भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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१३८ भक्तिसुधा तेऽधिकं जन्मना व्रजः' (श्रीमद्भा० १०।३१।१) आपके जन्मसे व्रज बहुत अधिक विजयी होता है, वैकुण्ठादि लोकोंसे भी; क्योंकि वहाँ, वैकुण्ठनाथ भगवान्‌की प्राणेश्वरी होनेके कारण लक्ष्मी सेव्या— आराध्या हैं, वही इस व्रजमें सेविका ('श्रयते') हैं तो वृन्दावनमें समस्त गुणोंका अवन—संत्राण ठीक ही है। इसलिये सर्वमानमोदनादि गम्भीर शक्तिके जो उत्कृष्टतर भाव हैं, वे 'उज्ज्वलनीलमणि' इत्यादि ग्रन्थोंमें वर्णित हैं। सब भाव सामस्त्येन कहीं उपलब्ध नहीं होते, इस वृन्दावनमें ही सबका संत्राण होता है। यहाँ ही प्रेमकी सब अवस्थाएँ विराजमान हैं। साधारण रूपमें प्रेमका अणुपरिमाण सर्वत्र है। चराचरमें कोई ऐसा तत्त्व नहीं; जहाँ प्रेमकी मात्रा न हो। उस प्रेमका सदुपयोग-दुरुपयोग होना—यह दूसरी बात है। कोई माता-पितामें, कोई भगवान्‌में प्रेम करते हैं,