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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 134

१२४ भक्तिसुधा मथुरावासी, व्रजवासी सब भले ही एक हों, परंतु मनमोहनका यह ‘नटवरवपु’ है। इन व्रजेशसुत नन्दरायसुवन श्रीकृष्ण और बलरामको गौओंको वृन्दावनमें निवेश कराते हुए जिसने देखा, उसीकी इन्द्रियोंकी सफलता है। बलराम यद्यपि व्रजेशसुत नहीं तथापि ‘पालितपुत्रत्वात्’ यह आरोप है। कोई-कोई वसुदेवको भी व्रजेश कहते हैं, पर वह खींचा-तानी है। नन्दरायके पुत्र ललन—कृष्ण और वसुदेवके बलराम, मगर व्रज यही समझता था कि दोनों व्रजेशनन्दन ही हैं। इसलिये ‘व्रजेशसुतयोः’ यहाँ द्विवचन कहा गया है। ‘वक्त्रम्’ यह एकवचन एकवद् भावसे हो सकता है, पर इसमें सरसता नहीं है। व्रजांगनाओंके मनमें तो मनमोहन श्रीकृष्णका ही अमृतमय मुखचन्द्र था। तब फिर ‘व्रजेशसुतयोः’ क्यों ? इसलिये कहते हैं—‘अनुवेणुजुष्टम्’। यह श्रीबलरामके मुखका व्यावर्तन है। व्रजेशसुत बलराम और श्रीकृष्ण, दोनोंमें जो वेणुजुष्ट है, उसके सौन्दर्य- माधुर्य-सुधाका पान किया। इनके मनमें सिवा श्रीकृष्णके दूसरी बात ही नहीं है अथवा—जबतक उनको होश-हवास था, तबतक अपनेको संभाला। कोई कुछ कहेंगे कि कुछ गड़बड़ी है क्या? ‘गुप्त प्रेम सखि सदा दुरैये’ इसलिये कहा—‘हम तो दोनोंकी बात कर रही हैं अर्थात् सँभालकर द्विवचन दिया। ‘व्रजेश’ इसलिये कहा कि हम व्रजमें बसती हैं तो उनके लड़केकी प्रशंसा करनी ही चाहिये। यहाँतक तो ठीक, पर आगे सँभाले सँभल न सकीं। प्रभुका मुखचन्द्र सम्मुख आया, वह तो व्रजांगनाओंके हृदयके पूर्णानुराग-रससार-सरोवरसे निकलनेवाला ही है। जैसे तूफानसे सागर उद्वेलित हो उठता है, उसी प्रकार व्रजांगनाओंको हुआ और वे अपने भावोंको सँभाल न सकीं। यहाँ वल्लभाचार्य कहते हैं—जिन्हें भगवान्ने आधिदैविक देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि इत्यादि प्रदान किया है, उनके लिये यही परम फल है कि कृष्णचन्द्रके सौंदर्यादिका आस्वादन करें। जैसे कोई कमलनेत्र पुरुष सदा अन्धकारहीमें स्थित रहे तो उसके नेत्रोंका होना ही निरर्थक है, वैसे ही भगवान्ने कृपाकर आधिदैविक देहादिको प्रदान किया है, उनसे यदि प्रभुकी सुधाका आस्वादन न किया तो वे विफल हैं। हाँ, यह हो सकता है कि किंचित् काल अन्धकारमें स्थिति हो, पर सर्वदा हो तो नेत्रोंका होना-न-होना बराबर ही हो जायगा। इस स्थितिको वल्लभाचार्य ‘सर्वात्मभाव’ कहते हैं अर्थात् देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकारादि विस्मरणपूर्वक सर्वत्र श्यामसुन्दरका ही दर्शन होना। इस अवस्थामें निजी अस्तित्व पृथक् नहीं रहता, इसलिये स्वपार्थक्येन श्रीकृष्ण प्रभुका भी भान नहीं होता। इसीलिये उनके सुधास्वादनका भी भान नहीं रहता, किंतु इसे कदाचित्क, यानी संचारी भाव कहते हैं। यह भाव (सर्वात्मभाव) विशेषकर विप्रयोगमें मानते हैं। इसीको आन्तररमण भी कहते हैं अर्थात् बाह्यसंप्रयोग न होनेपर भी आन्तरसंप्रयोग होता ही है। इसकी भी बड़ी महिमा गायी गयी है। कहते हैं— ‘संगमविरहविकल्पे वरमिह विरहो न संगमस्तस्य’। संगम और विरह, इनमें प्रियतमका विरह ही अच्छा है; क्योंकि संगममें प्रियतम एक ही हैं, विरहमें निखिल विश्व ही प्रियतम हो जाता है। जिधर दृष्टि जाय, उधर प्रियतम-ही-प्रियतम दिखलायी पड़ते हैं। फिर भी इस भावको सार्वदिक् मानें तो गड़बड़ हो जाय, इसलिये ही कमलनेत्र पुरुषकी उपमा दी। प्रभुके अधरसुधाका आस्वादन यही परम फल है। ध्यान लगानेकी रीति ध्यानाभ्यासी लोग अन्तमें सर्वविस्मरण चाहते हैं। ‘विष्णुपुराण’, ‘भागवतादि’ में जहाँ ध्यान कहा है, वहाँ सांग, सपरिवार, सर्वभूषणादिसहितका ध्यान है, किंतु मन तो महाचंचल बेताल है। उसका एक जगह होना ही कठिन है, अतः मन प्रभुके भूषणोंका ही चिन्तन करे। मन अनेक विषयोंमें क्यों न स्थित हो, पर वह अनेकता प्रभुके स्वरूपमें ही हो। वहाँसे उसको अलग न जाने देना। बस, ध्यानकी यही सीमा

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