भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 150, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें'यस्माद् व्रजभुवः सकाशाद् देवकीसुतपदाम्बुजा- भ्यां लब्धा लक्ष्म्यो येन' प्रभुके मंगलमय श्रीचरणार- विन्दकी शोभाको उस भूमिद्वारा वृन्दावनने प्राप्त किया। भूमि जब आर्द्र-अनुरागवती होती है, तब इसपर भगवान्के मंगलमय श्रीचरणचिह्न अंकित होते हैं, इसीलिये वृन्दावनने भी भूमिकी कीर्तिको बढ़ाया। इस तरह परस्पर उपकार्योपकारक भाव है। देवकीसुत क्यों कहा ? इसपर वल्लभाचार्य कहते हैं-यह कहनेवाली गोपांगना श्रीनन्दगेहिनीके गेहमें ही रहनेवाली पालित-पोषित कन्या है। ऐसी स्थितिमें श्रीनन्दनन्दन यशोदानन्दन श्रीकृष्ण कहनेमें वह नन्दपालित कन्या सम्बन्धमें अनौचित्य देखती है। इसीलिये कहा 'देवकीसुत'। अथवा सुना था गर्गाचार्यके मुखसे 'प्रागयं वसुदेवस्य' इत्यादि, उसे स्मरणकर कहा। अथवा नन्दरानीका ही दूसरा नाम देवकी था-'द्वे नाम्नी नन्दभार्यायाः यशोदा देवकीति च।' फिर भी विचार यह कि 'देवकीसुतपदा अम्बुजैरिव लब्धा लक्ष्मीर्र्येन' देवकीसुतके दिव्य चरणसे वृन्दावनने ऐसी शोभा पायी, जैसे कमल शोभा पाते हैं। अर्थात् फुल्ल पंकजकी तरह वृन्दावनकी अद्भुत शोभा क्षण- क्षण विकसित होती थी। कहा, सखि! इसमें क्या आश्चर्य ? श्यामसुन्दरके मंगलमय श्रीचरणारविन्द जैसे व्यापी वैकुण्ठमें विराजते हैं, वैसे ही वृन्दारण्यधाममें हैं तो क्या आश्चर्य ? व्यापी वैकुण्ठमें रहनेवाला वृन्दारण्यधाम भूमण्डलमें विराजता है। वास्तवमें वह नेत्रगोलक है, जिसे लोग नेत्र कहते हैं, नेत्रेन्द्रिय इस गोलकके भीतर है; ऐसे ही वृन्दावनधाम है। अतीन्द्रिय वृन्दावनधाम जिस भूमिमें रहता है, उसे भी वृन्दावन कहा जाता है। एवं सर्वोपलब्ध वृन्दावनधाम नेत्रगोलकके समान है अर्थात् भावुक उपासनागम्य अतीन्द्रिय वृन्दावन धाम है। यही उसकी अद्भुत महिमा है। तब इस भूमिपर वह प्रकट कैसे है ? तो भक्तिसे क्या नहीं होता ? जहाँ भक्ति है, वहीं प्रभुके श्रीचरणारविन्द प्रकट होते हैं। ठीक ही है, जहाँ पादपंकज है, वहीं शोभा है, महिमा है। इसकी प्रतिष्ठा इसीसे है। कहते हैं, यहाँ तो श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके चरण ही भक्तिरूप हैं, भक्तिमार्गमें चरणकी ही प्रधानता है। इसलिये वृन्दावनमें चरण प्रतिष्ठितकर भक्तिकी स्थापना की। चरणको अम्बुजकी उपमा देते हैं। अम्बुज कोमल, शीतल एवं तापापनोदक है, वैसी ही भक्ति भी है और उसका वृन्दामें स्थापन है। अतः विशेष भक्ति स्त्रियोंमें ही दिखलायी। इसीलिये श्रीवृषभानु- नन्दिनीमें भक्तिकी पराकाष्ठा है एवं यहाँके प्रसंगमें हरिणी, गौ, मयूरी, पुलिन्दी इनका ही वर्णन है। उनका हृदय अधिक कोमल है। कोमलहृदय भगवद्वियोगजन्य तीव्र तापसे जल्दी द्रुत होता है। स्वभावसे ही कठिन पदार्थ तापसे द्रुत नहीं होता। इसलिये उनके हृदयमें भगवत्सम्बन्ध स्थापित हो तो हृदय द्रुत हो जाय। ऐसा होते ही वहाँ श्रीप्रभुके पादपंकजकी स्थापना होती है। इस प्रकार वृन्दारण्य- धाममें चरण अंकित हो गये और चिह्न स्थायीभावापन्न हो गये। यह भावुकोंको मान्य ही है कि जहाँ-जहाँ भगवान्के श्रीचरणपंकज हैं, वहाँ-वहाँ श्रीवृन्दारण्य- धाम है। व्यापी वैकुण्ठधाममें ही श्रीभगवान्का प्राकट्य होता है। इसलिये कहा-'स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठितः स्वमहिम्नीति होवाच'। श्रीभगवान् अपने-आपमें ही प्रतिष्ठित हैं। सर्वाधार और अपने-आप आधार एवं आधाराधेय, दोनों एकात्मक हैं अथवा यों कहिये कि अव्यक्तके उपरिष्ठात् सत्तत्त्वकी स्थिति है एवं यह आया कि इस प्रकार वृन्दावनने लक्ष्मी पायी तथा भक्ति और ज्ञान भी पाया-'गोविन्दवेणुमनु मत्तमयूरनृत्यम्, (श्रीमद्भा० १०।२१।१०) गोविन्द गवां इन्द्रः।' प्रभुने इन्द्रका मानमर्दन किया, इन्द्रने कुपित होकर मूसलाधार वृष्टिद्वारा गोकुलको बहा देनेकी, मिटा देनेकी आज्ञा दी, पर प्रभुने सात दिनतक गोवर्धन धारणकर गोकुलका संत्राण किया। यह इन्द्रको पता लगा, वह सुरभीके पीछे-पीछे प्रार्थना करने आये। भाव यह कि गोकुलके, गौओंके रक्षणके