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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

वेणुगीत १३३ ललनको जब नन्दरानी बाँधने लगीं तो रज्जु दो अंगुल कम हुई। गोकुलभरकी रस्सियाँ लगीं, पर बछड़ोंकी नहीं! यह व्रजेन्द्रगेहिनी अपने ललनके सुकोमल अंगको कठोर रज्जुसे कैसे बाँधे? रेशमोंकी सुकोमल डोरियाँ थीं, जिसमें लालाको कष्ट न हो। वात्सल्यरससागर जिसके हृदयमें उमड़ रहा है, वह करुणामयी पुत्रवत्सला अम्बा कैसे कठोर रज्जु ले? दो अंगुलकी कमी हुई। भावुक कहते हैं कि परमात्मा बँधते, पर बिलकुल बँध जायें तो गजब हो जाय, जब सब रज्जु कम पड़ी, तब वृषभानुनन्दिनी आयीं, कहा—'हमारे वेणीका पाश है, लो'। जब उन्होंने अपनी वेणीका बन्धन दिया, तब प्रभुने कहा—इसके बन्धनमें तो हैं ही। भगवान् माधुर्याधिष्ठात्रीके प्रणयपाशमें हैं ही। 'दाम-रस्सी थी उदरमें जिसके' अर्थात् वृषभानुनन्दिनीके, हमारी स्वामिनीके उस वेणीबन्धनसे श्रीकृष्ण बँधे थे। हमारे थे तभी न बँधे! इसलिये उनकी सुमधुर अधरसुधा हमारी है। ऐसी प्राणाधारभूता सुधाको यह वेणु भोगने लगी। अबतक क्षमा किया, अब नहीं रहा जाता। 'हे गोप्यः!' आपलोग क्यों गोपी हुईं, गोपी-जन्ममें जन्मकी सार्थकता नहीं है, वेणुजन्ममें है, अतः चलो वेणु बननेका प्रयास करो। कहा—सखि! आप यों ही दोषारोपण उसमें करती हो। दामोदरका मुखचन्द्र तो ज्यों-का-त्यों ही सरस है। यदि वह सम्भोग करता तो वह शुष्क हो जाता! कहा—रस-ही-रस तो रहा है, सुधा तो सब उसने भोग ली। 'अवशिष्टं रसो रसमात्रं यथा स्यात्तथा।' अथवा कहा—सखि! शुष्क बाँसका वेणु कितना भोगेगा, भोग लेने दो। हमारे श्रीकृष्णचन्द्रकी अधरसुधा अपरिमित है, अनन्त है। 'अवशिष्टो रसो रागो यस्मिन् तत्।' इतना ही नहीं कि यह हमारे श्यामसुन्दरकी अधरसुधाका सम्भोगकर तृप्त हो गयी, पर नहीं, अभी इसका राग मिटा नहीं। कितने दिनसे अधरसुधाको भोगती है, पर वही लालसा बनी ही है। इसलिये वह सदाके लिये सौत बन गयी। ऐसे भक्तोंकी भावना यह है कि हमारे भगवदरसका सब ही आस्वादन करें। भक्त यदि सौतियाडाह करें तो दूसरेको भक्त बनायें कैसे? यदि उनमें मूलतः कमी होती तो सोचते कि उसमें कमी होगी। वास्तवमें सांसारिक रस कम होनेवाला है, पर यह परमानन्दरसामृतस्वरूप सच्चिद्घन परब्रह्म अपार है, कितना ही सम्भोग करो चुकेगा थोड़े ही! कितने ही परमहंसोंने रस लिया, पर चुका नहीं। इसलिये वह भोक्ता दूसरे भोक्तासे ईर्ष्या नहीं करता। जिनका भोग्य ससीम हो, वह दूसरोंका उपस्थान नहीं चाहते हैं। यह तो अगाध है, इसलिये कहते हैं आओ, बल्कि वंचितोंको देखकर घबराते हैं। कहा है—'जाकर मन' जिन्होंने इन परम रसामृतमूर्तिका स्वाद न लिया, उनके नाम वह आँसू गिराते हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभु इसीलिये रोते थे कि ये लोग श्रीकृष्णरससे वंचित हैं। कुछ लोग कहते हैं— श्रीगौरांगको उन्मादका रोग था। था तो मगर दूसरे ढंगका। भावुक कहते हैं, ऐसा उन्माद हमें हो जाय। जहाँकी वस्तुस्थिति ऐसी है कि ईर्ष्यापूर्वक मिथ्या कल्पना है। यह प्रेमका विचित्र एक भाव है—अतृप्ति है—तृष्णा है। भक्तोंको यदि सन्तोष हो कि आज वही पूजा करें तो भक्त कैसे? वे जानते हैं कि हम अगर भोग न लगाये तो प्रभु भूखे रहेंगे। यह भावना हो गयी कि प्रभु तृप्त हैं तो भाव बिगड़ गया। यह सहृदय-हृदयवेद्य है। इस अपरिमित अगाध रसमें भी भावका—हमारी सर्वस्वभूता अधरसुधाका सम्भोग यह वेणु करता है। न जाने यह कितने दिनतक हमारेमें हिस्सा बँटायेगा। अथवा—'अवशिष्टं वशिष्टं (वष्टिभागुरिरल्लोपः) न वशिष्टः रसमात्रं यस्मिन्।' इस वेणुने अधरसुधाका इतना सम्भोग किया कि रस भी नहीं रह गया। निरवशेष सम्भोग किया। अथवा— क्या प्रमाण कि शुष्क बाँसका वेणु ज्यों-का-त्यों पड़ा हुआ दामोदरके सुमधुर अधरसुधाका भोग करता है? कुछ भी सरस होता तो भोगता। इसलिये तुम व्यर्थ बहक रही हो। कहा—नहीं, देखो! इसका अवशिष्ट रस हृदिनीमें है। देखो, यह सच्छिद्र है तो एक ओरसे

१३४ भक्तिसुधा

सम्भोग करता है, दूसरी तरफसे निकलता है। इसलिये यह दामोदरके अधरसुधाको निर्लज्ज होकर पान करता जाता है। यह अतृप्तिपुरःसर धैर्य छोड़कर पीता ही जाता है। वही वेणुनादरूपमें निकलता है। यह वेणुगीत सुमधुर अधरसुधा वेणुनादरूपमें प्रकट होकर नदियोंको मिला। देखो, उस वेणुरव—वेणुगीत पीयूषरूपमें प्रकट दामोदरके अधरकी अधरसुधाका पानकर सरसियोंको रोमांच हो रहा है। यही कहा 'हृष्यत्त्वचः' जिसके उच्छिष्ट रसको पानकर सरसियोंमें कमल-कमलिनी विकसित होते हैं—रोमांच हो रहे हैं। बड़े आनन्दोद्रेकमें रोमांच होते हैं तो क्या इसका उच्छिष्ट पान करनेवाली—ह्रदिनी पान करती है तो यह नहीं करता होगा? कैसे कहती हो 'बहन'! 'तरवोऽश्रु मुमुचुः'—सखि! तरुओंमें भी उसी नादसे मधुधाराएँ टपकने लगीं। श्रीकृष्णचन्द्र जब मुखचन्द्रपर वेणु धारणकर गीत विस्तार करने लगते हैं, तब लताओंमें, वृक्षोंमें मधुधारा टपकने लगती है। उसीपर व्रजांगनाओंकी कल्पना है कि मानो वृक्ष आनन्दाश्रु मोचन कर रहे हैं। शोकाश्रु गरम होते हैं। आनन्दाश्रु ठण्डे होते हैं। तोह करके पहिचानना चाहिये। जैसे आर्यजन परमरसामृतसिन्धुमें अवगाहनकर आनन्दाश्रु छोड़ते हैं, वैसे ही अथवा यह कि वेणुने जरूर दामोदरके अधरसुधाका भोग किया है; क्योंकि ये जो सरसी-सरिताएँ कमलसंयुक्त हो रही हैं, वह यह आनन्द है कि हमारे जलसे ही यह बाँसका वेणु सौभाग्यशाली है, जो—'गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।९) व्रजसीमन्तिनी कहती है—हे सखि, इस वेणुने कौन-सा पुण्यकर्म किया, जो यह दामोदरके अधरसुधाका पान करने लगी। अभीतक तो हृदयमें, करारविन्दमें रहती रही, पर अब तो अधरसुधाका सम्भोग कर रही है। यहाँपर 'दामोदर' से राधादामोदरका द्वन्द्व विवक्षित है तो दामोदरसे याने द्वन्द्वमें एकका नाम लेनेसे अन्य सम्बन्धका भी बोध होता है, अर्थात् इस वेणुने रासेश्वरी नित्यनिकुंजेश्वरी जो वृषभानुनन्दिनी है, उसके जो प्रियतम प्राणधन श्रीदामोदर हैं, उनके सुमधुर अधरसुधाको भी पान करना आरम्भ किया। जबकि हमारी स्वामिनी रासेश्वरी नित्यनिकुंजेश्वरी वृषभानु- नन्दिनीके प्रियतम प्राणधन मनमोहन श्यामसुन्दरके अमृतमय मुखचन्द्रकी अधरसुधा हमारी ही है। उसपर वेणुका अधिकार नहीं तो भी यह सम्भोग करती है। हमलोगोंकी सम्पत्ति प्राणाधारसर्वस्वको, यह स्वयं स्वातन्त्र्येण—यथेष्ट—यह नहीं कि थोड़ा, बिना पूछे- ताछे भोग रही है। दूसरी गोपिका पूछती है—सखि! यह कैसे जाना कि यह अधरसुधाका भोग कर रही है ? यह तो नीरस काष्ठ है, अधरसुधाका पान तो चेतनका धर्म है, अचेतनका नहीं और चेतनमें भी सबका नहीं, केवल गोपांगनाभावापन्नोंका ही। इसलिये पुंस्त्वेनापि भोगायोग्यता दिखलायी। यह वेणु तो पुमान् तत्रापि अचेतन काष्ठमय नीरस है, यानी अगर चेतन हो, तत्रापि गोपांगनाभावापन्न हो, सरस हो, रसाक्रान्त हो, तब दामोदरके अधरसुधाके सम्भोगकी योग्यता प्राप्त होती। तब कैसे कल्पना करती हो कि इस वेणुने अधरसुधाका पान किया? तो कहा—मातृतुल्या सरसियोंको रोमांच हो रहा है। रोमांच हर्षोद्रेकमें होता है तो यह सरसियोंका रोमांच निर्हेतुक कैसे हो सकता है? इनके हर्षका मूल्य यही कि इन्हींके जलसे यह वेणु पालित-पोषित है। उसका यह लोकोत्तर सौभाग्य देखकर, जैसे माता अपने पाले-पोसे बच्चेको साम्राज्याधिरूढ़ देखकर पुलकावलीयुत होती है, वैसे ही यह सरिता सोचती है कि हमारे ही जलसे पालित वेणु आज श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मुखचन्द्रपर विराजमान होकर अधरसुधाका पान कर रही है। तो इस रोमांचसे ही पता चलता है कि वेणु अधरसुधाका भोग लेती है। कुलवृद्धतुल्य तरुओं तथा लताओंसे बहती हुई मधुधारा हर्षके आँसू हैं। यह समझ रहे हैं कि हमारे वंशमें उत्पन्न बाँसका वेणु इतना सौभाग्यशाली हुआ कि अधरसुधाका पान कर रहा है। अथवा यह कि सरसियोंको अधरसुधाका सम्भोग प्राप्त नहीं है,

