भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 138

१२८ भक्तिसुधा

'हे सखि! वृन्दावनमें श्रीकृष्ण कैसे हैं?' (इन व्रजांगनाओंको आसक्तिकी महिमासे वहीं घरपर बैठे- बैठे श्रीकृष्णका दर्शन हो रहा है) सुकोमल नवीन हरे-हरे, लाल-लाल आम्रपल्लव श्रीकृष्ण और बलरामके अंगोंके भूषण हैं। मुकुट, कुण्डल, हार, अंगद, कंकण, कांची, नूपुर इत्यादि रत्नमय भूषण हैं ही, किंतु इनके अतिरिक्त यह वेश सुकोमल, देदीप्यमान, अरुण, सरस आम्रपल्लवको धारण किया है और मयूरपिच्छसे बनी हुई कलिकाएँ धारण की हैं, उन कलिकाओंका मण्डलमय मुकुट विशाल भालपर विराजमान है। यह प्राकृतिक श्रृंगार है। मोरमुकुटके संनिधानमें ही सजावटके साथ बर्हमय अर्थात् मयूरपिच्छके बने हुए गुच्छे हैं। उत्पल तथा अब्ज अर्थात् रात्रिविकासी तथा दिवसविकासी दो प्रकारके कमलोंकी माला शोभती है। ऊपरसे दामिनीद्युतिविनिन्दक अद्भुत पीताम्बरसे श्रीअंग आवृत है। यही परिधान अर्थात् नीलाम्बर-पीताम्बरसे विचित्र मनोरम वेशवाले वे श्रीकृष्ण-बलराम दोनों वृन्दावनके पशुपालगोष्ठीमें नटवर वेश धारण किये विराजमान हैं। कदाचित् गायन और नृत्य भी करते हैं। यहाँ इसी श्लोकके आगे वेणुचर्चा है। इससे यह कहना है कि वह उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक श्रीकृष्ण नटवर वेश धारण किये हुए गोपाल वेशमें रसका अभिनय करते हुए विराजमान हैं। ऐसे सरस उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके दर्शनका यही अवसर है। चूतप्रवालबर्हस्तबकोत्पलाब्जादि धारणसे रसात्मक स्वरूप विचित्र हो गया अर्थात् परमानन्द रसामृतमूर्ति पूर्णतम पुरुषोत्तममें विचित्रता आ गयी। स्वयं रसात्मामें यह तीन-चार बातें—१. आम्रपल्लव, २. बर्हस्तबक, ३. उत्पलाब्जमाला और ४. पीताम्बर विशेष हैं। स्थायीभाव, व्यभिचारिभाव, अनुभाव—ये तीन भाव होते हैं। चूतप्रवालसे उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक स्वरूपमें शृंगाररसका स्थायीभाव प्रदर्शित किया। सरस सुकोमल अरुण आम्रपल्लवसे सरसता, अरुणिमा, राग सूचित है, कोमलता सूचित है।

लौकिक दृष्टिसे व्रजांगनाओंके हृदयमें यह रूप व्यक्त करना है। उनके हृदयमें यदि निर्विशेष स्वरूप व्यक्त हो तो उनके सर्वेन्द्रियोंके साफल्यकी आशा नहीं है। 'बर्हस्तबक' से व्यभिचारीभाव दिखलाया। एक रस धर्मी होता है और एक रस होता है धर्म। प्रभुका मंगलमय श्रीअंग रसधर्मी है। उसमें सरस आम्रपल्लव- धारणसे रस स्थापित किया एवं रसात्मा श्रीकृष्णमें रसका संचार हुआ। भावुक रसके लोभी होते हैं, यह तो ठीक है, पर यहाँ तो रस भी इसका लोभी हो रहा है। संचारीभाव (व्यभिचारीभाव) बर्हस्तबकसे कैसे? तो इसका भाव यह है कि मयूरमें रसाक्रान्ति कदाचित्क है। नील नीरदके दर्शनसे जब उसमें रसोल्लास होता है, तब वह नृत्य करता है और उसी समय उसके पिच्छ गिरते हैं। ऐसा मयूरपिच्छ धारणकर संचारीभाव दिखलाया। रसको उत्पन्नकर ये भाव अस्तंगत हो जाते हैं, सदा नहीं रहते। विभाव दो तरहके होते हैं—आलम्बनविभाव और उद्दीपनविभाव। रसका आलम्बन (विषय) आलम्बनविभाव है। व्रजांगनाओंके लिये रसालम्बन श्रीकृष्ण हैं अर्थात् वही आलम्बनविभाव हैं। जिन-जिन भावोंसे प्रियतममें भाव अधिक हो, वह वेणु, मलयनिल, चन्द्रादि उद्दीपनविभाव हैं। ये तीनों (आलम्बन-उद्दीपनविभाव और अनुभाव) रसानुभव करानेवाले होते हैं। इनमें उत्पलाब्जमालासे अनुभाव दिखाया गया है। उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दमें समस्त रसानुभवकी सामग्री है। व्रजांगनाएँ निर्विशेष समझकर उद्विग्न हो जायँ, इसलिये विचित्र सरस होकर श्रीकृष्णका प्राकट्य हुआ है अथवा आम्रपल्लवसे रजोगुण सूचित किया। उसकी सरसतासे सानुरागता तथा अरुणिमासे राग। सत्त्वगुण स्वच्छ होता है, तमोगुण श्यामल तथा रजोगुण लाल। यद्यपि निर्गुण, निराकार, परमात्मामें सत्त्व, रज, तम—ये तीनों गुण नहीं हैं, वे प्राकृतमें होते हैं। किंतु यहाँपर ध्यान रखना चाहिये कि रागमात्र-सूचनके लिये रजोगुण-सूचन है। अप्राकृत अलौकिकमें भी सत्त्व, रज, तम हैं। तभी