भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ भक्तिसुधा भोग कर रही है। यही दोष है। कहा—यह वेणु नहीं, वेन राजा है, उसका लक्षण इसमें पूरा-पूरा मिलता है। वेन क्या कहता था—'न दातव्यम्' इत्यादि। 'हे प्रजाओ! तुम जप- तप मत करो, केवल मेरा श्रवणादि करो, मैं ही सब कुछ हूँ।' यह वेन भी हम सबको यही सिखाता है— कुछ मत करो, केवल मेरा ध्यान धरो। सचमुच हमारा सब काम इसके श्रवणमात्रसे छूट जाता है। सब कर्म- धर्म छूट गया। आश्चर्य यही कि उस वेनने क्या कुशल कर्म किया कि उसे यह सौभाग्य मिला? उस वेनसे इसमें यह विशेषता है कि वह एक मुखसे स्वसिद्धान्तका प्रचार करता था, यह सात मुखसे करता है। सचमुच एक बार जिसने इस मोहनमन्त्रको सुना, उसका सब छूट गया। 'शक्रशर्वपरमेष्ठिपुरोगाः**** कश्मलं ययुर- निश्चिततत्त्वाः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३५।१५) सनकादि महामुनीन्द्रगण आश्चर्यमें चकित हैं कि यह वेणु क्या कह रहा है? कहा सखि! वह तो वेन रहा, यह तो वेणु है। कहा—यह णत्व उत्वकी ओढ़नी ओढ़कर आया है। अगर वैसे आता तो कोई सुनता नहीं, क्योंकि वह नास्तिकप्रख्यात था। तो सखि! इस वेनने कौन-सा पुण्य किया कि वह समर्थ हो गया और थकता भी नहीं, इसलिये निरन्तर अधरसुधाका पान करता है। खैर, जो कुछ करता तो करता ही है, श्यामसुन्दरके अधरसुधाका सम्भोग कर रहा है, 'अहो धन्या वयम्।' यदि किसीका पालित शिशु सम्राट् हो तो उसे कितना आनन्द होता है तो सरसी नदी यह सोचती कि जगद्वन्द्य पूर्णतम पुरुषोत्तमके मुखचन्द्रकी सुमधुर अधरसुधाका सम्भोग करता जिसके लिये व्रजांगनाएँ ललचा रही हैं, हमारे जलसे यह परिपुष्ट है। उसीके आनन्दसे कमल- कमलिनी व्याजसे रोमांच आये हैं। व्रजांगना कहती है—सखि! वेणुको अपने जलसे पालन करनेवाली सरिता अपनेको धन्य समझती है। तो अनुमान करो कि यह हमारे प्राणाधारका अवश्य सम्भोग करता है। अगर उनपर विश्वास न हो तो वृक्षोंको देखो; उनमें मधुधारा टपकती है। वृक्ष सोचते हैं कि बाँस भी तो हमारी ही जातिका है। हमारी जातिमें ऐसा सौभाग्यशाली वेणु हुआ, जो सुमधुर अधरसुधाका सम्भोग करता है। जैसे वंशमें सत्पुरुष हो तो इक्कीस पीढ़ी तरनेकी आशा होती है। इसलिये भगवद्भक्तोंको देखकर उनके पितर प्रसन्न होकर आनन्दाश्रुकी वर्षा करते हैं, वैसे ही वृक्ष मधुधारा टपकाते हैं। अबतक सखि! क्षमा किया, अब वह वेणु 'गोप्यः' चुराना चाहिये। जिसको मनमोहन ढूँढ़ते फिरें। दुरुपयोग कर रहा है, इसलिये 'गोप्यः' चुरा लेना चाहिये। इसपर श्रीवल्लभाचार्य कहते हैं—वास्तवमें यह वेणु दामोदरके अधरसुधाका पान करता है कि नहीं, यह विचारणीय है। कहती हैं—सखि! मुखसंस्पर्शसे यही विदित होता है कि हमारे प्रियतमके अधरसुधाका यह पान करता है, जैसे हमें, वैसे ही इसे। क्या कारण है कि हमें अधरसुधा प्राप्त हो, इसे नहीं? यदि पान किया है तो यह सोचो कि यह इसने पाया कैसे? तो मर्यादामार्गसे नहीं सही, पर अनुग्रहमार्गसे पुष्टिमार्गसे पाया है। अर्थात् स्वयं प्रभुने ही इस वेणुको अधरसुधा दे दिया। तो ठीक है, यदि अनुग्रहसे देना चाहते थे, तब तो इसे गोपांगनादेहकी प्राप्ति होती, उसके द्वारा यह भोग करता, पर यह पुमान् सच्छिद्र नीरस सग्रन्थि है। अनुग्रहसे भी प्राप्त हो, परं च उसके लिये योग्यता- सम्पादन तो आवश्यक है। इसलिये प्रतीत होता है कि यह केवल स्पर्शमात्र करता है, सम्भोग नहीं। वास्तवमें श्रीकृष्णचन्द्रकी भगवद्भोग्या सुमधुर अधरसुधा श्रीव्रजवनिताओंको देनेके लिये वेणुमें निक्षिप्त किया अर्थात् वेणु दर्वीसमान है। दर्वीसे रस दूसरेको दिया जाता है, वह स्वयं रसग्राही नहीं होती। व्रजांगनाओंको दिवसमें अधरसुधा कैसे प्राप्त हो, इसलिये यह काम रचा और व्रजांगनाओंको अनुग्रहविशेषसे हृदयमें प्रविष्ट किया। जैसे सम्प्रयोगमें सम्भोग होता ही है, पर विप्रयोगमें भी भोग होता है। इसलिये वेणुको सुधा-सम्भोगका अधिकार नहीं, यह केवल पात्र ही मात्र है। तो यदि सम्भोग नहीं तो कौन-सा ऐसा कर्म