किंतु यह दूसरेके सम्भोगसे ही आनन्दित है। निनादरूपमें परिणत दामोदरके अधरसुधारसको अपने उच्छिष्टरूपमें सरसियोंको और वृक्षोंको वेणुने दिया। वह महामोहन नादरूपमें प्रकट रस सभीने लिया। वेणूच्छिष्ट रससम्भोगसे सरसियोंको होनेवाला रोमांच व्याजसे आनन्द है तो वेणुको कितना आनन्द होता होगा! इसलिये हम भी गोपीजन्म त्यागकर वेणुजन्म लें। अथवा यह वेणु कितना निर्दय है कि हमारी वृषभानुनन्दिनीके दामोदरके अधरसुधाको स्वयं भोगता है और अपने कुटुम्बियोंको भी बाँटता है। देखो न! नदियाँ रोमांचित हो उठी हैं, वृक्षोंमें आनन्दाश्रु आये हैं। अथवा यह दुरुपयोग करता है। दूसरेकी सम्पत्तिको—सर्वस्वको लेता है तो ले, पर ऐसी दुर्लभ वस्तु सुमधुर अधरसुधारस उसको यह अतृप्तिसे इतना पान करता है कि छिद्रोंसे वह रस निकलकर सरसियोंको भी आप्लावित करता है अर्थात् इन अनधिकारियोंको प्रदान करता है। जो रस वृषभानुनन्दिनीको तथा हमको दुर्लभ है, उसे इन जड़ और पाषाणोंको देना कितना निर्दयताका काम है। अथवा सखि! दामोदरके अवशिष्ट अधरसुधारसको इन सरसियोंने पान किया जलविहारके अवसरमें। पर वह रस नहीं था, द्रवमात्र और वह भी उच्छिष्ट है। सुधाका पान तो वेणुने ही कर लिया, उसके उच्छिष्टको पान करके भी इनको इतना आनन्द हुआ और उस सरसी तटके तरुओंने सरसीका जल पान किया, इस परम्परासे उनको वेणूच्छिष्ट प्राप्त है। अथवा तरुओंको उसकी प्राप्ति न होनेसे वे रोने लगे, देखो! हमारे सजातीय बाँसका वेणु पान करता है। सरसियोंको भी थोड़ा मिला। हम हतभाग्योंको कभी भी नहीं मिला। कहा—तरुओंको तो सम्भावना ही नहीं, फिर वह अप्राप्तिमें क्यों रोते हैं? भृत्योंको साम्राज्याप्राप्तिमें दुःख होता है? तो यह रंकभूत्योपम वृक्ष है। कहा— 'यथार्या:'—जैसे आर्यलोग। यद्यपि दामोदरके अधरसुधारस-सम्भोगकी प्राप्ति उन्हें नहीं तथापि शोक करते हैं। साधारण स्थितिमें गोपांगनाभावप्राप्ति बिना सुमधुर अधरसुधारसकी प्राप्ति नहीं, फिर भी श्रवणसे श्रोता लोग अश्रुमोचन करते हैं। वैसे ही यह परोपकारक छाया, फल, फूल, काष्ठसे सेवा करनेवाले वृक्ष, शोकमें अश्रुमोचन करते हैं तो मालूम होता है कि वेणु परमपुण्यवान् है। अच्छा सखि! फिर क्या बात है, भोग लेने दो! तो कहते हैं, वह अवशिष्ट रस 'गोपिकानां अवशिष्टरसम्' जिस रसका यह वेणु दुरुपयोग कर रहा है, वह गोपांगनाओंका अवशिष्ट ही रह रहा है। यानी गोपियोंने एक दामोदरके अधरसुधाकी आशासे

१३६ भक्तिसुधा भोग कर रही है। यही दोष है। कहा—यह वेणु नहीं, वेन राजा है, उसका लक्षण इसमें पूरा-पूरा मिलता है। वेन क्या कहता था—'न दातव्यम्' इत्यादि। 'हे प्रजाओ! तुम जप- तप मत करो, केवल मेरा श्रवणादि करो, मैं ही सब कुछ हूँ।' यह वेन भी हम सबको यही सिखाता है— कुछ मत करो, केवल मेरा ध्यान धरो। सचमुच हमारा सब काम इसके श्रवणमात्रसे छूट जाता है। सब कर्म- धर्म छूट गया। आश्चर्य यही कि उस वेनने क्या कुशल कर्म किया कि उसे यह सौभाग्य मिला? उस वेनसे इसमें यह विशेषता है कि वह एक मुखसे स्वसिद्धान्तका प्रचार करता था, यह सात मुखसे करता है। सचमुच एक बार जिसने इस मोहनमन्त्रको सुना, उसका सब छूट गया। 'शक्रशर्वपरमेष्ठिपुरोगाः**** कश्मलं ययुर- निश्चिततत्त्वाः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३५।१५) सनकादि महामुनीन्द्रगण आश्चर्यमें चकित हैं कि यह वेणु क्या कह रहा है? कहा सखि! वह तो वेन रहा, यह तो वेणु है। कहा—यह णत्व उत्वकी ओढ़नी ओढ़कर आया है। अगर वैसे आता तो कोई सुनता नहीं, क्योंकि वह नास्तिकप्रख्यात था। तो सखि! इस वेनने कौन-सा पुण्य किया कि वह समर्थ हो गया और थकता भी नहीं, इसलिये निरन्तर अधरसुधाका पान करता है। खैर, जो कुछ करता तो करता ही है, श्यामसुन्दरके अधरसुधाका सम्भोग कर रहा है, 'अहो धन्या वयम्।' यदि किसीका पालित शिशु सम्राट् हो तो उसे कितना आनन्द होता है तो सरसी नदी यह सोचती कि जगद्वन्द्य पूर्णतम पुरुषोत्तमके मुखचन्द्रकी सुमधुर अधरसुधाका सम्भोग करता जिसके लिये व्रजांगनाएँ ललचा रही हैं, हमारे जलसे यह परिपुष्ट है। उसीके आनन्दसे कमल- कमलिनी व्याजसे रोमांच आये हैं। व्रजांगना कहती है—सखि! वेणुको अपने जलसे पालन करनेवाली सरिता अपनेको धन्य समझती है। तो अनुमान करो कि यह हमारे प्राणाधारका अवश्य सम्भोग करता है। अगर उनपर विश्वास न हो तो वृक्षोंको देखो; उनमें मधुधारा टपकती है। वृक्ष सोचते हैं कि बाँस भी तो हमारी ही जातिका है। हमारी जातिमें ऐसा सौभाग्यशाली वेणु हुआ, जो सुमधुर अधरसुधाका सम्भोग करता है। जैसे वंशमें सत्पुरुष हो तो इक्कीस पीढ़ी तरनेकी आशा होती है। इसलिये भगवद्भक्तोंको देखकर उनके पितर प्रसन्न होकर आनन्दाश्रुकी वर्षा करते हैं, वैसे ही वृक्ष मधुधारा टपकाते हैं। अबतक सखि! क्षमा किया, अब वह वेणु 'गोप्यः' चुराना चाहिये। जिसको मनमोहन ढूँढ़ते फिरें। दुरुपयोग कर रहा है, इसलिये 'गोप्यः' चुरा लेना चाहिये। इसपर श्रीवल्लभाचार्य कहते हैं—वास्तवमें यह वेणु दामोदरके अधरसुधाका पान करता है कि नहीं, यह विचारणीय है। कहती हैं—सखि! मुखसंस्पर्शसे यही विदित होता है कि हमारे प्रियतमके अधरसुधाका यह पान करता है, जैसे हमें, वैसे ही इसे। क्या कारण है कि हमें अधरसुधा प्राप्त हो, इसे नहीं? यदि पान किया है तो यह सोचो कि यह इसने पाया कैसे? तो मर्यादामार्गसे नहीं सही, पर अनुग्रहमार्गसे पुष्टिमार्गसे पाया है। अर्थात् स्वयं प्रभुने ही इस वेणुको अधरसुधा दे दिया। तो ठीक है, यदि अनुग्रहसे देना चाहते थे, तब तो इसे गोपांगनादेहकी प्राप्ति होती, उसके द्वारा यह भोग करता, पर यह पुमान् सच्छिद्र नीरस सग्रन्थि है। अनुग्रहसे भी प्राप्त हो, परं च उसके लिये योग्यता- सम्पादन तो आवश्यक है। इसलिये प्रतीत होता है कि यह केवल स्पर्शमात्र करता है, सम्भोग नहीं। वास्तवमें श्रीकृष्णचन्द्रकी भगवद्भोग्या सुमधुर अधरसुधा श्रीव्रजवनिताओंको देनेके लिये वेणुमें निक्षिप्त किया अर्थात् वेणु दर्वीसमान है। दर्वीसे रस दूसरेको दिया जाता है, वह स्वयं रसग्राही नहीं होती। व्रजांगनाओंको दिवसमें अधरसुधा कैसे प्राप्त हो, इसलिये यह काम रचा और व्रजांगनाओंको अनुग्रहविशेषसे हृदयमें प्रविष्ट किया। जैसे सम्प्रयोगमें सम्भोग होता ही है, पर विप्रयोगमें भी भोग होता है। इसलिये वेणुको सुधा-सम्भोगका अधिकार नहीं, यह केवल पात्र ही मात्र है। तो यदि सम्भोग नहीं तो कौन-सा ऐसा कर्म

वेणुगीत १३७

इसने किया कि आनन्दरससिन्धुके रसका लाभ इसे नहीं होता। तात्पर्य, अधरसुधाके असम्भवमें 'किम्' आक्षेपार्थ और सम्भवमें प्रश्नार्थक है। अच्छा सखि! यह देखना कि आखिर श्रीव्रजांगनाओंको जो सुमधुर अधरसुधा प्रदान की जायगी, वह वेणुद्वारा की जायगी। वेणुका छिद्र ही वेणुका मुख है, उसीके द्वारा मिलेगी, कहा ही है— 'रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) इसलिये व्रजांगनाओंके लिये भी जो सुधासम्पृक्त है, वह पहले-पहले वेणुछिद्रोंमें ही प्रविष्ट होगी, क्या कारण है कि वह सम्भोग न करे? अपने मुखमें आये रसका पान वह कैसे न करे? कहा—यदि अनुग्रह- मार्गसे मनमोहन श्यामसुन्दरने स्वयं ही उसे प्रदान किया तो फिर तुम जलती क्यों हो? कहती हैं, नहीं। यह 'स्वयं' सम्भोग कर रहा है, मनमोहनने इसे नहीं दिया। हमारे लिये ही उसके छिद्रोंमें भरपूर किया है। जैसे अन्यके लिये सम्प्रदान किये हुए रसको अन्य— पहुँचानेवाला सम्भोग करे, वैसे ही इस वेणुने किया और वह भी लुका-छिपाकर नहीं, फूँक करके। वृन्दावनका सौभाग्य वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिं यद् देवकीसुतपदाम्बुजलब्धलक्ष्मि। गोविन्दवेणुमनु मत्तमयूरनृत्यं प्रेक्ष्याद्रिसान्वपरतान्यसमस्तसत्त्वम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।१०) श्रीव्रजांगनाएँ आपसमें कहती हैं—हे सखि! यह वृन्दावन भूमण्डलकी कीर्तिका विस्तार कर रहा है। सखि! देवकीसुत भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मंगलमय श्रीचरणारविन्दकी शोभाको इसने पाया, यानी स्वयं श्रीवृन्दारण्यधामकी शोभा महिमा मनोवचनातीत है; क्योंकि वृन्दारण्यधाम भगवत्स्वरूप है। जैसे भगवान्‌की महिमा अचिन्त्य अनन्त अद्भुत है, वैसे वृन्दारण्यकी महिमा भी अचिन्त्य अनन्त अद्भुत है; इसलिये उसकी महिमा क्या बढ़ेगी, अपितु उससे भूमण्डलकी शोभा विस्तृत हुई। 'वृन्दावन' का अर्थ—'वृन्दस्य गुणसमूहस्य, गुणिसमूहस्य अवनं यस्मात् तत्।' रसिकवृन्द और गुणवृन्दका अवन—संत्राण— रक्षण जिससे है अर्थात् रसिकजनोंके एकमात्र जीवनका आलम्बन श्रीवृन्दारण्यधाम है। इसपर भावुकोंकी बड़ी ऊँची-ऊँची भावनाएँ होती हैं, कहते हैं— 'मिलन्तु' अगर वृन्दावनके बाहर कोटि-कोटि चिन्तामणि मिले, इतना ही क्या, स्वयं श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दर मनमोहन वृन्दारण्यकी सीमाके बाहर खड़े होकर बुलायें तो मत जाओ। कहते हैं—'विपिनराज सीमाके बाहर हरिहूँ को न निहार।' यह कहा जा चुका है कि वस्तु तो वहाँ अचिन्त्य अनन्त परमानन्दरसामृतमूर्ति भगवान् हैं, उनमें कमी-वेशी नहीं है, वे पूर्ण ही हैं, पर स्थानभेदसे अलग-अलग महिमान्वित होता है— बाँसमें वंशलोचन, गोकर्णमें गोरोचन, गजकर्णमें गजमुक्ता, सीपीमें मुक्ता इत्यादि; मूलमें कोई फेर नहीं, वैसे श्रीकृष्ण निखिलरसामृतमूर्ति उद्बुद्ध उभयविध शृंगार रसात्मा ही हैं, पर वृन्दारण्यधाम वह सीपी है, जहाँ श्रीकृष्णपरमानन्दकन्द अधिक शोभा-समन्वित होते हैं। अन्यत्र द्वारकाधीशमें ऐश्वर्यका, मथुरानाथमें बलादिका प्राकट्य है, पर श्रीवृन्दारण्यधीश श्रीकृष्णमें माधुर्यका प्राकट्य है, ऐश्वर्यादि तिरोहित है। इसलिये जहाँ जितना माधुर्यभावका अधिक प्राकट्य है, वहीं भावुकोंकी सरसता है। अतः वही व्याख्या 'व्रजाङ्गनावृन्दस्य जीवनं वृन्दावनम्' है। नहीं तो प्रभुके वियोगमें संतप्त व्रजांगनाएँ व्रजमें पड़ी तड़पती थीं, मनमोहनके वियोगमें व्याकुल हो रही थीं, मथुरानाथके दर्शनके लिये मथुरा न जातीं? न ही, उनका श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरमें प्रेम है, वह मथुरानाथ, गोलोकनाथादिको नहीं चाहती थीं, केवल व्रजनाथको चाहती थीं। इस तरह व्रजांगनावृन्दका अवन—संत्राण अथवा समस्त गुणवृन्दका भवन जहाँ है, वह वृन्दावन है। गोपांगनाएँ कहती हैं—'जयति

