भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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है। चंचल बन्दरको पद्मासनपर बैठकर निर्विकल्प समाधि कैसे लगे ? तो उसके लिये यह उपाय करो— पहले एक बगीचेसे यह बाहर न जाय। फिर एक ही वृक्षपर, फिर एक ही शाखापर बैठा रहेगा। मन बन्दरसे भी अधिक चंचल है। क्षणमें स्वर्गसे नरकतक दौड़ लगाता है। इसको पहले आलम्बन दो। भक्तगाथा, श्रीकृष्णकी लीला आलम्बन है। फिर मूर्तिमें ही रहे। इस प्रकार विषय-संचार सीमित किया जाय। जितना अधिकाधिक विषयचिन्तन, उतनी ही चंचलता अधिकाधिक। जितनी श्रीकृष्णचिन्तनमें संलग्नता, उतनी स्थिरता अधिक।—‘मामनुस्मरतश्चित्तं मय्येव प्रविलीयते॥’ (श्रीमद्भा० ११।१४।२७) मक्षिकाकी सन्तान दुर्गन्धित वस्तुपर बैठती है, चन्दनपर नहीं। भावुक कहते हैं कि प्रथम श्रीकृष्णके सर्वांगका भूषणसहित ध्यान, फिर श्रीअंगोंका, फिर केवल मन्दहासयुक्त मुखचन्द्रका ही ध्यान करना चाहिये— ‘तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा।’ (गीता ६।१२) यदि सुस्मित मुखचन्द्रमें मन एकाग्र हुआ तो फिर कुछ चिन्तन न करे। अन्तमें मुखचन्द्रका चिन्तन होते-होते और अलौकिक सौन्दर्य, माधुर्य सुधास्वादनमें मन स्तब्ध हो जाता है, विभोर-विह्वल हो जाता है, वाग्- गद्गदा होती है, चित्त द्रवता है, सर्वेन्द्रियोंको निश्चेष्टता प्राप्त हो जाती है। ‘प्रेम भरा मन’ श्रीभरत-राम-संमिलनके अवसरपर भरतके प्रेमरूपीरसमें सराबोर हो गया, मन निज गतिसे रहित हो गया। उस समय न किसीने कुछ कहा, न पूछा, कहा—‘मन बुधि चित अह्मिति बिसराई॥’ (रा०च०मा० २।२४१।२) इससे बढ़कर निर्विकल्प समाधि कहाँ? चारों अन्तःकरण निश्चल हो गये। इस प्रेमामृतसिन्धुमें जब प्रेमीका उन्मज्जन-निमज्जन होता है, तब फिर सर्व विस्मरण हो जाता है। कहा है— यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्॥ (कठ० २।३।१०) इसीलिये ‘भागवत’ तृतीयस्कन्धमें कपिल- देवहूति-संवादमें परब्रह्मका उपदेशकर सगुण साकारका ध्यान बतलाया है। पहले श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दके सर्व आभूषणोंका चिन्तन करे। कहा है—‘तच्चापि चित्तबडिशं शनकैर्वियुङ्क्ते॥’ (श्रीमद्भा० ३।२८।३४) एवं भगवान्‌के स्वरूपमें उस मनको आसक्तकर सर्व विश्वसे हटा ले। अन्तमें प्रेमोन्मादमें ऐसा होता है कि दूसरोंका ध्यान दूर रहा, ध्येयस्वरूप भी छूट जाता है। किंतु प्रेमी यह नहीं चाहते कि हमारे मनको भगवान् भूल जायँ, क्योंकि वह मुमुक्षुके लिये है। भक्त मुमुक्षु नहीं होता, वह ब्रह्मलोकान्त विरक्त होकर प्रभुके मुखचन्द्रका दर्शन ही चाहता है। कहा है— न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम। वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।३४) सर्वात्मभाववाले भक्तको चाहे श्रीकृष्णके मुखचन्द्रके दर्शनमें क्षणिक सर्वविस्मृतिपुरःसर सर्वत्र प्रभुका ही भान हो जाय, पर सर्वदाके लिये यह इष्ट नहीं मानते। वह चाहते हैं कि सावधानीसे प्रभुकी सेवा करें। इसी भावको लेकर कहा है—‘अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः।’ यहाँ यद्यपि ‘चन्द्र’ पद नहीं दिया तथापि आगेके ‘पीतम्’ से ज्ञात होता है कि ‘चन्द्रमुख’ यदि चन्द्र न हो तो पेय कैसे हो? ‘पिबत भागवतं रसमालयम्’ (श्रीमद्भा० १।१।३) यहाँ निगमकल्पतरुसे विगलित रसमय फल पीनेके लिये कहा है। कहते हैं फल तो चोष्य होता है, पेय नहीं। उसमें बकला, गुठली होती है, अतः कहा ‘रसम्’ अर्थात् ‘रसवत्’ (‘गुणवचनान्मत्तुप्’)। आम्रफल रसवान् होता है, उसमें भी कुछ त्याज्य होता ही है। यहाँ रसात्मकता कही, इसीलिये कि यहाँ कुछ छोड़नेकी चीज है ही नहीं। इसी अर्थसे यहाँ ‘पीओ’ कहा है। जिन्होंने श्रीकृष्णचन्द्रके वक्त्रका पान किया। इससे मुखचन्द्रका ग्रहण होता है। चकोरी जैसे अमृतमय चन्द्रमाकी चन्द्रिकाका पान करती है, वैसे ही व्रजांगनाएँ श्यामसुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र