भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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प्राणधन हमसे द्वेष करते हों या करुणा करते हों, पर हमारे ज्ञेय, ध्येय सब कुछ वे ही हैं। यह शर्त नहीं कि यदि वह प्रेम करें, तभी हम उनसे प्रेम करें। यह तो व्यापार हुआ। सौन्दर्यकी शर्त भी नहीं, वह व्यभिचारिणी भक्ति होगी। अटल भक्तिके माने यही है कि चाहे जो जैसा हो, अपनी वस्तुओंमें निरतिशय प्रीति होती है। वही ठीक है। अतः वह खण्डन-मण्डन नहीं करतीं। वह तो कहती है कि 'अन्ये अन्यञ्जानन्तु नाम वयं तु न विदामः' अर्थात् मोक्षादि अन्य फलोंको भले ही कोई जानते हों, परंतु हम नहीं जानतीं। मान लिया कैवल्य हुआ, किंतु वह सर्वेन्द्रियग्राह्य नहीं है। इसलिये इन्द्रियवानोंकी लालसा यही है कि वह श्रीकृष्ण प्रभु सर्वेन्द्रियग्राह्य होकर प्राप्त हों। व्रजांगनाएँ कहती हैं—सखि! 'वयं उपनिषद्रूपाः' हम उपनिषद्रूपा हैं। यदि हम न जानेंगी तो दूसरा कौन जानेगा ? फल तो श्रुति ही कहती है। फिर वेदविहीन नये फलको कोई जानते हों तो जानें। अर्थात् वेदप्रामाण्यवाले सारभूत फल-निर्णयमें उपनिषदोंको ही प्रमाण मानते हैं, इसलिये यह फल है, दूसरा नहीं। इससे भी ऊँची बात यह है कि ब्रह्मदेव कहते हैं—'एषां तु भाग्यमहिमा' इन व्रजांगनाओंके— घोष-निवासियोंके अनन्त अद्भुत भाग्यकी महिमा, हम उसे क्या गायें? हम तो अपनेको कृतार्थ समझते हैं। हम कौन ? ग्यारह इन्द्रियोंके अधिष्ठात्री देवता। जो व्रजांगनाजन आपके उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक परमरसामृतमूर्ति आपके आनन्दका साक्षात्कार करते हैं, उनकी महिमा तो अलौकिक है। हम इन्द्रियोंकी अधिष्ठात्री देवता अपनेको अत्यन्त भाग्यवान् समझते हैं। यह क्यों ? इसलिये कि जब व्रजांगना अपने हृषीक-चषकोंसे आपके श्रीअंगोंके सौन्दर्यामृतसुधाका पान करती हैं, तब उनकी अधिष्ठात्री देवता होनेसे हमारा परम्परासे हृषीक-चषकोंसे सम्बन्ध होता है, व्रजांगनाएँ अपने हृषीक-चषक इन्द्रियपानपात्रोंसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दके सौन्दर्यमाधुर्य-सौगन्ध्यामृतका पान करती हैं। इसलिये मुख्य पात्र व्रजांगनाएँ हैं। पानका साधन इन्द्रियपानपात्र है। जैसे नेत्रपानपात्रद्वारा आपके अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्यामृतका, घ्राणपानपात्रद्वारा सौगन्ध्यामृतका, श्रोत्रपानपात्रद्वारा वेणुगीत तथा अमृत वचनोंका, रसपानपात्रद्वारा अमृतमय मुखचन्द्रकी सुमधुर अधरसुधाका पान करना। यहाँ व्रजांगनाएँ पानकर्त्री हैं। इन्द्रियरूप पानपात्रका सम्बन्ध रससे कहा है—'दर्वी पाकरसं यथा।' यहाँ ब्रह्मा कहते हैं कि हम तो चषक भी नहीं हैं। इन्द्रिय भी करण हैं, जब उनको भी रससम्भोग नहीं, तब उन इन्द्रियोंके अधिष्ठाता हम देवताओंको वह रससम्भोग कहाँ ? व्रजांगनाएँ श्रोत्रद्वारा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके वचनसुधाका पान करती हैं, उसमें ये इन्द्रियाँ दोना हैं। पानपात्रको क्या स्वाद आयेगा ? कटोरा क्या स्वाद ले ? तथापि उस रसको छूनेवाला एक चषक भी अपनेको कृतकृत्य मानता है और हम तो परम्परा भी अपनेको कृतार्थ मानते हैं। फिर इन्द्रियाँ और उनसे भी अधिक व्रजांगनाएँ कितनी भाग्यवती हैं। हम इतना ही अपना भाग्य समझते हैं कि हम जिन इन्द्रियोंके देवता हैं, उनके द्वारा व्रजांगनाएँ प्रभुके सौन्दर्य-सौगन्ध्यादिका पान करती हैं, इसलिये 'एषां तु भाग्यमहिमाच्युत तावदास्ताम्।' (श्रीमद्भा० १०।१४।३३) जहाँ ब्रह्मादि देव ऐसा परम्परा कहते हैं, वहाँ व्रजांगनाएँ क्यों न कहें कि 'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः'। सखि ! हमारा- तुम्हारा संवाद है। सम्मति है कि नहीं? कहती हैं 'इदं' यानी उस समय जो स्वरूप प्रस्फुरित होता था, जिसका 'बर्हापीडं नटवरवपुः' से वर्णन किया गया है, वही वृन्दावनविहारी यहाँ 'इदं' से कहे गये हैं। व्रजमें व्रजांगनाओंको श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द- कन्दका दर्शन होता ही है, फिर वे अत्यन्त आर्त क्यों ? तो कहती हैं कि यद्यपि व्रजस्थ श्रीकृष्णका दर्शन तो करती ही हैं, तथापि अन्यान्य स्वरूपोंमें। इस समयका विशेष दर्शन है। 'इदं इति बुद्धिस्थत्वादिदमानिर्देशः' अर्थात् द्वारकावासी,