१३८ भक्तिसुधा तेऽधिकं जन्मना व्रजः' (श्रीमद्भा० १०।३१।१) आपके जन्मसे व्रज बहुत अधिक विजयी होता है, वैकुण्ठादि लोकोंसे भी; क्योंकि वहाँ, वैकुण्ठनाथ भगवान्‌की प्राणेश्वरी होनेके कारण लक्ष्मी सेव्या— आराध्या हैं, वही इस व्रजमें सेविका ('श्रयते') हैं तो वृन्दावनमें समस्त गुणोंका अवन—संत्राण ठीक ही है। इसलिये सर्वमानमोदनादि गम्भीर शक्तिके जो उत्कृष्टतर भाव हैं, वे 'उज्ज्वलनीलमणि' इत्यादि ग्रन्थोंमें वर्णित हैं। सब भाव सामस्त्येन कहीं उपलब्ध नहीं होते, इस वृन्दावनमें ही सबका संत्राण होता है। यहाँ ही प्रेमकी सब अवस्थाएँ विराजमान हैं। साधारण रूपमें प्रेमका अणुपरिमाण सर्वत्र है। चराचरमें कोई ऐसा तत्त्व नहीं; जहाँ प्रेमकी मात्रा न हो। उस प्रेमका सदुपयोग-दुरुपयोग होना—यह दूसरी बात है। कोई माता-पितामें, कोई भगवान्‌में प्रेम करते हैं,

शान्त हो जाय। अंकुशध्यानसे मत्त मनोगज अतिशीघ्र वश होता है। वज्रध्यानसे कठिन अनन्तपाप-पर्वतोंका विदारण होता है। यवध्यानसे धनधान्यविहीन कभी नहीं होता। ऐसे हर एक ध्यानके अलग-अलग प्रयोजन बतलाये हैं। वह सब चिह्न व्रजभूमिमें अंकित होते हैं, क्योंकि व्रजभूमि है आर्द्रकोमल सरस भक्तिभूमि, शुष्कनीरस भूमिमें प्रभुके पादपंकजचिह्न कैसे पड़ें? वृन्दादेवी भक्तिमती हैं, अतएव आर्द्र हैं। व्रजांगनाएँ ईर्ष्या प्रकट करती हैं-देखो सखि! देवता ऐसे हैं जो भूमिको नहीं छूते, यही उनका लक्षण है। श्रीअगस्त्याश्रममें जब रामचन्द्र, लक्ष्मण, जानकी आये, वहाँ एक रथ देखा, जिसको तेजस्वीगण उठाये थे। तब लक्ष्मणके पूछनेपर रामचन्द्रने इन्द्रका आगमन बतलाया। हनुमान्‌जीने सीताको भूमिपर देखकर पूछा— देवता नहीं हो तो कौन हो? देवोंके चरण भूको नहीं छूते तो देवेन्द्रके चरण तो दुर्लभ ही हैं, फिर पूर्णतम पुरुषोत्तमके चरणस्पर्श तो अति दुर्लभ—'पुरुष एवेदꣳ सर्वं' विराडात्मा पुरुषका आधिभौतिक पाद ही मही है, आध्यात्मिक पाद अतीन्द्रिय है और आधिदैविक पाद आनन्दरूप है। तात्पर्य—जहाँ पुरुष-चरणस्पर्श दुर्लभ, वहाँ पुरुषोत्तम चरणस्पर्श हुआ। अहोभाग्य है! हमलोग कैसी हतभागिनी हैं। यह वृन्दावन दैत्योंकी भूमि, वृन्दा—दैत्यपत्नीकी भूमि है, पर भाग्य तो देखो। वास्तवमें जैसी वृन्दावनकी भूमि है, वैसा हमारा हृदय भी है; वह कठोर है, यह भी कठोर है; वहाँ गोवर्धनाद्रि यहाँ वक्षोज, वहाँ गंगा यहाँ अनुराग- गंगा, वहाँ वनराजि यहाँ रोमराजि, वहाँपर तो प्रभुने पादस्थापन किया, हमारे हृदयपर नहीं। वह कितनी सौभाग्यशालिनी है! इसलिये कहते हैं 'देवकीसुत।' यदि कहीं यशोदानन्दन होते तो कुछ-न-कुछ सम्बन्ध जोड़ते, हमसे आप प्रेम रखते, हमारी आशा पूर्ण करते। हे महाराज! हम जानती हैं 'न खलु गोपिका- नन्दनो भवान्' (श्रीमद्भा० १०।३१।४)। ऐसी कठोरता न होती। देवकीका हमारा क्या सम्बन्ध! वह क्षत्रियाणी, उसका हृदय कठोर, उसके हृदयसे आपका जन्म होनेसे वही कठोरता आपके हृदयमें उतरी है। यदि गोपिकानन्दन होते तो जैसा उनका हृदय भोलाभाला होता है, वैसा आपका भी हृदय भोलाभाला ही होता। भगवान् वृन्दावनभूमिपर पादन्यास करते हैं, हमारे हृदयपर नहीं, यही ताप है, ईर्ष्या है। इस रहस्यको समझनेवाला बिरला ही है। इसलिये कहा—'हे सखि' (एकवचन) अन्यत्र 'हे सख्यः' (बहुवचन)-का प्रयोग करते हैं। कुछ लोग कहते हैं—यह ईर्ष्या नहीं हो सकती; क्योंकि गोपी निर्गुणा है। सात्त्विकी-राजसी-तामसीमें यह सम्भव है। एक पक्ष ऐसा है कि है तो यह निर्गुणा, पर इस रसकी स्थिति ऐसी है कि निर्गुणामें भी रसका संचार होता है अथवा दैन्यद्वारा सर्वथा निर्गुणत्वका ही सूचन है। देखो सखि! हमसे अधिक सौभाग्यशालिनी यह भूमि है। हमें गोपांगना-जन्ममें जो प्राप्त नहीं, वह इस भूमिको प्राप्त है। उनका भाव यह है कि जैसे श्यामसुन्दरके चरणसम्पर्कसे वृन्दारण्यकी शोभा है, वैसे ही प्रभुके चरणसम्पर्कसे हमारे हृदयकी शोभा है। जहाँ पादपंकज नहीं है, वहाँ शोभा भी नहीं है। कुछ भावुक कहते हैं कि—'गोप्यः किमाचरदयम्' इससे प्रथम वेणु-महिमा वर्णन किया, जिससे उसके सर्वातिशायिनी होनेसे वृषभानुनन्दिनी दुःखित हुई। इसलिये उन्हींको सम्बोधित करती हुई कहती है। अतः एकवचनका प्रयोग हुआ। यह वृन्दावन भूमण्डलकी विचित्र कीर्तिका विस्तार करता है, इसमें अपना और वृषभानुनन्दिनीका उत्कर्ष बोधित किया। वृन्दारण्यधाम तो केवल भूमिकी कीर्तिका ही विस्तार कर रहा है। स्वयं उसका आनन्द नहीं जानता, रसका अभिज्ञ नहीं है, अतएव भाग्यशाली नहीं है। केवल परोपकार-ही-परोपकार करता है। इसलिये इनका भाव यह है कि अस्मदादि स्वयं श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरके अद्भुत अनुराग-रसका आस्वादन करती हैं। वृन्दावन व्रजभूमिमें परस्पर उपकार्योपकारक भाव है। इस वृन्दावनसे व्रजभूमिकी महिमा विस्तृत होती है, व्रजभूमिसे वृन्दावनको लक्ष्मी प्राप्त होती है।

'यस्माद् व्रजभुवः सकाशाद् देवकीसुतपदाम्बुजा- भ्यां लब्धा लक्ष्म्यो येन' प्रभुके मंगलमय श्रीचरणार- विन्दकी शोभाको उस भूमिद्वारा वृन्दावनने प्राप्त किया। भूमि जब आर्द्र-अनुरागवती होती है, तब इसपर भगवान्‌के मंगलमय श्रीचरणचिह्न अंकित होते हैं, इसीलिये वृन्दावनने भी भूमिकी कीर्तिको बढ़ाया। इस तरह परस्पर उपकार्योपकारक भाव है। देवकीसुत क्यों कहा ? इसपर वल्लभाचार्य कहते हैं-यह कहनेवाली गोपांगना श्रीनन्दगेहिनीके गेहमें ही रहनेवाली पालित-पोषित कन्या है। ऐसी स्थितिमें श्रीनन्दनन्दन यशोदानन्दन श्रीकृष्ण कहनेमें वह नन्दपालित कन्या सम्बन्धमें अनौचित्य देखती है। इसीलिये कहा 'देवकीसुत'। अथवा सुना था गर्गाचार्यके मुखसे 'प्रागयं वसुदेवस्य' इत्यादि, उसे स्मरणकर कहा। अथवा नन्दरानीका ही दूसरा नाम देवकी था-'द्वे नाम्नी नन्दभार्यायाः यशोदा देवकीति च।' फिर भी विचार यह कि 'देवकीसुतपदा अम्बुजैरिव लब्धा लक्ष्मीर्र्येन' देवकीसुतके दिव्य चरणसे वृन्दावनने ऐसी शोभा पायी, जैसे कमल शोभा पाते हैं। अर्थात् फुल्ल पंकजकी तरह वृन्दावनकी अद्भुत शोभा क्षण- क्षण विकसित होती थी। कहा, सखि! इसमें क्या आश्चर्य ? श्यामसुन्दरके मंगलमय श्रीचरणारविन्द जैसे व्यापी वैकुण्ठमें विराजते हैं, वैसे ही वृन्दारण्यधाममें हैं तो क्या आश्चर्य ? व्यापी वैकुण्ठमें रहनेवाला वृन्दारण्यधाम भूमण्डलमें विराजता है। वास्तवमें वह नेत्रगोलक है, जिसे लोग नेत्र कहते हैं, नेत्रेन्द्रिय इस गोलकके भीतर है; ऐसे ही वृन्दावनधाम है। अतीन्द्रिय वृन्दावनधाम जिस भूमिमें रहता है, उसे भी वृन्दावन कहा जाता है। एवं सर्वोपलब्ध वृन्दावनधाम नेत्रगोलकके समान है अर्थात् भावुक उपासनागम्य अतीन्द्रिय वृन्दावन धाम है। यही उसकी अद्भुत महिमा है। तब इस भूमिपर वह प्रकट कैसे है ? तो भक्तिसे क्या नहीं होता ? जहाँ भक्ति है, वहीं प्रभुके श्रीचरणारविन्द प्रकट होते हैं। ठीक ही है, जहाँ पादपंकज है, वहीं शोभा है, महिमा है। इसकी प्रतिष्ठा इसीसे है। कहते हैं, यहाँ तो श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके चरण ही भक्तिरूप हैं, भक्तिमार्गमें चरणकी ही प्रधानता है। इसलिये वृन्दावनमें चरण प्रतिष्ठितकर भक्तिकी स्थापना की। चरणको अम्बुजकी उपमा देते हैं। अम्बुज कोमल, शीतल एवं तापापनोदक है, वैसी ही भक्ति भी है और उसका वृन्दामें स्थापन है। अतः विशेष भक्ति स्त्रियोंमें ही दिखलायी। इसीलिये श्रीवृषभानु- नन्दिनीमें भक्तिकी पराकाष्ठा है एवं यहाँके प्रसंगमें हरिणी, गौ, मयूरी, पुलिन्दी इनका ही वर्णन है। उनका हृदय अधिक कोमल है। कोमलहृदय भगवद्वियोगजन्य तीव्र तापसे जल्दी द्रुत होता है। स्वभावसे ही कठिन पदार्थ तापसे द्रुत नहीं होता। इसलिये उनके हृदयमें भगवत्सम्बन्ध स्थापित हो तो हृदय द्रुत हो जाय। ऐसा होते ही वहाँ श्रीप्रभुके पादपंकजकी स्थापना होती है। इस प्रकार वृन्दारण्य- धाममें चरण अंकित हो गये और चिह्न स्थायीभावापन्न हो गये। यह भावुकोंको मान्य ही है कि जहाँ-जहाँ भगवान्‌के श्रीचरणपंकज हैं, वहाँ-वहाँ श्रीवृन्दारण्य- धाम है। व्यापी वैकुण्ठधाममें ही श्रीभगवान्‌का प्राकट्य होता है। इसलिये कहा-'स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठितः स्वमहिम्नीति होवाच'। श्रीभगवान् अपने-आपमें ही प्रतिष्ठित हैं। सर्वाधार और अपने-आप आधार एवं आधाराधेय, दोनों एकात्मक हैं अथवा यों कहिये कि अव्यक्तके उपरिष्ठात् सत्तत्त्वकी स्थिति है एवं यह आया कि इस प्रकार वृन्दावनने लक्ष्मी पायी तथा भक्ति और ज्ञान भी पाया-'गोविन्दवेणुमनु मत्तमयूरनृत्यम्, (श्रीमद्भा० १०।२१।१०) गोविन्द गवां इन्द्रः।' प्रभुने इन्द्रका मानमर्दन किया, इन्द्रने कुपित होकर मूसलाधार वृष्टिद्वारा गोकुलको बहा देनेकी, मिटा देनेकी आज्ञा दी, पर प्रभुने सात दिनतक गोवर्धन धारणकर गोकुलका संत्राण किया। यह इन्द्रको पता लगा, वह सुरभीके पीछे-पीछे प्रार्थना करने आये। भाव यह कि गोकुलके, गौओंके रक्षणके

