भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेणुगीत १२१ वृषभानुनन्दिनी और श्रीकृष्ण परस्पर अन्तरात्मा हैं उस वेणुरवका ही वर्णन करती हुई व्रजांगनाएँ परस्पर अभिरमण करती हैं। इस रवद्वारा सदानन्दरूप ही हृदयमें व्यक्त होता है। कृष्ण पदका अर्थ ही सदानन्द है। कहा है—'कृषिर्भूवाचकः शब्दः णश्च निर्वृतिवाचकः।' कृष् धातुका अर्थ भू— सत्ता और 'ण' का अर्थ निवृति—आनन्द है। तथा च 'सत्ता—आनन्द' यह कृष्ण पदका अर्थ है। 'तमालश्यामलत्विट् यशोदास्तनन्धय' इसका अर्थ कोई श्रीकृष्ण ही कहते हैं, इसमें भी विरोध नहीं है। उसमें भी सत्ता और आनन्द दोनोंका ऐक्य है। स्वयंप्रकाश सत्तारूप आनन्द, आनन्दरूप सत्ता दोनों एक ही बात है। सत्तारूपा श्रीवृषभानुनन्दिनी एवं आनन्दरूप श्रीकृष्ण हैं। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द और श्रीवृषभानुनन्दिनी वैसे ही अभिन्न हैं, जैसे सत्ता और आनन्द। यदि आनन्द सत्ता न हो तो सत्ता बिना आनन्द असत् हो जाय। फिर जो असत् है, वह आनन्द कैसे ? वैसे ही आनन्दसे वियुक्त शुद्ध सत्ता नहीं है। जड़ोंकी सत्ता दूषित, सविशेष सप्रपंच है, किंतु शुद्ध सत्ता निरुपद्रव, निर्विशेष आनन्दरूप ही है और सब विनश्वर सत्ता है। यों तो वैषयिक आनन्द भी विनश्वर है, अतः सदानन्द कहाँ ? आनन्द, सत्ता दोनों परस्पर विशेषण हैं। वह आनन्द अबाध्य है, जगदानन्द बाध्य, इसीलिये वह श्रीकृष्णका स्वरूप वास्तविक सद्रूप एवं आनन्दरूप है, जो अत्यन्त अबाध्य नित्य स्वप्रकाश है। उसके साथ जब सत् लगा, तब सांसारिकसे विलक्षणता, नित्यता आयी एवं सत्में आनन्द न लगाते तो प्रापंचिक सत्ता आती। अतः सत् और आनन्द दोनोंको लगाया। यह सत् और आनन्द परस्पर वियुक्त कभी नहीं होते, इसलिये वृषभानुनन्दिनी और श्रीकृष्ण परस्पर अन्तरात्मा हैं। एक तो यह कि जैसे जलमें तरंग, वैसे परमरसामृतमूर्ति श्रीकृष्णमें व्रजांगना, जैसे चन्द्रमामें चन्द्रिका, जैसे भानुसे प्रभाका, वैसा उनका अविघटित स्वाभाविक सम्बन्ध है, किंतु इससे भी अन्तरंग यह सम्बन्ध है, जैसे अमृतमें मधुरिमा एवं जहाँ परमरसामृतमूर्ति श्रीकृष्ण, वहाँ उनकी माधुर्याधिष्ठात्री वृषभानुनन्दिनी। अमृतसे मधुरिमाको अलग किया, फिर अमृतत्व ही क्या ? वेदान्ती गुण-गुणीका तादात्म्य मानते हैं। इसलिये सत्ता-आनन्दरूप वृषभानुनन्दिनी और श्रीकृष्ण दोनों एक ही हैं। एक ही सदानन्दरूप भगवान् गौरतेज-श्यामतेजरूपमें—राधा-माधव उभय रूपमें प्रकट हुए। इसी दृष्टिसे कहते हैं कि श्रीकृष्णका आन्तरस्वरूप वृषभानुनन्दिनी तथा बाह्यस्वरूप पुमान् है तथा वृषभानुनन्दिनीका आन्तरस्वरूप पुमान् और बाह्यस्वरूप वृषभानुनन्दिनी है। हितहरिवंश-सम्प्रदायमें कहा है कि गौरश्याम शीशियोंमें श्यामगौर रस भरा हो, वैसे ये दोनों हैं। दोनों शीशी भी एक जातिकी ही हैं। गौर शीशी श्यामहृदयकी वस्तु है और श्याम शीशी गौर-हृदयकी वस्तु है। गौरमें श्यामरस एवं श्याममें गौररस भरा है। इस तरह परस्पर श्रीकृष्ण और वृषभानुनन्दिनी परस्पर हृदयकी वस्तु हैं, दोनोंमें परम अन्तरंगता है। इसलिये कहा है कि 'उभयोभयभावात्मा' हैं। इस प्रकार वह परमतत्त्व भरपूर होकर वेणुरवद्वारा व्यक्त होता है। इसलिये उसका वर्णन करती हुई व्रजांगनाएँ श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका परिरम्भण करती हुई अनुरागकी महिमासे परस्परका परिरम्भण करने लगीं अथवा श्रीकृष्ण-साक्षात्कारसे रमण करने लगीं। इन्द्रियवानोंकी यही लालसा कि प्रभु इन्द्रियग्राह्य होकर प्राप्त हों गोप्य ऊचुः— अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः पशूननु विवेशयतोर्वयस्यैः। वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनुवेणु जुष्टं यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम्॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।७) श्रीधराचार्यके मतमें 'गोप्य ऊचुः' नहीं है, इसलिये 'अनुवर्णनेनाहुः-अक्षण्वतामिति' ऐसा