भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें१३२ भक्तिसुधा
अतः मिथ्या कल्पना उस रसमय भक्तिरसामृत- सिन्धुकी लहरी है। यहाँ मूर्च्छामरण-अपस्मार रस है। संसारके लिये जो विपत्ति है, वही यहाँकी सम्पत्ति है। प्रियतम प्राणधन श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके विप्रयोगजन्य तीव्र तापमें व्रजांगनाओंकी मूर्च्छा यहाँ रस-रूप है। संसारकी तृष्णा तृष्णा है, आशा दुराशा पिशाची है। भगवान्के चरणारविन्दकी आशा कल्पलता है। यहाँकी ईर्ष्या मिथ्याकल्पना रसमयी है। इसलिये वेणुको शुष्क काष्ठ कहना रस है। सनातन गोस्वामी कहते हैं—वंशीमें शुष्कता, नीरसता, सच्छिद्रता, सग्रन्थिताके आरोपमें भगवान्को रस आता है, वेणु भी प्रसन्न होती है। व्रजांगना कहती है—सखि! यदि श्यामसुन्दर मनमोहन किसीसे न मिलते तो कोई संताप न होता, पर अपने संगी गोपालबालकोंको प्रभु निर्भरपरिरम्भण करते हैं, इसलिये ईर्ष्या होती है। सखि! यह कुण्डलस्थ मकरी निःशंक होकर श्रीकृष्णचन्द्रके मुखचन्द्रका चुम्बन करती है, माला श्यामसुन्दरके वक्षःस्थलपर बिहरती है, इन जड़ वस्तुओंको—अनधिकारी जड़ोंको—परमरसामृतमूर्ति श्रीकृष्णचन्द्रका संस्पर्शादि सब कुछ प्राप्त है, हम हतभागिनियोंको नहीं। अस्तु, गोपालोंका कथंचित् सोढव्य है। यह वंशी जड़, देखो! शुष्क, काष्ठ, निःसार, पोला, सच्छिद्र, सग्रन्थि, नीरस, वेणु, वंशी इसने कौन पुण्य किया, कौन तप-जप-ध्यान किया, जिससे इसको यह अलौकिक परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। सखि! यदि यह विदित हो तो हम भी वही तपस्या करके बाँसकी वंशी बनें। गोपांगना-जन्ममें कृतार्थता—सफलता नहीं प्राप्त है। सखि! यह साधन दुरूह है; क्योंकि अपने तो उपनिषद्रूपा हैं— वेदऋचा हैं। जितना भी पुण्यकर्म जप-तप है, सब वेदोंसे ही प्रकाशित होता है तो सखि! इसने कौन- सा अद्भुत कर्म किया, जो हमें भी दुर्ज्ञेय है, जिसका अनुष्ठानकर इसने यह सौभाग्य प्राप्त किया। ‘दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्।’ ‘वेणुः’ ऐसा पुंस्त्वका निर्देशकयह सूचित किया कि पूर्णतम पुरुषोत्तमरूपमें प्रकट भगवान्का सम्भोग गोपांगना-भावापन्न ही करेंगे। यह तो पुमान् है, यह भगवान्का सम्भोग कैसे करे? यह अनधिकारी है। फिर शुष्क भी है। सरस होता तो बात दूसरी रही। ‘वंशी’ कहते तो अधिकार सूचित होता। इसीलिये जानबूझकर वैसा नहीं कहा। तो यह वेणु हमारे श्यामसुन्दरके हस्तारविन्दमें निरन्तर विराजमान है, कभी उदरमें, कभी मुखचन्द्रमें, कभी वक्षःस्थलपर विराजता है। अस्तु, अब तो ‘सुधामपि भुङ्क्ते’ सर्वत्र रहनेकी, इतनी धृष्टता तो की, पर यह धृष्टता तो देखो। दामोदरमनमोहनके अधरसुधाका सम्भोग करने लगा। अबतक यही धृष्टता थी कि प्रभुका आलिंगन-संस्पर्शादि करता रहा। यह पर्याप्त था, पर अब आगे बढ़ा। सखि! ‘अयं वेणुः युष्माकं दामोदराधरसुधाम्’ आपलोगोंकी व्रजांगनाओंकी निधि परमधनभूता दामोदरके अमृतमय मुखचन्द्रको इसने स्वयं यानी आपकी सम्मति बिना पान किया। हमारे श्यामसुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र हैं, उनके श्रीअंगका स्पर्श किया। हमारे मनमोहनकी सुधाको हमारी आज्ञा बिना भोगने लगा। नेक पूछा भी नहीं। ‘गोपिकानाम्— तदेकाशयैव गोपिकानाम् (गुपू रक्षणे)’ यह अमृतमय मुखचन्द्रकी अधरसुधा हम गोपिकाओंकी है। एक मनमोहन श्यामसुन्दरके सुमधुर अधरसुधाके सम्भोगके लिये ही हमने अपने देह-प्राणोंका रक्षण कर रखा है, केवल इस आशासे कि कभी वह अधरसुधा भोगनेको मिलेगी, नहीं तो यह कभी चले गये होते। सखि! वह जीवनाधार, प्राणाधार सर्वस्व है। यह ममता कि प्रभु हमारे हैं। मनमोहन श्यामसुन्दर हमारे ही हैं। सखि! हमसे कुछ पूछताछ न किया। ‘दामोदराधरसुधाम्’ कहा, क्या मनमोहनका ठेका तुमलोगोंने ले रखा है? यह तो पूर्णतम पुरुषोत्तम निखिल विश्वके हैं। हमारे ही प्रणयपाशसे बँधे हैं। हमारी व्रजेन्द्रगेहिनीने उनको प्रणयपाशसे बाँध रखा था। यदि हमारे न होते तो कैसे बाँधे जाते? यदि सबके होते तो और भी बाँधते। क्या किसीने बाँधा?