भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९८ भक्तिसुधा पर्यवसित होता है, उसका भी सत्तामें और वही सत्ता शुद्ध याथात्म्य ब्रह्म है, फिर श्रुतियोंका अर्थ ब्रह्ममें पर्यवसित हो—इसमें क्या आश्चर्य? आखिर शब्द कहेंगे किसको? प्रपंचको, वह तो परब्रह्म ही है। अतः जो कुछ भी करे सबका पर्यवसान सत्तामें ही होता है और वही परब्रह्म है। फिर भी उनका अवान्तर अर्थ, वह और वह, विभिन्न पदार्थ ही हैं। घटका साक्षात् अर्थ कंबुग्रीवादिमान् व्यक्ति है। किंतु जब गम्भीरतासे विचार करें, तब उसका अर्थ ब्रह्म ही होता है। असली रूप वही है, नकली रूप अलग- अलग हैं। इसलिये व्रजांगनाओंके नकली ममताके आस्पद विभिन्न गोप थे, परन्तु उनसे व्रजांगनाओंका संगम नहीं हुआ था। जब व्रजांगनाएँ श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दके साथ रासलीला कर रही थीं, तब व्रजमें ब्राह्मी रात्रि प्रकट हुई। उस रासलीलाकी दिव्य शोभाको देखकर चन्द्र मध्याकाशमें स्थगित हो गया—‘विस्मितः शशाङ्कः’। छः मासकी रात्रि थी, घरमें सब गोपोंको अपनी-अपनी दाराएँ अपने-अपने पास मिलीं— ‘मन्यमानाः स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः॥’ (श्रीमद्भा० १०।३३।३८) एतावता यह सिद्ध हुआ कि ये व्रजांगनाएँ श्रीकृष्णकी स्वकीया थीं। जब श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके संग विहार करती थीं, तब भी उनका मायामय स्वरूप सब गोपोंके पास था। इसीलिये कहा—‘न जातु’। तो बात यही आयी—‘व्रजदेवीनां पतिभिः सह संगमः’ कि जिन श्रुतियोंका अवान्तर तात्पर्य इन्द्रादिकोंमें है, वे परकीया और जिनका साक्षात् प्रभुमें है, वे स्वकीया हैं। इनमें भी तटस्था, प्रौढ़ा, मुग्धा इत्यादि बहुत भेद हैं। कोई निषेधमुखेन, कोई विधिमुखेन प्रभुमें पर्यवसित होती हैं। इस तरह अवान्तर अर्थ भी तबतक आदरणीय है, जबतक महातात्पर्यका ज्ञान नहीं होता। लोकमें भी गौण पति एवं मुख्य पति होते हैं। राजादि गौण पति और असली पति पूर्णतम पुरुषोत्तम परमात्मा हैं। जबतक उनकी प्राप्ति नहीं हुई, तबतक अवान्तर पतिका अनुसरण अपेक्षित ही है। जल ब्रह्म और तरंग जीव हैं।—‘सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥’ (रा०च०मा० ७।१११।६) जैसे वारिमें वीचि, वैसे पूर्णतम पुरुषोत्तममें जीवभाव है। इनमें एक तरंगका दूसरे तरंगोंके साथ सम्बन्ध गौण है। जलके साथ मुख्य, सुस्थिर, स्थायी सम्बन्ध है। परंतु अन्तर्मुखता न होनेके कारण अपने असली सम्बन्धपर दृष्टि नहीं जाती। यदि तरंग जलका अपलाप करे तो स्वयं कैसे रहेगा? वैसे ही जीव ब्रह्मका खण्डन करेगा तो स्वयं रहेगा कैसे? वास्तवमें वह ब्रह्म ही है, परंतु अन्तर्मुख न होनेके कारण ब्रह्मको नहीं देखता—‘आनँद- सिंधु-मध्य तव बासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा॥’ (विनय-पत्रिका १३६।२) असलीको भूलकर नकलीको देखता है। हम जीव नकली सम्बन्धी दारादिकोंसे सम्बन्ध जोड़ेंगे, पर असली सम्बन्धी ब्रह्मसे नहीं। सब कुछ करेंगे नकलीके लिये, पर एक तरंगका दूसरी तरंगसे सम्बन्ध कितने दिन? एक-न-एक दिन वियोग होगा ही। जीवका जीवसे सम्बन्ध आगन्तुक है। अतएव क्षणभंगुर है। इसीलिये सबके परमपति श्रीपूर्णतम पुरुषोत्तम ही सबके मुख्य पति हैं। रास-प्रसंगमें जब प्रभुने व्रजांगनाओंसे लौट जानेके लिये कहा, तब उन्होंने कृष्णसे एक कहानी कही और पूछा—‘एक साध्वी स्त्री थी। एक बार जब उसके पति विदेश गये, तब वह पतिदेवकी मूर्ति बनाकर पूजा करती थी। एक दिन ऐसा अवसर आया कि वह मूर्तिकी पूजा कर रही थी, इतनेमें पतिदेव आ गये और स्त्रीसे कहा— किवाड़ा खोलो।’ अब प्रश्न है कि वह किवाड़ा खोले या मूर्तिकी ही पूजा करती बैठे? प्रभुने कहा— ‘असली पतिका स्वागत करना चाहिये।’ व्रजांगनाओंने कहा—हमारा भी उत्तर हो गया। तात्पर्य यह है कि शालग्रामका विष्णुबुद्धिसे पूजन, वैसे ही प्राकृत पतियोंका परमपति-बुद्धिसे पूजन