भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेणुगीत १२९
श्रीवल्लभाचार्य ब्रजांगनाओंमें सात्विकी, राजसी, तामसी ऐसे तीन भेद करते हैं। उन प्रत्येकमें भी त्रिविध हैं और एक निर्गुण। इस प्रकार दस तरहकी व्रजांगना बतलाते हैं। 'गोपीगीत' में सबकी उक्तियाँ अलग- अलग दिखलायी हैं। 'रासपञ्चाध्यायी' को उन्होंने तामस प्रकरण कहा है। तात्पर्य यह है कि प्राकृत विषय दूषणसे दूषित है। जहाँ लीला है, वहाँ अवष्टम्भात्मक तम, चांचल्यात्मक रज और प्रकाशात्मक सत्त्वकी अपेक्षा है ही। वह लीला चाहे प्राकृत हो या अप्राकृत। किंतु यहाँ लीला है अप्राकृत, अलौकिक। अतः इसमें भी तीनों दिखलाया है। सरस आम्रपल्लव धारणकर अरुणिमा, राग, प्रेम सूचित किया है। यह उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्ण व्रजांगना वृषभानुनन्दिनीके प्रति सराग हैं, यह सूचित किया जाता है; क्योंकि वे उदासीन हैं, ऐसा किसीको विभ्रम न हो। यदि उनमें राग न हो तो निराशा हो जाय। उदासीन हों तो वृषभानुनन्दिनी, ब्रजांगनाएँ प्रभुको अपना रसालम्बन कैसे बनायें? रसालम्बन नीराग, नीरस, हृदयशून्य थोड़े ही होता है। इसीलिये उदासीनता, निराकारताका संगोपन करनेके लिये आम्रपल्लव धारणकर सरसता तथा सापेक्ष्य सूचित किया है। इस लीलामें निरपेक्षता छिपायी जाती है, सापेक्षता प्रकट की जाती है। नहीं तो क्षीरसागर जिसकी राजधानी है, वह क्षीरकी चोरी कैसे करे? इसलिये सब गुण ऐश्वर्यमायादि छिपाये जाते हैं। बर्हस्तबक-धारणसे तमोगुण सूचित किया है। वह अवष्टम्भात्मक है। अवष्टम्भका अर्थ है रुकावट। इससे आसक्ति सूचित होती है। आसक्ति तमोगुणका कार्य है। जैसे कोई दुराग्रही दुरभिनिवेशवशात् विषयसेवनसे हटाये नहीं हटता। यह आसक्तिका स्वरूप है। तत्सूचक श्यामल मयूर-पिच्छके गुच्छाओंसे निर्मित मुकुट धारणकर वृषभानुनन्दिनी-विषयिणी आसक्ति व्यक्त की। कहा कि 'मैं उदासीन नीरस नहीं, मैं तो नित्य निकुंजेश्वरी वृषभानुनन्दिनीस्वरूपासक्त श्रीकृष्ण हूँ।' ऊँची दृष्टिसे यह भगवान्की भक्तिमें आसक्ति है। भक्त कहते हैं—'प्रभु जब उदासीन, स्तब्ध हैं, तब हमारी रक्षाका ध्यान कैसे रखेंगे!' यह आसक्तिभाव विशेषकर वृषभानुनन्दिनीमें ही बनता है। वे वृषभानुनन्दिनीके आसक्तिका-अनुकम्पाका पात्र ही बनना चाहते हैं। कहते हैं कि वृषभानुनन्दिनीके वसनपवनसे श्रीकृष्णचन्द्र अपनेको कृतार्थ मानते हैं। उत्पलाब्जमाला (रात्रिविकासी-दिवसविकासी कमल- माला)-धारणसे सत्त्व सूचन करते हैं। पहलेसे रागका, दूसरेसे गाढ़ासक्तिका तथा तीसरेसे व्यसनका सूचन है अर्थात् वृषभानुनन्दिनीके मुखचन्द्रके दर्शन- चिन्तनका-भक्तानुसन्धानका व्यसन सूचित करनेके लिये उत्पल तथा सौरभसे स्थिर वासना विवक्षित है। ऐसा उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द एवं वृषभानुनन्दिनी-विषयक राग- आसक्ति-व्यसनयुक्त तत्त्व व्यक्त हुआ। यही भक्तोंके कामका है। नीरस, निर्विकार नहीं। यह रसधर्मी श्रीकृष्णका स्वरूप व्यक्त है अथवा इससे रसरूप सौगन्ध्य व्यक्त है। सरस आम्रपल्लवसे सरसता, बर्हस्तबकसे रूप और उत्पलाब्जमालासे सौगन्ध्य सूचित है। यदि 'रसे रसानङ्गीकरात्' इस मतके अनुसार ब्रह्म नीरूपादि हो तो भावुकोंके किस कामका? रूप-रसादियुक्त होनेसे सर्वाभोग्या अधरसुधाकी लालसावाली ब्रजांगनाओंकी, रूपभोगियोंकी और सौगन्ध्यभोगियोंकी भी उसमें प्रवृत्ति होगी, यह दिखलाना है। ऐसा यह रसात्मक रूप सर्वथा छिपानेकी चीज है, इसलिये पीताम्बरसे वह ढका हुआ है अर्थात् कपटचातुर्यसे राग, आसक्ति, व्यसन छिपाना है। यहाँपर भाववृक्षका राग बीज, आसक्ति कलिका तथा व्यसन फूल कहा है अर्थात् श्यामसुन्दरकी सुमधुर अधरसुधापानसे व्रजांगनाओंके सस्नेह सरस हृदयमें श्रीकृष्ण प्रभुने वंशीद्वारा भावबीज बोया। बीज भी किन्हीं देशोंमें बाँससे बोया जाता है। इसलिये वह बाँसके वंशीसे ही बोया। बोते ही वह अंकुरित हुआ, उसमें आसक्तिरूपी कली लगी। कलीमें भी रूप, रस, सौरभ रहते हैं, पर छिपे रहते