भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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वेणुगीत १३३ ललनको जब नन्दरानी बाँधने लगीं तो रज्जु दो अंगुल कम हुई। गोकुलभरकी रस्सियाँ लगीं, पर बछड़ोंकी नहीं! यह व्रजेन्द्रगेहिनी अपने ललनके सुकोमल अंगको कठोर रज्जुसे कैसे बाँधे? रेशमोंकी सुकोमल डोरियाँ थीं, जिसमें लालाको कष्ट न हो। वात्सल्यरससागर जिसके हृदयमें उमड़ रहा है, वह करुणामयी पुत्रवत्सला अम्बा कैसे कठोर रज्जु ले? दो अंगुलकी कमी हुई। भावुक कहते हैं कि परमात्मा बँधते, पर बिलकुल बँध जायें तो गजब हो जाय, जब सब रज्जु कम पड़ी, तब वृषभानुनन्दिनी आयीं, कहा—'हमारे वेणीका पाश है, लो'। जब उन्होंने अपनी वेणीका बन्धन दिया, तब प्रभुने कहा—इसके बन्धनमें तो हैं ही। भगवान् माधुर्याधिष्ठात्रीके प्रणयपाशमें हैं ही। 'दाम-रस्सी थी उदरमें जिसके' अर्थात् वृषभानुनन्दिनीके, हमारी स्वामिनीके उस वेणीबन्धनसे श्रीकृष्ण बँधे थे। हमारे थे तभी न बँधे! इसलिये उनकी सुमधुर अधरसुधा हमारी है। ऐसी प्राणाधारभूता सुधाको यह वेणु भोगने लगी। अबतक क्षमा किया, अब नहीं रहा जाता। 'हे गोप्यः!' आपलोग क्यों गोपी हुईं, गोपी-जन्ममें जन्मकी सार्थकता नहीं है, वेणुजन्ममें है, अतः चलो वेणु बननेका प्रयास करो। कहा—सखि! आप यों ही दोषारोपण उसमें करती हो। दामोदरका मुखचन्द्र तो ज्यों-का-त्यों ही सरस है। यदि वह सम्भोग करता तो वह शुष्क हो जाता! कहा—रस-ही-रस तो रहा है, सुधा तो सब उसने भोग ली। 'अवशिष्टं रसो रसमात्रं यथा स्यात्तथा।' अथवा कहा—सखि! शुष्क बाँसका वेणु कितना भोगेगा, भोग लेने दो। हमारे श्रीकृष्णचन्द्रकी अधरसुधा अपरिमित है, अनन्त है। 'अवशिष्टो रसो रागो यस्मिन् तत्।' इतना ही नहीं कि यह हमारे श्यामसुन्दरकी अधरसुधाका सम्भोगकर तृप्त हो गयी, पर नहीं, अभी इसका राग मिटा नहीं। कितने दिनसे अधरसुधाको भोगती है, पर वही लालसा बनी ही है। इसलिये वह सदाके लिये सौत बन गयी। ऐसे भक्तोंकी भावना यह है कि हमारे भगवदरसका सब ही आस्वादन करें। भक्त यदि सौतियाडाह करें तो दूसरेको भक्त बनायें कैसे? यदि उनमें मूलतः कमी होती तो सोचते कि उसमें कमी होगी। वास्तवमें सांसारिक रस कम होनेवाला है, पर यह परमानन्दरसामृतस्वरूप सच्चिद्घन परब्रह्म अपार है, कितना ही सम्भोग करो चुकेगा थोड़े ही! कितने ही परमहंसोंने रस लिया, पर चुका नहीं। इसलिये वह भोक्ता दूसरे भोक्तासे ईर्ष्या नहीं करता। जिनका भोग्य ससीम हो, वह दूसरोंका उपस्थान नहीं चाहते हैं। यह तो अगाध है, इसलिये कहते हैं आओ, बल्कि वंचितोंको देखकर घबराते हैं। कहा है—'जाकर मन' जिन्होंने इन परम रसामृतमूर्तिका स्वाद न लिया, उनके नाम वह आँसू गिराते हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभु इसीलिये रोते थे कि ये लोग श्रीकृष्णरससे वंचित हैं। कुछ लोग कहते हैं— श्रीगौरांगको उन्मादका रोग था। था तो मगर दूसरे ढंगका। भावुक कहते हैं, ऐसा उन्माद हमें हो जाय। जहाँकी वस्तुस्थिति ऐसी है कि ईर्ष्यापूर्वक मिथ्या कल्पना है। यह प्रेमका विचित्र एक भाव है—अतृप्ति है—तृष्णा है। भक्तोंको यदि सन्तोष हो कि आज वही पूजा करें तो भक्त कैसे? वे जानते हैं कि हम अगर भोग न लगाये तो प्रभु भूखे रहेंगे। यह भावना हो गयी कि प्रभु तृप्त हैं तो भाव बिगड़ गया। यह सहृदय-हृदयवेद्य है। इस अपरिमित अगाध रसमें भी भावका—हमारी सर्वस्वभूता अधरसुधाका सम्भोग यह वेणु करता है। न जाने यह कितने दिनतक हमारेमें हिस्सा बँटायेगा। अथवा—'अवशिष्टं वशिष्टं (वष्टिभागुरिरल्लोपः) न वशिष्टः रसमात्रं यस्मिन्।' इस वेणुने अधरसुधाका इतना सम्भोग किया कि रस भी नहीं रह गया। निरवशेष सम्भोग किया। अथवा— क्या प्रमाण कि शुष्क बाँसका वेणु ज्यों-का-त्यों पड़ा हुआ दामोदरके सुमधुर अधरसुधाका भोग करता है? कुछ भी सरस होता तो भोगता। इसलिये तुम व्यर्थ बहक रही हो। कहा—नहीं, देखो! इसका अवशिष्ट रस हृदिनीमें है। देखो, यह सच्छिद्र है तो एक ओरसे