भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 136

१२६ भक्तिसुधा परमानन्दकन्दके अमृतमय मुखचन्द्रके सौरस्य- सौगन्ध्यादिसमन्वित सुमधुर अधरसुधा-चन्द्रिकाका पान करती हैं। इसलिये यह प्राकृत वक्त्र नहीं, पूर्णानुरागरससारसागराविर्भूत चन्द्रमा है। इसीलिये वह निपान करनेयोग्य है। ऐसा जिन्होंने पान किया; उन्हींके नेत्रोंका साफल्य है। अथवा यह कि सखि! जिन्होंने नेत्रोंद्वारा अनुरागपुरःसर श्रीकृष्णचन्द्र व्रजेन्द्रनन्दनके मुखचन्द्रका दर्शन किया, वे परम सौभाग्यशाली हैं। उनमें भी वे जिन्होंने सर्वाभोग्या अधरसुधाका पान किया। यह एक प्रेमार्त्तिजन्य व्याकुलता है, अतृप्ति है। उसके कारण जो अपनी सर्वस्व निजी, नित्यप्राप्त वस्तु है, उसमें भी दुर्लभताकी प्रतीति होती है। कहती है— सखि! मनमोहनके मुखचन्द्रका दर्शन करनेवाले कई तरहके हैं। भगवान्‌के अन्यान्य अवतारोंके मुखचन्द्रका दर्शन करनेवाले, द्वारकास्थ, मथुरास्थ, व्रजस्थ- मुखचन्द्रके दर्शन करनेवाले हम तो इस समयका, जबकि वे अपने सखाओंद्वारा वनमें निवेशन करनेवाले हैं, तब उनका दर्शन करती हैं। जिन्होंने ‘जुष्टं’ प्रीति-अनुराग-स्नेहपुरःसर ‘पौनःपुन्येन अभ्यसन’ किया, उनका साफल्य है। फिर जिन्होंने सर्वभोग्या अधरसुधाका पान किया, उनका क्या पूछना ? व्रजांगनाओंका उपालम्भनयुक्त मनोभाव ‘पशून्नु’—व्रजांगनाएँ गौओंको जब अपने दर्शनमें विघ्न समझतीं, तब उन्हें पशु कहने लगती हैं। कहती हैं, उनका दर्शन हमें परम दुर्लभ है। जहाँ क्षण भी कल्पकोटिशत, वहाँ सम्पूर्ण दिवस कैसा बीतता होगा? निर्निमेष नयनोंसे श्रीकृष्णचन्द्रके आगमनकी प्रतीक्षा करती रहती हैं। जब श्रीकृष्ण पधारते हैं, तब धूलि उड़ती देख पानी भरनेके व्याजसे झरोखोंमेंसे धूलिमें ही टकटकी लगाती हैं कि श्रीकृष्ण आते हैं। कहीं विलम्ब होता तो ब्रह्मा, रुद्रको कोसतीं कि जब श्यामसुन्दर आते हैं, तब ऋष्यादि उन्हें वन्दन करते हैं। अतः उन्हें आनेमें देर लग जाती है—‘वन्द्यमानचरणः पथि वृद्धैः।’ (श्रीमद्भा० १०।३५।२२) यदि ब्रह्मादि वन्दन करते हैं, तब व्रजांगनाओंको बड़ा खलता है कि देखो सखि! पहले तो उनके आनेमें देर और फिर ये अमर बीचमें आये। इसी समय जब प्रभु सखाओं और गौओंकी ओटमें हो जाते हैं, तब गौओंको ‘पशु’ कहती हैं। जो हृदय न पहिचाने, वह पशु है। सखि! इनको हमारे हृदयका क्या पता? हमें विप्रयोगमें कितना कष्ट होता है! यदि इनको हमारी पीड़ा मालूम होती तो ये आड़ न हो जातीं। इसलिये गौको पशु कहा। इन्हींके लिये हमारा नित्य विप्रयोग होता है। ज्ञानदृष्टिसे पशु हैं ब्रह्मनिष्ठ— ‘सर्वानविशेषेण पश्यतीति पशुः’। ये सब अमर ब्रह्मनिष्ठ गोरूपमें श्रीकृष्णका दर्शन करने आये हैं। साथ-साथ विधाताको भी कोसती हैं कि ‘जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद् दृशाम्॥’ (श्रीमद्भा० १०।३१।१५) जब सायंकालको श्रीकृष्ण आते हैं और हमारे नैन दर्शनमें संलग्न होते हैं, तब पलकें पड़ती हैं। यह बड़ा विघ्न है। इन पलकोंको बनानेवाला जड़ था। यदि रसिक होता तो पलकें न बनाता। यह उसने बड़ी गलती की है। श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं—व्रजांगनाएँ परस्पर कहती हैं—सखियो! आपलोग विधाताके दिये हुए नेत्र, श्रोत्र, त्वक्, मन, बुद्धि आदिको विफल कर रही हो। इसलिये धैर्य-लज्जाको जलांजलि देकर श्रीवृन्दावनमें श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके अमृतमय मुखचन्द्रका दर्शन करके नेत्रादिको सफल करो— ‘यैर्दृष्टं स्पृष्टं निपीतं तेषामेव इन्द्रियसाफल्यम्।’ यदि इन श्रोत्रोंसे श्यामसुन्दरके वचनामृतका पान नहीं किया तो बधिर होना ही अच्छा। यदि इन नयनोंसे मनमोहनका विलोकन नहीं होता तो विलोचन न होना ही ठीक है। तभी तो जिन भावुकोंको स्वप्नमें भी इस रसका आस्वादन हुआ, उन्हें अन्य दर्शनादि सुहाते नहीं। कहा है—‘लखी जिन लाल की मुसकान, तिनहीं बिसरी सुध-बुध सबही।’ सुनते हैं कि एक बार सूरदासजी दर्शनके लिये वृन्दावनमें पहुँचे। वहाँ प्रभुको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते कुएँमें गिर पड़े। इतनेमें जिसको