरूपमें विराजमान थे। इसलिये लोकदृष्ट्या वह अन्यविवाहिता होती हुई भी प्रभुकी ही स्वकीया थीं। उनमें परकीयात्वका केवल आरोपमात्र था। इसलिये कहा गया है—'न जातु व्रजदेवीनां पतिभिः सह सङ्गमः' व्रजांगनाएँ कभी भी प्राकृत पतियोंसे संगत नहीं हुईं, अपितु प्रभु ही उनके सर्वस्व थे, यही बात 'श्रुतिरूपा' में भी है। कई श्रुतियाँ साक्षात् प्रभुमें तात्पर्य रखती हैं, जैसे 'प्रज्ञानं ब्रह्म' इत्यादि। कई परम्परया अग्नि, यम और वरुण आदिकी स्तुतिद्वारा प्रभुके साथ सम्बन्ध रखती हैं। जिन श्रुतियोंका जो अर्थ होता है, उनके साथ उनका सम्बन्ध है, यही प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव सम्बन्ध भी कहा जाता है। रामायणमें कहा है— 'गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बंदउँ सीता राम पद....॥' (रा०च०मा० १।१८) कहा जाता है कि वाणी और अर्थका भेद वास्तवमें भेद नहीं है। गिरा और अर्थका सम्बन्ध पति-पत्नी सम्बन्ध है। अर्थ पति और गिरा पत्नी है। 'कदाचनस्तरीरसि' यह श्रुति इन्द्रस्ताविका होनेसे इन्द्रपत्नी है। जिसका जो प्रतिपाद्य है, वही उसका पति है। वैसे ही जिनका साक्षात् परमात्मा ही अर्थ है, अन्य अर्थ नहीं, उनके साक्षात् पति परमात्मा ही हैं। जिनका आपाततः अर्थ अन्य है, परंतु महातात्पर्य ब्रह्ममें है—अवान्तर तात्पर्य इन्द्रादिमें और महातात्पर्य ब्रह्मप्रकाशनमें है, ऐसी भी श्रुतियाँ हैं। इसलिये एक श्रुति ऐसी है, जिसका मुख्य पति परमात्मा ही है। जैसे 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादि। यही प्रभुकी स्वकीया हैं और जो इन्द्रादिका प्रतिपादन करती हुई प्रभुमें पर्यवसित होती हैं, उनके अवान्तर पति इन्द्रादि और मुख्य पति प्रभु ब्रह्म हैं। ऐसी परिस्थितिमें कहा कि 'कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम्॥' (श्रीमद्भा० १०।८७।१५) अर्थात् कोई कहीं भी पैर रखे, आखिर वह पृथ्वीपर ही है। इस प्रकार सब तत्त्व परम्परासे ब्रह्महीमें हैं। कटक, मुकुट, कुण्डलादि क्या सुवर्ण नहीं हैं? समुद्रकी लाखों तरंगें समुद्रहीसे हैं, परमात्मासे बने इन्द्रादि सब परमात्मा ही हैं। मीमांसक जातिमें शक्ति मानते हैं, वह 'त्व' प्रत्ययवेद्या है। जैसे घटत्व अर्थात् घटका भाव, घटरूपमें परिणत मृत्तिका एवं मृत्तिकात्वका अर्थ जल, जलत्वका तेज, तेजत्वका वायु, वायुत्वका आकाश, आकाशका अहंतत्त्व, उसका महत्तत्त्व, उसका अव्यक्त और उसका सत्तत्त्वमें पर्यवसान होता है। इसलिये सबका अर्थ वही है। 'सा सत्ता सा महानात्मा तामाहुस्त्वतलादयः'। अतः जितनी जातियाँ हैं, सबका पर्यवसान ब्रह्ममें ही है। सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः। तस्यापि भगवान् कृष्णः किमतद्वस्तु रूप्यताम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५७) अर्थात् सब वस्तुओंका भावार्थ—स्वकारणमें