लिये प्रभुका अवतार है। इसलिये इनपर कृपा है। आकर सुरभीने कहा—हम सब अपने ईश्वर इन्द्ररूपसे आपका अभिषेक करना चाहती हैं। प्रभुने प्रार्थना स्वीकार की, सुरभीने दुग्धसे अभिषेक किया, तबसे गोविन्द नाम प्रख्यात हुआ। वेणुनादसे आकृष्ट मयूरोंका नर्तन गोपालचूड़ामणि भगवान् वन्यवेश धारण किये हुए, गोपाल-गोवत्स आदिसे परिवेष्टित जैसे वनमें पधारते हैं, वैसे उनके मंगलमय अमृतमय मुखचन्द्रके दर्शनसे मयूर-मयूरी लोग प्रसन्न हो जाते हैं और जानते हैं कि कोई अद्भुत दामिनीसे विद्युल्लताके समान पीताम्बरसे परिवेष्टित नवनील नीरद मन्द- मन्द गर्जनतुल्य वेणुनिनाद करता हुआ अभिव्यक्त हुआ है। उनको देखते ही मयूर नाचने लगते हैं। उस पीताम्बरके अद्भुत दमक-चमक आनन्दोल्लासमें विभोर होकर नाचते हैं। एक मयूर नहीं 'मयूराः' यह भक्तिकी सूचना। इन मयूरोंकी तरह भक्त भी प्रफुल्ल होकर नाचने लगते हैं, मानो वृन्दारण्य धाम भी नाचने लगा। उस स्थितिमें कपोत, हंस, कारण्डवादि दूसरे जन्तु सब-के-सब ऊँचे गोवर्धन सानुपर बैठकर उस नृत्यको देख, मनमोहन श्यामसुन्दरके मंगलमय श्रीअंगको देखकर और वेणुका मधुर-मधुर नाद श्रवणकर जहाँ-के-तहाँ चित्रलिखितसे रह जाते हैं। वल्लभाचार्यजी कहते हैं—इससे ज्ञान सूचित है और सब ज्ञानी मयूर भक्त हैं। सो पशु-पक्षी तथा सर्पादि तामस हैं और ज्ञान तो सात्त्विक है। तो इसीलिये वह सब गोवर्धनके उच्च शिखरपर निर्भय होकर बैठे हैं—'ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था' (गीता १४।१८)। तात्पर्य यह कि श्रीवृन्दारण्यधामने ज्ञान, भक्ति सबको प्राप्त कर लिया, इसीलिये वह धन्य है सखि! 'वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिम्' (श्रीमद्भा० १०।२१।१०)। कुछ भावुक कहते हैं—'गोविन्दस्य वेणुरेव मनुः मोहनमन्त्रः' गोपालचूड़ामणि श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका वेणुनाद ही मोहनमन्त्र है। उसीसे मत्त होकर मयूरोंने नृत्य आरम्भ किया। उसको देखकर अन्य सब स्तब्ध होकर तल्लीन हो गये। वह कहता है—सब छोड़ो, केवल प्रभुके श्रीचरणारविन्दोंमें मन लगाओ। इसीलिये कहा—संसारके सब प्रवाह दूसरी तरफ खींचते हैं, वेणुध्वनिप्रवाह प्रभुकी ओर खींचता है। 'अद्रिसान्वपरतान्यसमस्तसत्त्वम्' (श्रीमद्भा० १०।२१।१०) 'अद्रिसानुषु उपरतानि सर्वाभ्यः क्रियाभ्य उपरतानि अत्र समस्तसत्त्वानि।' ऐसा वृन्दारण्यधाम है। कुछ लोग कहते हैं— मयूरपिच्छधारी प्रभुको देखकर जैसे अन्य समस्त प्राणी स्तब्ध हो गये, वैसे मयूर क्यों नहीं हुए ? उसे नृत्य कैसे सूझा ? तो कहते हैं—मयूरोंको श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द दामिनीपरिवेष्टित मन्द गर्जन करते हुए नवनीलनीरद स्वरूपमें ही प्रकट हुए। जैसे 'मल्लानामशनि' के वर्णनके अनुसार हर एकको अलग-अलग प्रभु दीखे, वैसे ही यहाँ भी मयूरोंके लिये मेघस्वरूपमें प्रकट होनेसे उनको नाचना ही सूझा एवं कोकिलाओंको सरस वसन्तस्वरूपकी प्रभुमें स्फूर्ति हुई अथवा ये मयूरपिच्छधारी श्रीकृष्ण मयूर- प्रिय हैं, उनको देखकर मयूरने नाचना आरम्भ किया और प्रार्थना की कि आप बजाओ और हम नाचें। कैसा सुन्दर दृश्य है। मनमोहन श्यामसुन्दर वेणुनाद करते हैं और मयूर नृत्य करते हैं। यही कहा— 'वेणुमनु'। वेणुमें गायन भी और वादन भी, तदनुकूल नृत्य हो रहा है और सब खग-मृगादि सभ्यवृन्द द्रष्टा-श्रोता स्तब्ध हैं। अब जिस प्रकार बजानेवाले वादकने अगर ठीक बजाया तो उसपर प्रसन्न होकर इनाम दिया जाता है, वैसे ही मयूरने श्रीभगवान्के वादनपर प्रसन्न होकर पिच्छ दिया और प्रभुने भी बड़े आदरके साथ उसको अपने मस्तकपर धारण किया। अथवा पहले तो मयूरने दामिनीपरिवेष्टित नवनीलनीरद मानकर नृत्य आरम्भ किया। उसके नृत्यको देखकर भगवान्ने वेणु-वादन आरम्भ किया तो पीछे भेद खुल गया। नवनीलनीरदमें गम्भीरता, श्यामलत्ता, तापा-

१४२ भक्तिसुधा पनोदकता, मनोहारिता इत्यादि जो गुण हैं, वे तो सब प्रभुमें हैं ही; पर आखिर वह नीरद यह अमृतद, वह जलद, यहाँ प्रेमानन्दकी वर्षा। प्राकृत दामिनीसे अनन्तकोटिगुणित दीप्तिसम्पन्न पीताम्बर और वेणुवादनकी अद्भुत मनोहारिता इत्यादि। प्राकृत नीरदोंसे जब उसे विशेष अतिशयिताका अनुभव होता, तब मयूर भी स्तब्ध हो जाते हैं। इस पक्षमें पहले ‘मयूरेभ्यः अन्यानि’ ऐसा अर्थ किया। अब ‘अवरतानि अन्यसमस्ततत्त्वानि’ ‘अवरते अन्ये रजस्तमसी अवरत’ उपरत है अन्य रज, तम जिसमें। वह समस्त सत्त्व जिसमें रज और तमकी सामस्त्येन निवृत्ति है, ऐसा पूर्णरूपेण विकसित सत्त्व जहाँ है, ऐसा श्रीवृन्दारण्यधाम ‘वृन्दावन’। ‘वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिम्।’ (श्रीमद्भा० १०।२१।१०) कहते हैं, गोपालचूड़ामणि श्रीकृष्णचन्द्र

चीरहरण १४३ गोपांगनाओंकी भगवत्क्रीड़ामें परम आसक्ति कही गयी है। अब नन्दव्रजकुमारिकाओंकी आसक्तिका निरूपण किया जाता है। कुमारिकाएँ श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द भगवान्‌को वररूपमें प्राप्त करनेके लिये दुर्गम-संगमनी भगवती कात्यायनीकी अर्चनामें लगी हैं। स्मरण रहे कि इनमें परमानन्दरसामृतमूर्ति भगवान्‌की माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्ति श्रीवृषभानुनन्दिनी और उनकी अंशभूता ललिता, विशाखा प्रभृति एवं अन्याय नित्य सिद्ध ब्रजकुमारिकाएँ भी सम्मिलित हैं। उनकी साधना रसविशेषके पोषणमें एवं लीलाविशेषके विकासार्थ ही है, परंतु साधन-सिद्धाओंकी साधना तो ठीक श्रीकृष्णप्राप्तियोग्यतासिद्ध्यर्थ है। युवती व्रजांगनाएँ इन कुमारिकाओंसे भिन्न हैं। उनमें भी अनन्यपूर्विका, अन्यपूर्विका आदि भेद हैं। इन कुमारिकाओंमें भी आगे चलकर अन्यपूर्विका-अनन्य- पूर्विकाका भेद तो है, परंतु वस्तुतः श्रीकृष्णसम्बन्धी सभी ब्रजयुवतीजन अनन्यपूर्विका ही थीं। रसविशेषके विकासके लिये उनमें अन्यपूर्विकात्वकी कल्पना थी। महानुभावोंने इनका भेद इस तरह कहा है— पहले नित्य सिद्धा और सिद्धा दो भेद हैं। नित्य सिद्धा श्रीकृष्णके साथ ही अवतीर्ण होती है और बहुत उपासनाओं तथा मनोरथोंद्वारा श्रीकृष्णप्रसादसे सिद्ध होनेवाली सिद्धा कही जाती हैं। नित्य सिद्धाओंमें भी ऊढ़ा (विवाहिता), अनूढ़ा (कन्या) ये दो भेद हैं। ऊढ़ा भी अपने पतिकी सम्बन्धिनी कभी नहीं होतीं, किंतु वे केवल पतिकी ममतामात्रकी भाजन हैं—'न जातु व्रजदेवीनां पतिभिः सह सङ्गमः।' व्रजदेवियोंका कभी अपने पतियोंसे समागम नहीं हुआ। भगवान्‌की अचिन्त्य शक्ति योगमायासे उनके पतियोंको मायामयी अन्य ही सेवामें उपस्थित मिलती हैं। अतएव रासक्रीड़ावसरमें जबकि व्रजांगनाएँ श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें थीं, तब भी सभी गोपोंने अपनी- अपनी दाराओंको अपने पास ही पाया था। 'मन्यमानाः स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः॥' (श्रीमद्भा० १०।३३।३८) अनूढ़ा कन्या ही थीं। श्रीकृष्णके इच्छानुसार नित्य सिद्धाओंमें भी ऊढ़ा (विवाहिता) हुईं, उसका परम प्रयोजन दुर्लभताकी प्रतीति होना ही था। शास्त्रोंका मत है कि नायिका-नायकमें परस्पर सम्मिलनकी जितनी दुर्लभता हो, उतनी ही अधिक रसाभिव्यक्ति होती है। जहाँ माता-पिता, गुरुजनों एवं शास्त्रोंका अत्यन्त निषेध हो, जहाँ अत्यन्त दुर्लभता हो, वहीं उत्कट प्रीति होती है। जैसे प्रवहणशील जल रोकनेसे अधिक वेगवान् होता है, वैसे ही स्वाभाविक राग एवं प्रेमके आस्पदमें स्वाभाविकी प्रवृत्ति होती है। उधर रुकावट एवं विघ्न-बाधाओंसे मनोवेग अधिक बढ़ता है, दुर्लभतासे उत्कण्ठा भी अधिक बढ़ जाती है। इसीलिये परकीया रति श्रेष्ठ समझी जाती है— 'यत्र निषेधविशेषः या च मिथो दुर्लभता तत्रैवासह्यते चेतः।' फिर भी परकीया रति घोर नरकका मूल है, अतः शास्त्रोंने उसकी घोर निन्दा की है, परंतु सर्वान्तरात्मा सर्वेश्वर सर्वपति भगवान्‌के सम्बन्धसे समस्त दूषण भी भूषण ही हो जाते हैं। इसीलिये यहींपर परकीया रतिका वास्तविक सदुपयोग होता है। जैसे यहाँ महाकामिनी तन्मय होकर दुर्लभजार उपपतिका चिन्तन करती है, वैसे यदि किसी जीवात्माका मन पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान्‌का चिन्तन करे तो उसका अहोभाग्य है। जैसे कोई महाकामुक अति दुर्लभ अपनी प्रेयसी कामिनीके सम्मिलनकी लालसामें व्यग्र हो, परमानन्दरसात्मक भगवान् जिन व्रजांगनाओंके चिन्तनमें ऐसे व्यग्र हों, उन व्रजांगनाओंके महा-महा भाग्योंका कौन वर्णन करे? अतएव महानुभावोंने कहा है—'नेष्टा यदङ्गिनि रसे कविभिः परोढ़ा तद्गोकुलाम्बुजदृशां कुलमन्तरेण।' अर्थात् जो कवियोंने शृङ्गाररसमें परोढ़ा (परकीया) कामिनीको अनभिमत माना है, वह तो गोकुल-कुलांगनाओंको छोड़कर माना है अर्थात् यहाँकी नायिका और नायक दोनों ही अलौकिक हैं। ऐसे ही स्वरूपसिद्धा भी कन्या होकर, कात्यायनी भगवतीकी अर्चनाद्वारा

