भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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वेणुगीत १३७

इसने किया कि आनन्दरससिन्धुके रसका लाभ इसे नहीं होता। तात्पर्य, अधरसुधाके असम्भवमें 'किम्' आक्षेपार्थ और सम्भवमें प्रश्नार्थक है। अच्छा सखि! यह देखना कि आखिर श्रीव्रजांगनाओंको जो सुमधुर अधरसुधा प्रदान की जायगी, वह वेणुद्वारा की जायगी। वेणुका छिद्र ही वेणुका मुख है, उसीके द्वारा मिलेगी, कहा ही है— 'रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) इसलिये व्रजांगनाओंके लिये भी जो सुधासम्पृक्त है, वह पहले-पहले वेणुछिद्रोंमें ही प्रविष्ट होगी, क्या कारण है कि वह सम्भोग न करे? अपने मुखमें आये रसका पान वह कैसे न करे? कहा—यदि अनुग्रह- मार्गसे मनमोहन श्यामसुन्दरने स्वयं ही उसे प्रदान किया तो फिर तुम जलती क्यों हो? कहती हैं, नहीं। यह 'स्वयं' सम्भोग कर रहा है, मनमोहनने इसे नहीं दिया। हमारे लिये ही उसके छिद्रोंमें भरपूर किया है। जैसे अन्यके लिये सम्प्रदान किये हुए रसको अन्य— पहुँचानेवाला सम्भोग करे, वैसे ही इस वेणुने किया और वह भी लुका-छिपाकर नहीं, फूँक करके। वृन्दावनका सौभाग्य वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिं यद् देवकीसुतपदाम्बुजलब्धलक्ष्मि। गोविन्दवेणुमनु मत्तमयूरनृत्यं प्रेक्ष्याद्रिसान्वपरतान्यसमस्तसत्त्वम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।१०) श्रीव्रजांगनाएँ आपसमें कहती हैं—हे सखि! यह वृन्दावन भूमण्डलकी कीर्तिका विस्तार कर रहा है। सखि! देवकीसुत भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मंगलमय श्रीचरणारविन्दकी शोभाको इसने पाया, यानी स्वयं श्रीवृन्दारण्यधामकी शोभा महिमा मनोवचनातीत है; क्योंकि वृन्दारण्यधाम भगवत्स्वरूप है। जैसे भगवान्‌की महिमा अचिन्त्य अनन्त अद्भुत है, वैसे वृन्दारण्यकी महिमा भी अचिन्त्य अनन्त अद्भुत है; इसलिये उसकी महिमा क्या बढ़ेगी, अपितु उससे भूमण्डलकी शोभा विस्तृत हुई। 'वृन्दावन' का अर्थ—'वृन्दस्य गुणसमूहस्य, गुणिसमूहस्य अवनं यस्मात् तत्।' रसिकवृन्द और गुणवृन्दका अवन—संत्राण— रक्षण जिससे है अर्थात् रसिकजनोंके एकमात्र जीवनका आलम्बन श्रीवृन्दारण्यधाम है। इसपर भावुकोंकी बड़ी ऊँची-ऊँची भावनाएँ होती हैं, कहते हैं— 'मिलन्तु' अगर वृन्दावनके बाहर कोटि-कोटि चिन्तामणि मिले, इतना ही क्या, स्वयं श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दर मनमोहन वृन्दारण्यकी सीमाके बाहर खड़े होकर बुलायें तो मत जाओ। कहते हैं—'विपिनराज सीमाके बाहर हरिहूँ को न निहार।' यह कहा जा चुका है कि वस्तु तो वहाँ अचिन्त्य अनन्त परमानन्दरसामृतमूर्ति भगवान् हैं, उनमें कमी-वेशी नहीं है, वे पूर्ण ही हैं, पर स्थानभेदसे अलग-अलग महिमान्वित होता है— बाँसमें वंशलोचन, गोकर्णमें गोरोचन, गजकर्णमें गजमुक्ता, सीपीमें मुक्ता इत्यादि; मूलमें कोई फेर नहीं, वैसे श्रीकृष्ण निखिलरसामृतमूर्ति उद्बुद्ध उभयविध शृंगार रसात्मा ही हैं, पर वृन्दारण्यधाम वह सीपी है, जहाँ श्रीकृष्णपरमानन्दकन्द अधिक शोभा-समन्वित होते हैं। अन्यत्र द्वारकाधीशमें ऐश्वर्यका, मथुरानाथमें बलादिका प्राकट्य है, पर श्रीवृन्दारण्यधीश श्रीकृष्णमें माधुर्यका प्राकट्य है, ऐश्वर्यादि तिरोहित है। इसलिये जहाँ जितना माधुर्यभावका अधिक प्राकट्य है, वहीं भावुकोंकी सरसता है। अतः वही व्याख्या 'व्रजाङ्गनावृन्दस्य जीवनं वृन्दावनम्' है। नहीं तो प्रभुके वियोगमें संतप्त व्रजांगनाएँ व्रजमें पड़ी तड़पती थीं, मनमोहनके वियोगमें व्याकुल हो रही थीं, मथुरानाथके दर्शनके लिये मथुरा न जातीं? न ही, उनका श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरमें प्रेम है, वह मथुरानाथ, गोलोकनाथादिको नहीं चाहती थीं, केवल व्रजनाथको चाहती थीं। इस तरह व्रजांगनावृन्दका अवन—संत्राण अथवा समस्त गुणवृन्दका भवन जहाँ है, वह वृन्दावन है। गोपांगनाएँ कहती हैं—'जयति