भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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वेणुगीत ९९१

करना चाहिये। इसीलिये कन्यादानमें कहते हैं— ‘विष्णुरूपाय वराय लक्ष्मीरूपां कन्यां सम्प्रददे।’ अतः जगत्की सब हलचलें पूर्णतम पुरुषोत्तमकी ओर हैं। जबतक वह प्राप्त नहीं होता, तबतक गति बनी ही रहेगी। इसलिये सब श्रुतियोंका महातात्पर्य ब्रह्महीमें निर्धारित है। इस तरह स्वकीया, परकीया, मुग्धा, प्रौढ़ा, कान्तभाववती, सख्यभाववती, श्रुतिरूपा और मुनिरूपा—सब व्रजांगनाएँ वेणुरवका श्रवणकर उसका वर्णन करती हुई, आनन्दोन्मादमें तन्मयतावशात् एक दूसरीको ही श्रीकृष्ण समझकर परिरम्भण करने लगीं। प्रेमोन्मादमें श्रीकृष्ण ही उन्हें सर्वत्र दीखने लगे अथवा यों कहिये कि वर्णन करती हुई स्वबुद्ध्यारूढ़ प्रभुकी मंगलमय मूर्तिका परिरम्भण करने लगीं। वेणुरवमें भगवान्‌का स्वरूप तथा उनकी लीला प्रतिष्ठित है वेणुरवमें ही श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका स्वरूप और उनकी मंगलमयी लीला है। अतः उसके वर्णनमें प्रभुका वर्णन है। पहले तो श्रीकृष्ण ही रसामृतमूर्ति हैं। उनमें भी साधनता और साध्यता दोनों हैं। श्रीहस्त और श्रीचरणारविन्दादि अन्यान्य अंगोंमें साध्यता है और साधनता भी, किंतु आनन्द केवल साध्य ही है, सब उसीके लिये है, पर वह किसीके लिये नहीं। यही ब्रह्मका लक्षण है। अतः दोनों एक ही हैं। शब्दादि सब पदार्थ आनन्दके लिये हैं, वैसे ही आत्माके लिये भी हैं—‘आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।’ (बृहदारण्यक० २।४।५) जैसे आनन्द निरतिशय, निरुपाधिक और परप्रेमास्पद है, वैसे आत्मा भी निरतिशय, निरुपाधिक, परप्रेमास्पद है। जिसमें कभी प्रेम हो और कभी नहीं, वह अपरप्रेमास्पद है। जो ऐसा नहीं, वह परप्रेमास्पद है। औपाधिक ‘अपर’ और स्वाभाविक ‘पर’ है। औपाधिक उपाधिके अधीन होता है और स्वाभाविक उपाधिके अधीन नहीं होता। वह मिटता नहीं। संसारके सब प्रेम औपाधिक हैं, जैसे स्त्री-पुत्रादि प्रेम। इतना ही क्यों, संसारमें देवतापर भी जब वह अनुकूल होता है, तभी प्रेम होता है। मन्त्रोंमें भी कोई अरिमन्त्र, कोई मध्यम मन्त्र है। जिससे अनुकूल फल नहीं होता, वह अरिमन्त्र है। इसी विचारसे कहा है कि जब समान तत्त्व और समान साधक मिलें, तब मन्त्रसिद्धि ठीक होती है। आजकल तो यह सब विचार ही नहीं है। शास्त्र कहते हैं—पहले ठीक विचार कर लो, फिर मन्त्र लेना। अस्तु, सारांश यह कि जब देवता भी आत्मानुकूल हों, तब उनमें प्रेम होता है। देखा जाता है कि शैव विष्णुद्वेष और वैष्णव शिवद्वेष करते हैं। वास्तवमें पूर्णतम पुरुषोत्तम प्रभु एक ही हैं, पर व्यर्थ उनमें द्वेषास्पदता, रागास्पदताकी कल्पना करते हैं। रामभक्तोंको रामायणमें जो मिठास प्रतीत होता है, वह इतर ग्रन्थोंमें नहीं। वृन्दावनमें तो कृष्णमें भी भेद मानते हैं, एक बायें मुकुटवाले श्रीकृष्ण, दूसरे दायें मुकुटवाले श्रीकृष्ण। वास्तवमें बाये-दायेंमें भी कुछ रहस्य, कुछ भाव अवश्य है। वेणुगीतप्रसंगमें बायें मुकुटवाले ही श्रीकृष्ण हैं। ‘वामबाहुकृतवामकपोलः’ (श्रीमद्भा० १०।३५।२) श्रीभगवान्‌की ललित मूर्तिमें मुकुट बायीं ओर ही झुकता है। कहते हैं जहाँ वामांगमें श्रीवृषभानुनन्दिनी विराजमान हैं, वहाँ श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण परमानन्दका वामांगमें ही झुकाव है। जैसे उनका झुकाव, वैसे उनके भूषणोंका भी झुकाव है। इसलिये उस परिस्थितिमें मुकुटका बायीं ओर झुकाव स्वाभाविक है। जहाँपर श्रीकृष्ण और बलराम, वहाँपर दक्षिणमें और जहाँ नन्दबाबा दक्षिणमें और वाममें श्रीनन्दरानी, मध्यमें बलराम नन्दरायके पास, श्रीकृष्ण यशोदाके पास, उस समय मुकुटका दायें बलरामकी ओर झुकाव होता है। यही वास्तवमें रहस्य है। यह झगड़ा आखिर जब कचहरीमें गया तो जजने कहा—मुकुटको सीधा रखो। अस्तु, मूल विषय यह था कि आनन्द निरतिशय, निरुपम, परप्रेमास्पद है और अन्य

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