भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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आन्तर रमण कराना है। बाह्य रमणमें जितनी सामग्री होती है, उतनी ही आन्तर रमणमें भी अपेक्षित है। अन्तर केवल यह है कि बाह्य सम्बन्ध नहीं होता, इस समय गोपालगोष्ठीके नटवर वेशका व्रजांगनाएँ आसक्तिवशात् अनुभव कर रही हैं। यहाँ सभा गोपालोंकी है, पर यह अभिनय उन्हींके लिये नहीं, व्रजांगनाओंके लिये भी है। एवं विशेषणविशिष्ट स्वरूपका अमृतमय, मुख-चन्द्रनिर्गत वेणुगीतद्वारा व्रजांगनाएँ अनुभव कर रही हैं। तात्पर्य यह है कि विप्रयोगात्मक ही शृंगार व्रजांगनाओंके लिये है। और जगह और नटोंद्वारा जो भावना सामाजिकोंद्वारा होती है, वह अभिनिवेशमात्र है, मनोराज्यमात्र है, किंतु यहाँपर तो इनकी भावना फलपर्यवसायिनी है। भावुकोंकी भावना मनोराज्य नहीं होती। वह जैसी भावना करते हैं, वैसी वस्तु हो जाती है। कहा है कि 'यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय॥' (श्रीमद्भा० ३।९।११) अर्थात् भावुकोंकी जैसी भावना होती है, वैसा ही प्रभु स्वरूप बनाते हैं। इस दृष्टिसे इस अभिनयद्वारा भी श्रीव्रजस्थिता व्रजांगनाओंमें जो भाव व्यक्त होंगे, वे सच्चे ही होंगे। यहाँ यद्यपि केवल 'वर' ही कह सकते थे, पर विप्रयोग मर्यादा-रक्षणार्थ 'नट' भी कहा। अभिनयसामग्रीसहित आधिदैविक शक्तियोंमें सम्प्रयोग और व्रजांगनाओंमें विप्रयोग उत्पन्न करते हुए प्रभु नटकी तरह नटवर वेशसे सभी भावोंको व्यक्त करते हैं। इसका अनुभव करती हुई व्रजांगना कहती है— सखि ! विधाताके दिये हुए लोचनोंको अर्थात् अंग- प्रत्यंगको सफल करो। इतने सुन्दर दर्शन ब्रजमें न होंगे। पशुओं, गोपालोंकी भीड़में मनमोहन व्रजेन्द्रनन्दन जब ब्रजसे वृन्दावनमें जाते हैं, तब दर्शन निर्विघ्न नहीं होता। पशु, लज्जा, पलकें, गोपालवधू इनका व्यवधान हो जाता है। सखि ! निकुंजमें छिपकर श्यामसुन्दरका दर्शन करेंगे। यहाँ वैसा संवाद, नृत्य, गायन नहीं हो सकता—'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः।' यहाँ व्रजेशसुत इसलिये कहा कि यदि श्वश्रू, ननन्दा कान दें तो दें, हम क्या अनुचित कहती हैं ? जड़, चेतन, पशु जब सब ही व्रजराजकुमारके अमृतमय मुखचन्द्रके दर्शनाभिलाषुक हैं, वे प्राणिमात्रके परप्रेमास्पद हैं, तब कुछ चिन्ता नहीं। सखि! चलो 'गायमानौ गायेन मानः सत्कारः ययोः तौ' नटका लोग सम्मान करते हैं, पर सर्वस्व नहीं देते। यहाँ प्रभुके लोकोत्तर गायनमें गोपाल सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं। 'गायेन मानः अहङ्कारः ययोः' प्रभु कहते हैं—आओ, तुममें है कोई ऐसा गायन करनेवाला। इस प्रकार अभिनय तीन प्रकारका दिखलाया—१. परमसात्त्विक, २. नृत्यद्वारा तामस और ३. गायनद्वारा राजस। ऐसे श्रीकृष्ण-बलराम 'मध्ये विरेजतुः'। गोपांगनाओं द्वारा वेणु आदिके प्रति ईर्ष्याभाव गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणु- दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्। भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसं हृदिन्यो हृष्यत्त्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवो यथार्याः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।९) व्रजांगनाएँ कहती हैं—सखि! इन गोपालोंकी सौभाग्य-महिमा कौन कहे, वे परम अन्तरंग हैं। सखि! वे तो श्यामसुन्दरके सखा गोपालगण श्यामसुन्दरके मुखचन्द्रका दर्शन करते हैं, परिरम्भण भी करते हैं और खेल खेलते हैं। उनकी महिमा अचिन्त्य है। वह सौभाग्य हमें कहाँ? वैसी स्वतन्त्रता हमें कहाँ? पर सखि! देखो, यह जो नीरस दारुमय वेणु है, इसका सौभाग्य तो देखो! सनातन गोस्वामी कहते हैं कि यहाँ महाभावकी स्फूर्ति है। उससे व्रजांगनाओंको श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी मंगलमयी मूर्तिके सर्व

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