१४४ भक्तिसुधा श्रीकृष्ण-लीलाके लिये साधक भावको प्राप्त हुई थीं। श्रुतियाँ ही व्रजकुमारियाँ बनीं इनके अतिरिक्त श्रुतियोंकी अधिष्ठात्री महाशक्तियोंने जब परमतत्त्वका अन्वेषण करते-करते महा-महा तपस्याके पश्चात् श्रीकृष्णका दर्शन पाया, तब उन्होंने उनके साथ रमण (तादात्म्येन सम्मिलन)- की इच्छा प्रकट की। श्रीकृष्णने कहा कि 'तुम मेरी आराधनाद्वारा व्रजकुमारिका बनो, तब वहाँ तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा।' इस तरह कृष्णका वर प्राप्त करके वे भी नन्दव्रजकुमारिका हुई हैं। उनमें आगे चलकर साक्षात् परब्रह्मपर्यवसायिनी 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियाँ अनन्यपूर्विका या स्वकीया हुई हैं, एवं कर्मकाण्ड या अन्यान्य देवतातत्त्व पर्यवसायिनी श्रुतियाँ परकीया हुई हैं, जैसे 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति।' (कठ० १।२।१५) 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः॥' (गीता १५।१५) इत्यादि श्रुति- स्मृतिके अनुसार समस्त वेदोंका महातात्पर्य परब्रह्ममें ही है। वैसे ही यहाँ भी श्रुतिरूपा गोपांगनाओंका, अन्य सम्बन्ध केवल काल्पनिक है, मुख्य सम्बन्ध तो उनका भगवान्‌से ही है। उनमें भी श्रुतिरूपा गोपांगना वाच्य-वाचकके अभेदरूपसे ब्रह्मरूपा ही हैं, ओंकार मूलवाचक है, उसका वाच्य परब्रह्म है। समस्त वाङ्मय ओंकारका विकार है और सारा प्रपंच ब्रह्मका कार्य है। अतः ओंकारका विकारभूत समस्त वाङ्मय ब्रह्मके कार्यभूत सम्पूर्ण प्रपंचका वाचक है। वाच्य और वाचकका अभेद हुआ करता है, इसीलिये समस्त वाङ्मय भी वस्तुतः ब्रह्मरूप ही है। इसके सिवा श्रुतियोंके अवान्तर तात्पर्य अन्य- अन्य होनेपर भी उनका प्रधान तात्पर्य तो ब्रह्ममें ही है। शब्दसे दो बातोंका बोध हुआ करता है—जाति और व्यक्ति। त्वतलादिप्रत्ययवेद्य जाति भावरूप ही होती है। 'तस्य भावस्त्वतलौ' इस पाणिनिसूत्रके अनुसार घटकी भावरूप जाति ही घटत्व है, वह वस्तुतः एक भावविशेषमें स्थित मृत्तिका ही है। इस प्रकार घटका वाचक 'घट' शब्द भी मूलतः उसके कारण मृत्तिकाका ही बोधन करता है। इसी प्रकार जितने शब्द हैं, वे सब अपने अभिधेय विभिन्न पदार्थोंके मूल कारण परब्रह्मके ही वाचक हैं। अतः अवान्तर श्रुतियोंका भी मुख्य तात्पर्य तो परब्रह्ममें ही है। विचार किया जाय तो वस्तुतः वाच्य-वाचकका भेद भी नहीं है। ये दोनों एक ही चेतनके विवर्त हैं। अभिधेयप्रपंचजननानुकूल शक्त्यवच्छिन्न चेतनका विवर्त अभिधेय है और अभिधानात्मकप्रपञ्च जननानुकूल- शक्त्यवच्छिन्न चेतनका विवर्त अभिधान है। जिस प्रकार एक ही परब्रह्ममें अभिधान-अभिधेयरूप अनन्त तरंगें प्रादुर्भूत हो गयी हैं, किंतु 'तदभिन्नाभिन्नस्य तद्भिन्नत्वनानियमात्' इस न्यायके अनुसार तरंगाभिन्न समुद्रके साथ तरंगोंका अभेद होनेके कारण उनका आपसमें भी अभेद है। यह बात तो तरंगसे तरङ्गान्तरके अभेदकी रही, किंतु मूल दृष्टिसे तो अभिधानात्मक तरंग जिस समुद्रमें है, लक्षणावृत्तिसे वह उस समुद्रका ही बोधन करती है, हाँ, अभिधेयात्मक तरङ्गान्तरको वह अभिधावृत्तिसे बोधित करती है; क्योंकि किसीकी भी शक्ति अपने शक्यमें ही सफल हुआ करती है, अपने कारणमें नहीं होती। दाहकत्व, प्रकाशकत्व आदि शक्तियोंवाला अग्नि अपने दाह्य काष्ठादिको ही दग्ध कर सकता है, अपने स्वरूपभूत अग्निका दहन नहीं कर सकता। मूल रूपसे तो तरंगें समुद्रसे भिन्न नहीं हैं, यह दूसरी बात है कि 'अकारो वै सर्वा वाक्' इस श्रुतिके अनुसार सम्पूर्ण वाङ्मय-प्रपंचका अकारमें, अकारका उकारमें और उकारका मकारमें तथा उसके पश्चात् सम्पूर्ण प्रपंचका तुरीयमें लय होता है। तात्पर्य यह है कि अभिधानात्मिका श्रुतियाँ अनन्त चैतन्यान्दसुधासिन्धुकी तरंगोंके समान हैं और वे उसकी अभिधेयरूप अन्य तरंगोंके साथ वृद्धिको प्राप्त होकर प्रकाशित होती हैं; क्योंकि अभिधेय अर्थ उनके शक्य हैं। श्रुतियाँ अपने उद्गमस्थलभूत परमतत्त्वका तो लक्षणासे ही बोध

कराती हैं। यद्यपि किसी दृष्टिसे 'घट' का वाच्य घटाकारमें परिणत मृत्तिका भी हो सकती है तथापि लोकमें 'घट' पदका वाच्य घट व्यक्ति ही समझा जाता है। इस प्रकार अभिधानात्मक ब्रह्म तरंगका वाच्य अभिधेयात्मक ब्रह्म तरंग तो है, परंतु लक्षणासे ही है। फिर मीमांसकोंने तो जातिमें ही शक्ति मानी है। जाति घटत्वादिको कहते हैं, जिसे घटभाव भी कहा जा सकता है, घट कार्य है, कार्यका भाव कारणसे व्यतिरिक्त नहीं हुआ करता। समस्त कार्योंका भाव कारणमें ही पर्यवसित होता है, अतः समस्त शब्दोंकी वाच्यताका पर्यवसान-कारण परम्परा-क्रमसे सन्मात्रमें ही होता है। इसलिये सारे शब्दोंका वाच्य परमात्मा ही है। इस प्रकार वाच्य-वाचकका अभेद है और समस्त श्रुतियाँ तत्पदार्थसे अभिन्न ही हैं। श्रुतियोंके दो भेद श्रुतियाँ दो प्रकारकी हैं, अन्यपरा और अनन्यपरा। अनन्यपरा श्रुतियाँ वे हैं, जो साक्षात् रूपसे परब्रह्ममें पर्यवसित होती हैं, जैसे—'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।' (तैत्तिरीय० २।१) तथा अन्यपरा श्रुतियाँ वे हैं, जिनका साक्षात् तात्पर्य तो अन्य देवतादिमें है, किंतु परम्परासे उनका महातात्पर्य परब्रह्ममें ही होता है। जैसे—'इन्द्रोयातोऽवसि तस्य राजा' इत्यादि। इन्हें ही ऊढ़ा और अनूढ़ा अथवा अनन्यपूर्विका भी कह सकते हैं अर्थात् एक वे गोपियाँ, जो केवल कृष्णपरायण हैं और दूसरी वे जो श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य पुरुषोंके साथ विवाही गयी हैं। इनके ये दो भेद भी प्रतीतिमात्रके लिये हैं, वास्तविक नहीं। वरुणादि देवताओंमें श्रुतियोंका तात्पर्य तभीतक जान पड़ता है, जबतक 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठ० १।२।१५) इस वाक्यके अनुसार उनका महातात्पर्य एकमात्र परब्रह्ममें ही नहीं जान पड़ता है। वास्तवमें तो जिस प्रकार तरंग समुद्रसे भिन्न नहीं है और घटादि मृत्तिकासे भिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार उपक्रम, उपसंहारादि षड्विध लिंगसे समस्त श्रुतियोंका तात्पर्य ब्रह्ममें ही है, किंतु फिर भी लीलाविशेषके विकासार्थ वस्तुतः अनन्यपरा श्रुतियोंमें भी अन्यपरातत्त्वकी प्रतीति होती है। यहाँ सन्देह होता है कि श्रीराधिकाप्रभृति व्रजांगनाएँ परमात्मा समझी जाती हैं। इतना ही नहीं, बल्कि श्रीव्रजांगनाओंको ही श्रीकृष्ण-प्रेयसी कहा गया है—'यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाऽऽचरत्तपः।' (श्रीमद्भा० १०।१६।३६) जिन श्रीकृष्णके पाद-पंकज-रजकी कामनासे श्रीललना तपस्या करती हैं— नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः। रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ................॥ (श्रीमद्भा० १०।४७।६०) जो प्रसाद श्रीव्रजसीमन्तिनियोंको प्राप्त हुआ है, वह लक्ष्मीको भी नहीं मिल सकता, फिर देवांगनाओंकी तो बात ही क्या ? श्रीदामोदरकी अधरसुधा गोपिकाओंकी ही है। 'दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्' इत्यादि वचनोंसे यही विदित होता है कि श्रीव्रजांगनाएँ अन्योंसे असंस्पृष्ट भगवान्‌की ही शुद्ध प्रेयसी थीं, फिर 'यद्धामार्थसुहृत्प्रियात्मतनयप्राणाशयास्त्वत्कृते॥' (श्रीमद्भा० १०।१४।३५) जिनका धाम, अर्थ, सुहृत्, प्राण, अन्तरात्मा सब कुछ श्रीकृष्णहीके लिये था, वे श्रीकृष्णसे भिन्नको पतिरूपसे स्वीकार कैसे कर सकती थीं ? वह रुक्मिणीकी तरह यह दृढ़ प्रतिज्ञा कर सकती थीं कि—'जह्यामसून् व्रतकृशाञ्छत- जन्मभिः स्यात्॥' (श्रीमद्भा० १०।५२।४३) अर्थात् 'हे नाथ ! व्रतसे कृश प्राणोंको मैं छोड़ दूँगी', फिर उनका अन्य सम्बन्ध कैसे सम्भव है? परंतु यहाँ यह समाधान समझना चाहिये कि श्रुतार्थापत्ति प्रमाणद्वारा अर्थात् श्रुत तत्तत् प्रमाण-वचनोंके अर्थका उपपादन करनेके लिये यह मानना चाहिये कि भगवान्‌की दिव्य लीलाशक्तिसे ही सबको वैसी प्रतीतिमात्र हुई है। श्रीकृष्णसम्मिलनकी आशासे ही ऐसी प्रतीति होनेपर भी व्रजांगनाओंने जीवनकी रक्षा की। उनका अन्य पुरुषोंके साथ सम्बन्ध नहीं हुआ, किंतु उन्हींके समान मायामयी अन्य अंगनाओंसे ही

