भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 132, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्होंने लिखा है। 'गोप्यः' का अर्थ सनातन गोस्वामी 'गोपयन्ति श्यामसुन्दरमिति गोप्यः' करते हैं। व्रजांगनाएँ अपने श्यामसुन्दरको छिपाती हैं, इसलिये कि कोई उन्हें जान न जाय। व्रजांगनाएँ कहती हैं—हे सखियो! नेत्रवानोंका, नेत्रधारियोंका यही फल है। क्या? जल्दी नहीं कहते बना, प्रेमभारसे विवश हो गयीं, अतः सहसा हृद्गत तत्त्व निर्देष्टुं अशक्य हो गया। वह निकलता ही नहीं, सखि! क्या? वह इस समय उनका हृदय ही जानता है। यहाँ 'अक्षण्वतां' से 'सर्वेन्द्रियवतां' यह अर्थ करना चाहिये। इन्द्रियवानोंका और उनकी इन्द्रियोंका यही फल है। 'आवृत्तचक्षुः' माने केवल आँखोंको मींचकर ही दर्शन न होगा, अपितु चक्षुपलक्षित सर्वेन्द्रियोंका निग्रह आवश्यक है। यहाँ भी व्रजांगनाएँ कहती हैं—हे सखि! सर्वेन्द्रियवानोंका यही फल है, केवल चक्षुष्मानोंका नहीं। क्या? तब कहते हैं कि वे जो परमरसामृतमूर्ति व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द हैं, उनके मंगलमय अंगोंके सौरस्यादिका आस्वादन करना। नहीं तो फिर निर्गुण, निराकार परब्रह्म तो इन्द्रियानुपभोग्य है। 'यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह।' (तैत्तिरीय० २।४) इन्द्रियाँ तो विफल हुईं न? बुद्धिग्राह्य होनेपर भी क्या हुआ? महावाक्यजन्य तदाकाराकारित अन्तःकरणवृत्तिसे स्पर्श किया, निर्वृत्तिक अन्तःकरणको भी स्पर्श न मिलेगा। फिर भी मान लो कि उसको मिला, पर इन्द्रियोंको तो नहीं मिला। ठीक स्पर्श जीवात्माको— सर्वोपाधिविनिर्मुक्तको मिलेगा। इसीलिये कहती है कि सखि! इन्द्रियवानोंके इन्द्रिय होनेकी सफलता मनमोहन श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके अमृतमय मुखचन्द्रका इन नयनोंसे दर्शन, भुजाओंसे परिरम्भण, घ्राणोंसे उनके सौरभका अवघ्राण, रसनासे प्रियतम प्रधानके अमृतमय मुखचन्द्रकी सुमधुर अधरसुधा-पान करनेको मिले। सर्वेन्द्रियद्वारा सम्भोगयोग्य सबके परम प्रेमास्पद केवल बुद्धिग्राह्य हों, यह सह्य नहीं, किंतु सर्व रोम- रोम भी उतावले हो उठेंगे। भले ही कैवल्यकी कोई स्थिति हो, जहाँ इन्द्रियोंका रोना-धोना कुछ नहीं, परंतु यदि वह स्थिति न हो तो पूर्ण आस्वादन सभीको हो; क्योंकि कोई भी तत्त्व भगवद् विप्रयोगमें हो, उस सत्तारूपसे भी वियुक्त होना, असत्, स्फूर्तिविहीन, निस्फूर्ति, नीरस हो जाना कौन चाहेगा? कौन अपनेको स्फूर्तिविहीन, नीरस, सत्ताविहीन होना चाहेगा? कहा है—'लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः' परमप्रेमीका लक्षण यही है कि जो प्रियतमके वियोगमें रह न सके। 'त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्।' (श्रीमद्भा० १०।३१।१५) एक लव, निमेषमें भी युग, कल्प, महाकल्प हों। 'गोपीनां परमानन्द आसीद् गोविन्द- दर्शने। क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाभवत्॥' (श्रीमद्भा० १०।१९।१६) व्रजांगनाओंको श्याम- सुन्दरके दर्शनमें महाकल्प भी क्षणके समान और वियोगमें क्षण भी कल्पके समान बीतता था, यही तीव्रताप है। इतना ही नहीं, बल्कि वियोगमें रह ही न सके? यही उत्कट प्रेम है। जलसे वियुक्त कहीं तरंग रह सकेगी? यह शुद्ध प्रेमका लक्षण है कि प्रियके वियोगमें न रह सके। सत्से वियुक्त होनेसे असत् हो जाता है। श्रीकृष्ण परमानन्द रसस्वरूपके वियोगमें नीरसता, निस्फूर्तिता हो जाती है। इस प्रकार जब सभी श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दके अनन्य प्रेमी हैं, तब इन्द्रियोंको ईर्ष्या होती है कि जो श्रीकृष्ण प्रभु प्रकट हैं, हाय! हम उनसे वंचित हैं। वे रोती हैं—'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूः' (कठ० २।१।१)। जो ध्यानमें श्रीकृष्णका अनुभव करते हैं, उनके नेत्रादि इन्द्रियाँ तड़फड़ाती रहती हैं, लालायित रहती हैं, अतः एक कहती है—'अक्षण्वतां फलमिदम्'। दूसरी कहती है—'न परं विदामः परं किञ्चित्' तो यह कुछ है ही नहीं। परंतु 'वयं तु न विदामः' हम तो नहीं जानतीं। हमें खण्डन-मण्डनसे क्या मतलब? किसीके लिये भले ही परमात्मा हों, पर हमारे तो श्यामसुन्दर हैं। भावुक कहते हैं—श्यामसुन्दर चाहे जैसे हों, प्रियतम