भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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शान्त हो जाय। अंकुशध्यानसे मत्त मनोगज अतिशीघ्र वश होता है। वज्रध्यानसे कठिन अनन्तपाप-पर्वतोंका विदारण होता है। यवध्यानसे धनधान्यविहीन कभी नहीं होता। ऐसे हर एक ध्यानके अलग-अलग प्रयोजन बतलाये हैं। वह सब चिह्न व्रजभूमिमें अंकित होते हैं, क्योंकि व्रजभूमि है आर्द्रकोमल सरस भक्तिभूमि, शुष्कनीरस भूमिमें प्रभुके पादपंकजचिह्न कैसे पड़ें? वृन्दादेवी भक्तिमती हैं, अतएव आर्द्र हैं। व्रजांगनाएँ ईर्ष्या प्रकट करती हैं-देखो सखि! देवता ऐसे हैं जो भूमिको नहीं छूते, यही उनका लक्षण है। श्रीअगस्त्याश्रममें जब रामचन्द्र, लक्ष्मण, जानकी आये, वहाँ एक रथ देखा, जिसको तेजस्वीगण उठाये थे। तब लक्ष्मणके पूछनेपर रामचन्द्रने इन्द्रका आगमन बतलाया। हनुमान्‌जीने सीताको भूमिपर देखकर पूछा— देवता नहीं हो तो कौन हो? देवोंके चरण भूको नहीं छूते तो देवेन्द्रके चरण तो दुर्लभ ही हैं, फिर पूर्णतम पुरुषोत्तमके चरणस्पर्श तो अति दुर्लभ—'पुरुष एवेदꣳ सर्वं' विराडात्मा पुरुषका आधिभौतिक पाद ही मही है, आध्यात्मिक पाद अतीन्द्रिय है और आधिदैविक पाद आनन्दरूप है। तात्पर्य—जहाँ पुरुष-चरणस्पर्श दुर्लभ, वहाँ पुरुषोत्तम चरणस्पर्श हुआ। अहोभाग्य है! हमलोग कैसी हतभागिनी हैं। यह वृन्दावन दैत्योंकी भूमि, वृन्दा—दैत्यपत्नीकी भूमि है, पर भाग्य तो देखो। वास्तवमें जैसी वृन्दावनकी भूमि है, वैसा हमारा हृदय भी है; वह कठोर है, यह भी कठोर है; वहाँ गोवर्धनाद्रि यहाँ वक्षोज, वहाँ गंगा यहाँ अनुराग- गंगा, वहाँ वनराजि यहाँ रोमराजि, वहाँपर तो प्रभुने पादस्थापन किया, हमारे हृदयपर नहीं। वह कितनी सौभाग्यशालिनी है! इसलिये कहते हैं 'देवकीसुत।' यदि कहीं यशोदानन्दन होते तो कुछ-न-कुछ सम्बन्ध जोड़ते, हमसे आप प्रेम रखते, हमारी आशा पूर्ण करते। हे महाराज! हम जानती हैं 'न खलु गोपिका- नन्दनो भवान्' (श्रीमद्भा० १०।३१।४)। ऐसी कठोरता न होती। देवकीका हमारा क्या सम्बन्ध! वह क्षत्रियाणी, उसका हृदय कठोर, उसके हृदयसे आपका जन्म होनेसे वही कठोरता आपके हृदयमें उतरी है। यदि गोपिकानन्दन होते तो जैसा उनका हृदय भोलाभाला होता है, वैसा आपका भी हृदय भोलाभाला ही होता। भगवान् वृन्दावनभूमिपर पादन्यास करते हैं, हमारे हृदयपर नहीं, यही ताप है, ईर्ष्या है। इस रहस्यको समझनेवाला बिरला ही है। इसलिये कहा—'हे सखि' (एकवचन) अन्यत्र 'हे सख्यः' (बहुवचन)-का प्रयोग करते हैं। कुछ लोग कहते हैं—यह ईर्ष्या नहीं हो सकती; क्योंकि गोपी निर्गुणा है। सात्त्विकी-राजसी-तामसीमें यह सम्भव है। एक पक्ष ऐसा है कि है तो यह निर्गुणा, पर इस रसकी स्थिति ऐसी है कि निर्गुणामें भी रसका संचार होता है अथवा दैन्यद्वारा सर्वथा निर्गुणत्वका ही सूचन है। देखो सखि! हमसे अधिक सौभाग्यशालिनी यह भूमि है। हमें गोपांगना-जन्ममें जो प्राप्त नहीं, वह इस भूमिको प्राप्त है। उनका भाव यह है कि जैसे श्यामसुन्दरके चरणसम्पर्कसे वृन्दारण्यकी शोभा है, वैसे ही प्रभुके चरणसम्पर्कसे हमारे हृदयकी शोभा है। जहाँ पादपंकज नहीं है, वहाँ शोभा भी नहीं है। कुछ भावुक कहते हैं कि—'गोप्यः किमाचरदयम्' इससे प्रथम वेणु-महिमा वर्णन किया, जिससे उसके सर्वातिशायिनी होनेसे वृषभानुनन्दिनी दुःखित हुई। इसलिये उन्हींको सम्बोधित करती हुई कहती है। अतः एकवचनका प्रयोग हुआ। यह वृन्दावन भूमण्डलकी विचित्र कीर्तिका विस्तार करता है, इसमें अपना और वृषभानुनन्दिनीका उत्कर्ष बोधित किया। वृन्दारण्यधाम तो केवल भूमिकी कीर्तिका ही विस्तार कर रहा है। स्वयं उसका आनन्द नहीं जानता, रसका अभिज्ञ नहीं है, अतएव भाग्यशाली नहीं है। केवल परोपकार-ही-परोपकार करता है। इसलिये इनका भाव यह है कि अस्मदादि स्वयं श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरके अद्भुत अनुराग-रसका आस्वादन करती हैं। वृन्दावन व्रजभूमिमें परस्पर उपकार्योपकारक भाव है। इस वृन्दावनसे व्रजभूमिकी महिमा विस्तृत होती है, व्रजभूमिसे वृन्दावनको लक्ष्मी प्राप्त होती है।