१४६ भक्तिसुधा उन पतियोंका सम्बन्ध होता था। श्रीकृष्णप्रेयसी ब्रजांगना सदा ही असंस्पृष्ट रही थीं। जैसा कि कहा गया है— नासूयन् खलु कृष्णाय मोहितास्तस्य मायया। मन्यमानाः स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः॥ (श्रीमद्भा० १०।३३।३८) यह भी उनकी उत्कण्ठा बढ़ानेके लिये एक लीला थी। जैसे निर्धन प्राणी धन पाकर बड़ा प्रसन्न होता है, उसके नष्ट होनेपर उसकी चिन्तामें इतना तल्लीन होता है कि अन्य समस्त प्रपंचको भूल ही जाता है, वैसे ही इसमें वैचित्र्यसम्पादनार्थ ही व्यूढ़ा और कुमारीभेद थे। दण्डकारण्यनिवासी मुनिगण भी गोपकुमारियोंके रूपमें प्रकट हुए उनके सिवा दण्डकारण्यनिवासी मुनिगण भी गोपकुमारीके रूपमें प्रकट हैं। वे भी भगवान् रामचन्द्रको देखकर मोहित हो गये थे। अहो! खरदूषण-जैसे मांसरुधिराशी क्रूरकर्मा हिंस्र राक्षस भी जिनकी सरसता, मनोहरतापर मुग्ध हो जाते हैं और कहते हैं—‘जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा॥’ (रा०च०मा० ३।१९।५), वीतराग अरण्यवासी मुनिगण उनपर मुग्ध हो जायें तो क्या आश्चर्य? यहाँ तो रामचन्द्र मर्यादापुरुषोत्तम थे, उन्होंने यही वरदान दिया कि लीलापुरुषोत्तमरूपसे आपलोग व्रजकुमारिका होकर मिलें। वे भी व्रजकुमारिका बनकर कात्यायनीकी अर्चनामें लगे। इसी तरह कुछ देवांगनाएँ भी भगवत्कृपासे सिद्धि प्राप्तकर भगवान्‌को प्राप्त हुई थीं। ऐसे ही कोई भौमवैकुण्ठमें रहनेवाली भौमी थीं, कोई अभौम वैकुण्ठकी अभौमी थीं। युग- युगान्तरों, कल्प-कल्पान्तरोंसे, यह सब पूर्णतम पुरुषोत्तम सर्वप्राणियोंके पर-प्रेमास्पद श्रीकृष्णके सम्मिलनके लिये व्यग्र हो घोर तपस्या कर रही थीं, अब उन्हें व्रजवास, व्रजकुमारिका-जन्म प्राप्त हो गया है। उन्हें यद्यपि श्रीकृष्णदर्शन होता है, परंतु अभी इन्हें श्रीकृष्ण अति दुर्लभ प्रतीत होते हैं। दुर्लभ वस्तु प्राप्त करनेके लिये भगवतीका आश्रयण करना ही चाहिये। पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म श्रीकृष्णकी प्राप्तिके लिये तो ब्रह्मविद्यारूपा कात्यायनीका अवलम्बन युक्त ही है— मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषै- र्विद्यासि सा भगवती परमा हि देवि॥ (श्रीदुर्गासप्तशती ४।९) गोपकुमारिकाओंद्वारा उत्तम वरकी प्राप्तिके लिये देवी कात्यायनीका आराधन अस्तु, समस्त दोष-मोक्षार्थी मुनि अम्बाको श्रीविद्यारूपसे सेवते हैं। इसलिये श्रीमन्नन्दव्रजकुमारिका कृष्णप्राप्तिके लिये कात्यायनीके शरण गयीं। लौकिकी दृष्टिसे भी यह अत्यन्त पवित्र भाव है। कुलीन कुमारिकाएँ सुन्दर वरप्राप्तिके लिये श्रीदेवीकी आराधना करती हैं। श्रीकृष्णका लोकोत्तर सौन्दर्य-माधुर्यादि गुणगण भुवनविख्यात था। ऐसे सुन्दर सर्वगुणसम्पन्न सत्कुलोत्पन्न श्रीकृष्णके प्रति कुमारिकाओंको अपने वरणके लिये स्पृहा होना स्वाभाविक है। अतः उस मनोरथपूर्तिके लिये उनका कात्यायनी अर्चन-व्रत ठीक ही था। जैसे दुर्लभ पदार्थकी प्राप्तिके लिये लोकमें देवताका आराधन किया जाता है, वैसे ही दुर्लभ श्रीकृष्णकी प्राप्तिके लिये नन्दव्रजकुमारिकाएँ भी कात्यायनीके आराधनमें लगीं। भिन्न-भिन्न फलोंके लिये श्रीकृष्णकी आराधनामें कृष्ण-प्रेम गौण रहता है, फल-प्रेम मुख्य होता है। श्रीकृष्णके ही लिये श्रीकृष्णकी आराधनामें श्रीकृष्ण ही फल होते हैं और वे ही साधन भी होते हैं, परंतु श्रीकृष्णप्राप्त्यर्थ कात्यायनीकी आराधनामें श्रीकृष्ण फल ही हैं, उनमें साधनताका निवेश नहीं है। केवल शुद्ध फल श्रीकृष्णके लिये श्रीकुमारिकाओंका कात्यायनी-व्रत अद्भुत कृष्णप्रेमका साधन है। वे अरुणोदयके समय ही कालिन्दीके निर्मल जलमें स्नान करके जलके समीपमें ही देवीकी सिकता (बालुका)-मयी मूर्ति बनाकर पूजा करती थीं। यौवन-संचारके पहले ही श्रीकृष्ण-प्रेममें मोहित होकर वे उन्हें पति चाहने लगी थीं। महानुभावोंने

चीरहरण १४७ कहा है कि व्रजकुमारिकाओंके अंगोंमें अनंगका संचार तो अवस्थाक्रमसे ही हुआ, परंतु सांग श्रीश्यामसुन्दर तो बहुत पहले ही उनके अंग ही क्या, अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रियों एवं रोम-रोममें प्रविष्ट हो गये थे। वे सुगन्धित पुष्पों, बलियों, धूप, दीप एवं प्रवाल, फल, तण्डुल आदि नाना प्रकारके उच्चावच उपहारोंसे श्रीकात्यायनीका पूजन करती थीं। कभी-कभी प्रेममें पूजाका क्रम विस्मृत हो जाता था। श्रीकात्यायनीकी प्रार्थना करती हुई कहती थीं— ‘हे कात्यायनी! आप कात्यायनमुनिवंशप्रकाशक होनेसे परम धर्मदात्री हो। हे महायोगिनी! आप अघटितघटना- पटीयसी हो, अतः हमारे लिये दुर्घट श्रीकृष्ण वर- सम्मिलन भी आपकी कृपासे संगत होगा। हे अम्ब! आप ही अधीश्वरी सर्वोत्कृष्ट स्वामिनी हो। आपको छोड़कर हम सब किसकी शरण जायँ। हे देवि! श्रीमन्नन्दगोप राजकुमारको ही हमारा पति बनाओ। उनकी आराधनासे भी यह सिद्ध हो सकता है, किंतु उनके लिये उन्हींसे प्रार्थना करना रसानुकूल नहीं है। आपकी प्रसन्नताके लिये हम आपको नमस्कार करती हैं।’— कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः। (श्रीमद्भा० १०।२२।४) परम प्रेमोल्लासवश श्रीव्रजकुमारिकाएँ श्रीदेवीकी पूजामें प्रवृत्त हुई हैं, इसमें अनन्यताका व्याघात नहीं होता। भगवत्-प्रेम गन्धके सम्बन्धी गन्धवाह वायुको भी प्रेमी स्पर्श करते हैं। शुद्ध प्रेम ही परम पुरुषार्थ है, अन्यान्य देवतोपासना आदि तो साधनमात्र है। परम साध्यस्वरूप प्रेमके प्रसंगमें वह गौण हो जाता है। प्रेममें माधुर्यभावकी ही प्रधानता रहती है। वहाँ ऐश्वर्यकी स्फूर्ति नहीं होती। अनन्य भक्ति बिना ऐश्वर्यस्फूर्ति नहीं होती। माधुर्यानुभवकालमें ऐश्वर्यका अनुभव होनेपर आश्चर्य होता है। अहो! प्रेमसे ही व्रजांगनाओंने भगवान्‌को वशमें कर लिया, जिसे कि ब्रह्मा आदि न पा सके, परंतु अपनी स्वाभाविकी दृष्टिसे व्रजांगना केवल शुद्ध-माधुर्यका ही आदर करती थीं। यह कात्यायनी-अर्चन-व्रत शुद्ध मधुर प्रेमका ही विलास है। अतएव वे उनसे 'भगवान् पति दो' ऐसा न कहकर नन्दगोपराजकुमार पति माँगती हैं। ऋषिरूपा होनेके कारण उन्हें इस मन्त्रका प्रत्यक्ष हुआ। यहाँ कात्यायनी आधिदैविकी संहारिणी शक्ति हैं। अतः भगवान्‌की अप्राप्तिके हेतुभूत प्रतिबन्धको वे ही दूर कर सकती हैं। भगवत्प्राप्ति-प्रतिबन्धक दुरदृष्ट मिटानेका साधन तप भी है, परंतु वह तो ऋषिरूपा कुमारिकाओंमें पहलेसे ही सिद्ध है। अतः आधिदैविक प्रतिबन्धक मिटानेके लिये आधिदैविकी महाशक्ति कात्यायनी ही समर्थ हैं। कहा जा सकता है कि यदि आधिदैविक प्रतिबन्धक है, तब तो वह भगवान्‌की इच्छासे ही होगा, फिर इसकी निवृत्ति कैसे होगी? परंतु वह महाशक्ति महाभागा है। अल्पभागा होनेसे उन्हें भगवान्‌की आज्ञा न होती, श्रीयशोदाके यहाँ जन्म न होता। अतः महाभागा भगवती कात्यायनीकी प्रार्थनासे प्रभु अपनी इच्छाको भी भगवतीके इच्छानुगुण कर देंगे। हे देवि! आप प्रभुकी ज्येष्ठा भगिनी हैं। सब तरहसे आप हमारे मनोरथको पूरा कर सकती हैं। यदि आप यह कहें कि यह प्रतिबन्ध हमसे नहीं दूर हो सकता तो ठीक नहीं; क्योंकि आप महायोगिनी हैं। यदि आप देवकीके उदरसे बलरामको रोहिणीके उदरमें पहुँचा सकती हैं तो मेरे भगवत्प्राप्ति-प्रतिबन्धक आधिदैविक दुरदृष्टको क्यों नहीं मिटा सकतीं? यदि कहें कि यह आधिदैविकी प्रतिबन्धक शक्ति अत्यन्त बलवती है तो भी देवि! आप अधीश्वरी हैं। भगवान्‌की आप अन्तरंग शक्ति हैं। सर्वप्रकारसे आप व्रजराजकुमारको हमारा पति बना सकती हैं। यदि यह कहो कि भगवान् किसीके पति नहीं हो सकते तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि जब श्रीव्रजराजके कुमार हो गये तो हमारे पति बननेमें क्या आपत्ति है? फिर आप देवी हो, किसी अलौकिक रीतिसे भी आप यह कार्य कर सकती हो। हम इसके

