भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 140

हैं, इसके बाद जब व्यसन हुआ, तब वह फूल उठा। जब पुष्प विकसित हुआ, तब रूप, रस और सौरभ व्यक्त हुए। इस प्रकार व्यसनावस्था (संसारका व्यसन नहीं, वह तो घोर नरकका मूल है) ही भावुक जीवनको सुखमय बना देती है। बिना दर्शन, परिरम्भण, अधरामृतपानके न रहा जाय—यह राग, आसक्ति, व्यसन है। यह महाभाग्यकी बात है। कोई बर्ह अलग लेते हैं और स्तबक अलग लेते हैं। बर्ह यानी मयूरपिच्छ तथा स्तबक यानी फूलोंके गुच्छे। उत्पलाब्जमालासे यह दिखलाया कि विकसित उत्पलमें ही पूर्ण रूपसे रस, रूप, सौरभ होते हैं। रस, रूप, सौरभ कलिकामें भी होते हैं, पर वह अविकसित हो तो कैसे मालूम पड़ें। इसलिये उत्पल-अब्ज दोनों लिया। कारण यह है कि रात्रिविकासी दिवसमें अविकसित रहता है और दिवसविकासी रात्रिमें अविकसित रहता है। यदि एक ही प्रकार हो तो नैरन्तर्येण उनकी प्रतिष्ठा नहीं हो सकती है। एक कानमें कर्णिकार, दूसरेमें उत्पल और दक्षिण हस्तमें अब्ज (नीला कमल) है अर्थात् पहला स्वरूप जो 'बर्हापीडं नटवरवपुः' द्वारा वर्णित किया था। उसी स्वरूपका इसमें वर्णन है। और भी कुछ- कुछ सामग्री है, इतना ही भेद है। श्रीवल्लभाचार्य कहते हैं—यहाँ तीनोंसे रज, तम, सत्त्व बोधित है अर्थात् आम्रपल्लवसे रज, मयूरपिच्छसे तम और उत्पलाब्जमालासे सत्त्वका सूचन है। इसलिये इनके ही विशेष आकारसे आविर्भूत नव रसोंका सूचन भी है एवं उद्बुद्ध उभयविध श्रृंगाररसात्म श्रीकृष्णचन्द्र नवरस सम्मिलित हैं, अतएव तत्कृत वैचित्र्य भी है। यही बात 'विचित्रवेषौ' से दिखलायी। कह सकते हैं कि तब तो यहाँ विरोध प्रतीत होता है। वहाँ कहा था कि केवल रस ही नाट्यमें व्यक्त होता है। संप्रयोगमें रसधर्मसहित रसधर्मी व्यक्त होता है। 'नटवरवपुः' में यही कहा है। 'नट' से विप्रयोगात्मक शृंगार और 'वर' (दूल्हा)-से सम्प्रयोगात्मक शृंगार कहा था तो नटवत् जहाँ केवल रस है, रसधर्मी नहीं; क्योंकि जहाँ सामग्रीसहित रस प्रकट है, वहीं धर्मसहित रस धर्मी है। यहाँ सामग्रीरहित नटकी तरह अभिनयद्वारा सब आरोपित-ही-आरोपित होते हैं, सामग्री बिना रसकी जहाँ व्यंजना होती है, वहाँ केवल रस होता है, परंतु जहाँ वर (दूल्हा) प्रत्यग्र भोक्ता है, वहाँ तो सर्वनायक-नायिका स्पष्ट है, सामग्री भी प्रत्यक्ष है। अतः वहाँ धर्मसहित धर्मोंका प्राकट्य है। अब यहाँ आम्रपल्लवसे स्थायीभाव, मयूरपिच्छसे व्यभिचारीभाव और उत्पलाब्जमालासे अनुभाव दिखलाया। उनमें राग, आसक्ति, व्यसन कहा। उन्हें भाववृक्षका अंकुर, कलिका, फूल बतलाया। उसमें रूप, रस, सौरभका विकास कहा। व्यसनद्वारा निरन्तर भोग कहा, जिसमें श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका पूर्णरूपेण आस्वादन बतलाया। जब उत्पलाब्ज विकसित है, तभी उसका रूप, रस और सौरभ स्थिर है। फिर श्रीकृष्ण सम्भोगका व्यसन हुआ। 'अहोरात्रं वासना स्यात्' यहाँ व्यसनकी निरन्तरता है और वही व्यसन भी है। जो छूट जाय वह व्यसन नहीं, जिसके बिना रहा न जाय, वही तो व्यसन है। वेद-शास्त्रादिके प्रयत्न करनेपर भी जो न छूटे, वह व्यसन है। उसीके आच्छादनके लिये, उसीको छिपानेके लिये परिधान बतलाया। तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्ण परमानन्द रागवान्, आसक्तिमान और व्यसनवान् होकर व्यक्त हैं एवं वे रसधर्मी हुए। अब विप्रयोग न रहा, सम्प्रयोग हुआ। यही संदेह है, इसपर कहते हैं कि यह भी अभिनय ही है। यद्यपि एक दृष्टि ऐसी है कि वहाँ वनसुन्दरी आधिदैविकी शक्तियोंको पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका सम्प्रयोग रस ही प्राप्त है, वहाँ प्रभुके प्रत्यक्ष रमण करनेसे, पर व्रजांगनाओंके लिये विप्रयोग ही है। सामग्री होते हुए भी नट अभिनयद्वारा सामग्री व्यक्त करता है। वैसे सम्प्रयोग न होनेपर भी आरोपादिद्वारा उसका प्राकट्य है। अभिनय कहीं शब्दोंद्वारा, कहीं कायिक व्यापारद्वारा और कहीं विभिन्न सामग्री-धारणद्वारा होता है। यहाँ प्रभुका सरस-शृंगारात्मक स्वरूप व्रजांगनाओंमें व्यक्तकर उन्हें