१४८ भक्तिसुधा बदलेमें आपका केवल नमन कर सकती हैं। इस तरह नन्दव्रजकुमारिका श्रीकृष्णमें आसक्त- मन होकर भद्रकाली भगवतीकी अर्चना किया करती थीं। उषाकालमें ही उठकर अपने-अपने वर्गोंसे आहूत होकर अन्योऽन्याबद्धबाहु होकर उच्च स्वरसे श्रीकृष्णका ही गायन करती हुई प्रतिदिन कालिन्दी नहाने जाती थीं। थोड़े ही कालके आराधनसे उनका मन श्रीकृष्णमें आकर्षित हो गया। व्रतका फल यह भी है, परंतु अभी महाफल अवशिष्ट ही है। अस्तु, पूर्णमासीके दिन नित्य प्रतिके समान ही तीरपर आकर पूर्ववत् वस्त्रोंको खोलकर श्रीकृष्णके मंगलमय यशका गायन करती हुई प्रसन्नतासे जल-विहार करने लगीं। व्रतकी पूर्तिका दिन था, प्रसन्नतासे देहानुसन्धानशून्य होकर मानस, वाचिक, कायिक तन्मयतासे श्रीकृष्ण- यश गाती हुई विहार करने लगीं। कुछ भावुकोंका कहना है कि रास-क्रीड़ाके समान अन्योऽन्य- बाहुबद्ध होकर गोपांगनागण परिवेष्टित श्रीकृष्णका यश गाती हुई कालिन्दीमें विहार करने लगीं। कालिन्दीके अवगाहनसे सब प्रकारके दोष दूर होते हैं। ‘कलिं द्यति खण्डयति इति कलिन्दः, तस्यापत्यं कन्या कालिन्दी’। इस व्युत्पत्तिके अनुसार कलिन्दपर्वत ही कलिदोषको दूर करनेवाला है। उसकी कन्यामें भी वे ही सब गुण हैं। अतः कालिन्दी-श्रीयमुनाजीका सेवन करनेसे उन गोप-कुमारिकाओंका परस्पर कलह, भगवान्‌के साथ कलह और कलिकालके दोष दूर होंगे। पुनः अत्यन्त शुद्ध होनेपर श्रीकृष्णप्राप्तिकी योग्यता सम्पन्न होगी। यमुनास्नानका माहात्म्य भावुकोंका कहना है कि श्रीयमुनामें स्नान करते ही प्राणीको श्रीकृष्ण-सम्मिलनकी योग्यता हो जाती है। प्राकृत स्त्रीत्व-पुंस्त्वभाव वर्जित होकर शुद्ध गोपांगना-भावकी प्राप्ति ही रसोपासनाका मूल है। वेदान्तियोंके समान ही रसिकोंके यहाँ भी पहले ‘त्वं’ पदार्थका शोधन अपेक्षित होता है। स्वरूपनिष्ठाके अनन्तर ही निखिल रसामृतमूर्ति श्रीकृष्णकी रसोपासनाका अधिकार प्राप्त होता है। यह सब भाव बहुकालके परिश्रमसे सिद्ध होता है, परंतु श्रीकालिन्दीके सेवनसे सहजहीमें यह भाव मिल जाता है। योगेश्वरेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण व्रजांगनाओंके व्रतका अभिप्राय जानकर, उस कर्मकी सिद्धिके लिये ही अपने दाम, सुदाम, वसुदाम, किंकिणी, गन्ध-पुष्पकादि परम अन्तरंग सखाओंसे परिवृत होकर वहाँ गये। ये सखा श्रीकृष्णके साक्षात् अन्तःकरण ही हैं। भगवान्स्तदभिप्रेत्य कृष्णो योगेश्वरेश्वरः। वयस्यैरावृतस्तत्र गतस्तत्कर्मसिद्धये॥ (श्रीमद्भा० १०।२२।८) यह लीला अलौकिक एवं अप्राकृत है, यही बात प्रदर्शित करनेके लिये इस श्लोकमें श्रीकृष्णके लिये भगवान् और योगेश्वरेश्वर इत्यादि विशेषण आये हैं अर्थात् भगवान् व्रजकुमारिकाओंकी शुद्धभावनासे की गयी आराधनासे सन्तुष्ट होकर उनकी कर्मसिद्धिके लिये पधारे हैं, गोपियोंके नग्न अंग देखनेके लिये नहीं। योगसिद्ध प्राणी भी प्रत्याहारद्वारा इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर लेता है, फिर योगेश्वर तो सर्वज्ञता, सत्य-संकल्पता आदिके स्वामी होते हैं, उनके मनमें ऐसी वासनाओंका जाग्रत् होना नितान्त असम्भव है। फिर महा-महायोगेश्वर, जिनके पादपंकजका सेवन करते हैं, वे योगेश्वरेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण अजातयौवन उन कुमारिकाओंका नग्न अंग देखनेकी ही रुचिसे वहाँ गये, ऐसी दुर्भावना जिनके मनमें उठे, उनसे अधिक हतभाग्य कौन हो सकता है? नन्ददासजीने श्रीकृष्ण और व्रजांगनाओंके सम्बन्धको इसी रूपमें दिखलाया है। ‘तरंगन वारि ज्यों’। जैसे तरंगके प्रत्यंशमें वारि भरपूर है, वैसे ही व्रजांगनाओंके अन्तरात्मा-अन्तःकरण किं बहुना रोम-रोममें श्रीकृष्णरस भरपूर है। परमानन्दरसामृतसिन्धुकी तरंगस्थानीया व्रजांगनाओंकी अपेक्षा भी परमानन्द रसामृतसारसर्वस्व श्रीकृष्णकी माधुर्याधिष्ठात्री महालक्ष्मी अधिक अन्तरंग हैं। जैसे अमृत स्वयं अभेद- सम्बन्धसे अपनी मधुरिमाका अनुभव करे, उसी तरह

चीरहरण १४९ निखिल रसामृतमूर्ति श्रीकृष्ण अपनी माधुर्याधिष्ठात्री महालक्ष्मी श्रीवृषभानुनन्दिनीका अनुभव करते हैं। नायिका-नायकके रूपकसे जीवात्मा-परमात्माके सम्मिलनका वर्णन किया जाता है। अत्यन्त अभिन्न सदा सम्मिलितस्वरूपमें भी वियोग एवं तज्जन्य व्याकुलता आदिकी प्रतीति होती है। सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥ (रा०च०मा० ७।१११।६) कर्मयोग और भक्तियोगकी विलक्षणता कुछ महानुभावोंका कहना है कि नन्द- व्रजकुमारिकाओंके कात्यायनी-अर्चन-व्रतमें चार दोष आ गये। भले ही वे भक्तिमार्गके गुण हों, परंतु कर्ममार्गमें तो दोष ही हैं। कालिन्दी-स्नानमें मौन और सवस्त्र होना आवश्यक था, परंतु ये वस्त्रनिक्षेपपूर्वक कृष्णयशगान करती हुई स्नानमें प्रवृत्त हुईं। अतः मौनका त्याग और वस्त्रका त्याग—ये दो दोष हुए और व्रत-नियममें रहकर क्रीड़ा और देहविस्मरण भी दोष ही हैं। कर्ममें किसी प्रकारकी व्यंगता न आये, सम्यक् रूपसे उसका अनुष्ठान हो, इसलिये ही कर्म फलनिरपेक्ष एवं असक्त होकर कर्मोंके अनुष्ठानका आदेश किया जाता है। क्योंकि ऐसा होनेसे कर्तव्यबुद्ध्या तत्परतासे कर्मोंका ही अनुष्ठान किया जाता है, फलापेक्षया उसमें गौणता बुद्धि या असावधानी नहीं आने पाती। कर्मफलकी चिन्ता और आसक्तिसे साधकको कर्मानुष्ठानमें उचित सावधानी नहीं रह जाती। ऐसी स्थितिमें कर्मकी व्यंगता अवश्य हो जाती है। लीलावती, कलावतीको सत्यनारायण-व्रत-कथामें प्रीति एवं विश्वास था, परंतु जब उन्होंने पति और जामाताका आगमन सुना, तब लीलावती पति- सम्मिलनकी उत्सुकतावश पुत्रीको पूजामें लगाकर, स्वयं पूजा छोड़कर पतिसे मिलने चली गयी। पुत्री भी उसी उत्सुकताके कारण पूजा समाप्तकर, बिना प्रसाद-ग्रहण किये ही चली गयी। बस, व्रतमें व्यंगता आ गयी, अन्ततोगत्वा फिर विघ्न भी खड़ा हो गया। इधर व्रजकुमारिकाओंको भी व्रत-फल, श्रीकृष्ण- प्राप्तिकी उत्सुकतासे व्रतके नियमोंका स्मरण नहीं रहा। जन्मजन्मान्तरों, कल्पकल्पान्तरोंकी श्रीकृष्ण- सम्मिलन-वाञ्छाका प्रवाह कैसे रोका जाय? श्रीकृष्ण- प्रेमोन्मादमें उन्हें कर्म और उसके नियम भूल गये। वे विभोर होकर वस्त्र और मौन—दोनोंको त्यागकर श्रीकृष्णका यशगान करने लगी थीं। प्रेमोन्मादमें ही जल-क्रीड़ा करती-करती देह, दैहिक समस्त प्रपंचको भूल गयी थीं। ये सब कर्ममार्गमें अवश्य दोष हैं, परंतु प्रेममार्गमें तो ये ही सब गुण हैं, प्रेमी तो उसी पूजाको सफल और सांग मानते हैं, जिसमें आराध्य- देवकी स्मृति एवं तन्मयतामें पूजा और उसकी सामग्री विस्मृत हो जाय। हाँ तो भक्ति-सिद्धान्तके गुणोंसे प्रसन्न होकर भगवान् कर्ममार्गके दोषोंसे उत्पन्न हुई व्यंगताको दूर करनेके लिये प्रकट हुए। याज्ञिक लोग उनकी स्मृति और नामोक्तिसे ही कर्मच्छिद्र दूर किया करते हैं— यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु। न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥ श्रीकृष्ण उनके हितकारी परमानन्दरस स्वरूप हैं और योगेश्वरेश्वर हैं। अतः अन्तःस्थित सब प्रकारके दोषोंके निकालनेमें समर्थ हैं। योगेश्वर लोग योगबलसे अन्तःप्रविष्ट होकर दोषको दूर करते हैं, फिर योगेश्वरेश्वरकी तो बात ही क्या है? कुछ महानुभावोंने 'योगेश्वरेश्वर' इस शब्दमेंसे यह अभिप्राय निकाला है कि भगवान् योगेश्वरोंके भी ईश्वर हैं, अतएव उन अपरिगणित व्रजकुमारिकाओंमें प्रत्येकका मनोरथ पूर्ण कर सके और व्रजकुमारिकाओंके नेत्रोंके सामने रखे हुए सभी वस्त्रोंके चुरानेमें समर्थ हुए। प्राणत्यागसे भी अधिक दुष्कर जिनका लज्जात्याग था, उन कुल-कुमारियोंको जलसे निकालकर निरावरण- रूपसे नमन करानेका सामर्थ्य भी उन्हींमें था, फिर निर्जन प्रदेशमें उनके निरावरण सर्वांगका दर्शन करनेपर भी, अत्यन्त स्वाधीन परम सुन्दरियोंका सम्भोग आदि न करना भी योगेश्वरेश्वर श्रीभगवान्का ही कार्य है।

१५० भक्तिसुधा ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसश्श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥ (श्रीविष्णुपुराण ६।५।७४) समग्र ऐश्वर्य, सम्पूर्ण धर्म, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण श्री एवं सम्पूर्ण ज्ञान, वैराग्य जिनमें विद्यमान हों, उन्हें भगवान् कहा जाता है। भिन्न-भिन्न साधकोंमें भगवान्‌की कृपासे भगवान्‌का ही कुछ (असमग्र या असम्पूर्ण) ऐश्वर्य एवं धर्म प्राप्त होता है। यही स्थिति ज्ञान-वैराग्यकी भी है। साधारण धर्मात्मा पुरुष भी नग्न कुमारीको या परस्त्रीको देखनेके लिये उत्सुक नहीं होते। सम्पूर्ण रूपसे धर्म जिसमें विराजमान है, उनकी ऐसी उत्सुकता क्यों होगी? कोई भी वैराग्यवान् एवं ज्ञानवान् मायामय विषयोंके प्रलोभनमें नहीं फँसता, फिर सम्पूर्ण वैराग्य, ज्ञानसम्पन्न भगवान् व्रजकुमारिकाओंके सुन्दर निरावरण अंगमात्र देखनेके लिये ऐसा कैसे कर सकते थे? भगवान्‌का व्रजकुमारिकाओंके साथ परिहास अतएव भावुकोंका कहना है कि यह उन व्रजकुमारिकाओंकी विशेषता है। भगवान्‌ने अपने अद्भुत माधुर्यादि लोकोत्तर चमत्कारसे समग्र ज्ञान- वैराग्यवान् सनकादि, शुकादि मुनीन्द्रोंके मनको खींच लिया है। अतएव अत्यन्त निःस्पृह, निष्काम होनेपर भी भगवान्‌में उन सबका आकर्षण हुआ, परंतु ये व्रजांगनाएँ भगवान्‌से भी अधिक गुणवती हैं, अतः अपने लोकोत्तर प्रेमसे समस्त ज्ञान-वैराग्यवान्‌के मनको भी खींच लिया। इसीलिये कहा है कि समस्त जीव तो भगवान्‌के साथ रमण करनेके लिये सदा लालायित रहते ही हैं; किंतु अहोभाग्य उन लोगोंका है, जिनके साथ रमण करनेके लिये भगवान् उत्सुक हैं। यह केवल विशुद्ध प्रेमकी ही महिमा है कि उनके कर्म सिद्ध करनेके लिये वयस्योंसे समावृत भगवान् पधारे। बड़ी शीघ्रतासे उनके वस्त्रोंको लेकर कदम्बपर चढ़ गये और हँसते हुए बालकोंके साथ उनसे इस तरह परिहास करने लगे—क्यों शीतल जलमें कम्पित हो रही हो? निकलकर शुष्क वस्त्र धारण करो अथवा हे व्रज-बालिकाओ! इस कदम्बकी शाखामें इतने वस्त्रोंको किसने लाकर बाँधा है? क्या आप सब जानती हैं? मैं तो गौ चराते हुए दूरसे यह देखकर कि मेरे कदम्बमें आज विचित्र वस्त्रोंके ही फल-फूल लगे हैं, अभी इसपर चढ़ा हूँ। यदि आपलोग यह कहें कि ये हमारे वस्त्र हैं तो यह तो सम्भव नहीं। तुम्हारे वस्त्र इतने ऊँचे कैसे चढ़ सकते थे? यदि कहो कि तुम्हींने चुराकर इतने ऊँचे रख दिया है तो ठीक है। क्या यह भी कहनेका साहस करोगी? क्या नन्दरायका पुत्र मैं चोर हूँ? क्या तुमलोग मथुरास्थ कंसके पास जाना चाहती हो? यदि कहो कि वस्त्र ही देखो-पहचानो, यह पुरुषके वस्त्र हैं या स्त्रीके हैं? परंतु क्या इस संसारमें तुम्हीं स्त्री हो और कोई स्त्री नहीं है? यदि कहो कि यह ठीक है, परंतु इस निर्जन वनमें हम व्रजबालाओंको छोड़कर और कौन स्त्री आ सकती है? अये! रहःसंचारिणी व्रजबालाओ! क्या आप ही लोग रहस्य क्रीड़ा करती हैं? यदि कहो कि हमलोग यहाँ खेलने नहीं आतीं, अपितु कदम्बदेवता श्रीदुर्गाकी पूजा करने आती हैं तो भी क्या तुम्हीं दुर्गाकी पूजा करती हो? अये मुग्धाओ! यहाँ तो प्रत्येक अर्धरात्रमें वैमानिकी देवियाँ आकर दुर्गाकी पूजा करती हैं। यदि कहो कि ठीक है, परंतु वे वस्त्र छोड़कर क्यों जातीं? परंतु बालाओ, तुम इस तत्त्वको नहीं जानतीं। आज पुनः पूजाके लिये वे वस्त्र छोड़ गयी हैं। व्रजबालाएँ कहती हैं—हे कृष्ण! आप ही इस रहस्यको नहीं जानते, ये वस्त्र हमारे ही हैं।' श्रीकृष्णने कहा—व्रजबालाओ! यदि सचमुच ये तुम्हारे ही वस्त्र हों तो आओ, अपना-अपना वस्त्र पहचानकर विश्वासके लिये शपथ करके ले लो। चाहे सब लोग साथ ही आओ, चाहे दो-तीन मिलकर अथवा एक-एक ही आओ। मिलकर आनेमें भीड़में कोई लोभवती अधिक वस्त्र भी ले सकती है। यदि न आओगी तो वस्त्र नहीं मिलेंगे। यदि समझती हो कि मैं कपटी हूँ, मुझपर विश्वास नहीं है तो मैं

चीरहरण १५१ शपथपूर्वक सत्य कहता हूँ, आपलोग व्रतोंसे कर्षित (दुर्बल) हैं। मैं परिहास नहीं करता हूँ, आप तपस्विनियोंपर दया, भक्ति एवं धर्मका भी भय है, यदि मुझे मिथ्यावादी समझकर अविश्वास करती हो तो भी ठीक नहीं, क्योंकि मैंने कभी भी इस जन्ममें इतनी अवस्थातक झूठ जाना ही नहीं। इस बातको यह सब बालक जानते हैं। यदि कहो कि दूरसे ही इस जलमें वस्त्रोंको फेंक दो या बालकोंद्वारा भेज दो, सो भी ठीक नहीं, क्योंकि ये वस्त्र तुम्हारे हैं या अन्यके, यह नहीं जाने जाते। धार्मिक लोग दूसरोंकी वस्तुओंको नखाग्रसे भी नहीं छूते। अतः तुम्हीं लोग आकर अपने-अपने वस्त्रोंको पहचानकर ले लो। हम दूसरोंकी वस्तुको न लेते हैं, न देते हैं, न छूते हैं। यदि यह समझती हो कि हम लोग कुलकुमारी हैं, तुम्हारे पास आनेमें डरती हैं तो पहले तुममेंसे कोई एक साधारण बाला आये, फिर देख लेना यदि उसके साथ कोई विडम्बना हो तो न आना। अथवा तुम सब मिलकर आओगी तब तो कोई डर ही नहीं है। अये सुमध्यमाओ! तुम्हें आनेमें क्यों संकोच होता है? व्रजांगनाओ! आपलोग जो कहती हैं कि हम राजासे जाकर कहेंगी तो यह सब निरर्थक है; क्योंकि अभी तो आपलोग नग्न हैं, ऐसी अवस्थामें न कंसके पास जा सकती हो, न श्रीनन्दरायके पास ही जा सकती हो। दूसरा कोई तुम्हारे पास है भी नहीं, तब आपलोग राजाके पास कैसे जा सकेंगी? यदि आपलोग अपनेको मेरी दासी कहती हैं और हमारी आज्ञा मानती हैं तो यहाँ आकर अपना वस्त्र लो। प्रेममयी कुमारिकाओंद्वारा अपने वस्त्रोंकी याचना भगवान्के ऐसे परिहास-वचनोंको सुनकर कृष्णाकृष्टचेता होकर शीतल जलमें आकण्ठमग्ना होकर प्रेमर्तिपुरःसर 'हे अंग' ऐसा सम्बोधन करती हुई बोलीं— मानयं भोः कृथास्त्वं नो नन्दगोपसुतं प्रियम्। जानीमोऽङ्ग व्रजश्लाघ्यं देहि वासांसि वेपिताः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२२।१४) ऐसा अन्याय मत करो, हम तो आपको व्रजशिरोमणि, प्रियतम, श्रीनन्दरायका पुत्र समझती हैं, हम काँप रही हैं, वस्त्र दे दो। ऐसा कहकर सब प्रेमसागरमें निमग्न हो गयीं। प्रियतमके प्रेमालापमें मनोलोप हो गया, बाह्य दृष्टिसे परस्पर एक-दूसरीको देखती हुई कहती हैं—'अयि कमलेक्षणे ! श्यामसुन्दर तुम्हें बुलाते हैं।' दूसरी कहती हैं—'अयि सुधामुखी ! तुम्हीं जाओ, इन्हें सुधा पान करा दो।' इस तरह परस्पर परिहास करती रहीं, निकलीं नहीं। श्रीकृष्णके रसमय रहस्य वचनोंको सुनकर कुमारिकाएँ रसाविष्ट हो गयीं। उसी स्थितिमें उन्हें आन्तर दृष्टिसे ही श्रीकृष्ण-सम्बन्ध प्राप्त हुआ। बाह्य ज्ञान होनेपर, लज्जित होकर, प्रत्यक्षके समान श्रीकृष्ण-सम्बन्ध मानकर, संवादार्थ अन्योऽन्यका वीक्षण करने लगीं। अन्योऽन्यका ज्ञान न होनेसे कौतुकमय रसका आस्वादन करती हुई हँसने लगीं, और कहने लगीं—'अये सखि ! जब प्रियतम श्रीकृष्णके बिना रह सकना असम्भव ही है, तब फिर मनमोहनकी ही रुचिका पालन करो। लज्जाको जलांजलि दो', बस हाथोंसे अंगोंका आच्छादन करके निकलीं। प्रीतिकी यही विशेषता है कि प्रियतमके सम्बन्धसे तीव्रातितीव्र दुःख भी परमानन्दमय होकर प्रतीत हो। वेश्याको नहीं, किंतु एक साध्वी सती पतिव्रताके लिये सर्वाधिक कष्ट लज्जात्यागमें ही होता है। प्राणोंका परित्याग उनके लिये सरल है, परंतु लज्जात्याग अतिदुष्कर है, किंतु श्रीकृष्णप्रेममें श्रीकृष्ण-सम्बन्धसे उसको भी वे सहन कर सकीं। महानुभावोंने इस सम्बन्धमें भी उनका महत्त्व गाया है। दुस्त्यज्य त्यागके कारण व्रजांगनाओंकी दिव्य महिमा आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्। या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥ (श्रीमद्भा० १०।४७।६१)

१५२ भक्तिसुधा श्रीउद्धवजीका कहना है—'अहो! इन श्रीव्रजांगनाओंके पाद-पंकज-रज-सेवन करनेवाले वृन्दावनके गुल्म, लता, औषधियोंमें कुछ मैं भी हो जाऊँ; क्योंकि इन्होंने दुस्त्यज स्वजन एवं आर्यपथको छोड़कर श्रुतिविमृग्य मुकुन्दपदवीका सेवन किया।' यहाँ साफ विदित होता है कि स्वैरिणी वेश्याओंके समान इनके लिये लज्जा या आर्यधर्मका त्याग सुगम नहीं था; किंतु जैसे दुर्व्यसनीको दुर्व्यसन दुस्त्यज होता है, माता, पिता, गुरुजनों एवं शास्त्रोंके उपदेश और अपने चाहनेपर भी नहीं छूटता, वैसे ही सुदृढ़ व्रजांगनाओंकी आर्य-धर्मनिष्ठा थी। स्वैरिणियोंको आर्यधर्मसे सम्बन्ध ही नहीं होता, तब वह उन्हें दुस्त्यज क्यों होगा? परंतु यहाँ तो आर्यधर्म अत्यन्त दुस्त्यज था। तभी उसको त्यागकर श्रीकृष्णके भजनेका लोकोत्तर माहात्म्य है। आर्यपथको सुरक्षित रखकर श्रीकृष्णको भजनेवालोंसे भी इनका माहात्म्य अधिक है। अतएव यद्यपि स्वकर्मसे भगवान्‌का आराधन करना प्रथम कोटि है— 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥' (गीता १८।४६) तथापि उससे भी ऊँची एक कोटि और है, जहाँ सर्वकर्म-संन्यास करके एकमात्र भगवत्परायण हुआ जाता है— 'नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति॥' (गीता १८।४९) आज्ञायैवं गुणान् दोषान् मयादिष्टानपि स्वकान्। धर्मान् सन्त्यज्य यः सर्वान् मां भजेत स सत्तमः॥ (श्रीमद्भा० ११।११।३२) यहाँ ध्यान देनेकी बात है कि दुस्त्यज त्यागके कारण ही श्रीव्रजांगनाओंकी दिव्य महिमा है। विशेषता यह है कि किसीको दुराचार, दुर्विचार एवं तद्भावनाजन्य दुर्व्यसन दुस्त्यज होता है, परंतु यहाँ तो आर्यपथ ही दुस्त्यज है। आर्यपथपर चलकर उच्छृंखल पथका त्याग किया जाता है, यह धर्मनिष्ठाकी अद्भुत महिमा है कि आर्यपथ दुस्त्यज हो जाय। वेश्याओंके लिये क्या आर्यमार्ग दुस्त्यज है? जिसने जिसका संस्पर्शतक न किया, वह उसके लिये दुस्त्यज कैसे हो सकता है? इसीलिये वेदोंने पहले पहल श्रौतस्मार्त-कर्मानुष्ठान- रूप आर्यमार्गके आश्रयद्वारा उच्छृंखल पथरूप स्वाभाविक कामकर्मज्ञानके त्यागका आदेश किया है। जैसे किसी दुराचारीको दुराचारका दुर्व्यसन हो जाता है, फिर माता-पिता, गुरुजनों एवं शास्त्रोंके शतशः निषेधसे भी उन दुर्व्यसनोंसे निवृत्ति कठिन हो जाती है। जो प्राणी माता-पिता, गुरुजनोंके आदेशानुसार वेदादि सच्छास्त्रोक्त धर्मोंका सेवन करने लगता है, फिर शनैः-शनैः उसके उच्छृंखलता-सम्बन्धी समस्त संस्कार छूट जाते हैं और सद्धर्मके संस्कार सुस्थिर हो जाते हैं। यहाँतक कि फिर उसे सद्धर्मका ही सद्व्यसन हो जाता है और उसका भी छूटना कठिन हो जाता है। पहले-पहल जब पाशविक कर्मोंकी प्रधानता रहती है, तबतक सत्कर्मोंमें प्रवृत्ति दुष्कर होती है। अतएव कर्मोंका प्रशंसन करके उनका विधान किया जाता है, परंतु सत्कर्मानुष्ठानद्वारा दुष्कर्मोंका त्यागकर जब सत्कर्मनिष्ठाके संस्कार दृढ़ हो जाते हैं, तब नैष्कर्म्यप्राप्तिके लिये या निदिध्यासनादि तत्परता-सम्पादनके लिये उनका त्याग करना अभीष्ट है। एतदर्थ उनका त्याग अभीष्ट होता है। त्यागके लिये ही कहीं-कहीं कर्मोंकी निन्दा भी की गयी होती है—'प्लवा ह्येतेऽदृढा यज्ञरूपाः'। यह एक सर्वसम्मत नियम है कि किसी पदार्थकी स्तुति उसके ग्रहणके लिये और निन्दा उसके त्यागके लिये की जाती है। उच्छृंखलता और पाशविकता स्वाभाविकी है। श्रौतस्मार्तशृङ्खलानिबद्ध चेष्टा दुर्लभ है। रागप्राप्त द्रव्य-क्रियादिकी निन्दाद्वारा निषेध करके स्वतः अप्राप्त धर्मका प्रशंसा-पुरस्सर विधान किया जाता है। श्रीव्रजांगनाएँ पूर्ण स्वधर्मनिष्ठाद्वारा पाशविकी भावनाओंसे अत्यन्त असंस्पृष्ट रहीं। स्वधर्मनिष्ठा उनकी इतनी दृढ़ थी कि जैसे दुर्व्यसनीको दुर्व्यसन दुस्त्यज होता है, वैसे ही उनकी धर्मनिष्ठा आर्यधर्म दुस्त्यज था। जिस समय श्रीकृष्णने अपने अमृतमय