भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 778 में से

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किंतु यह दूसरेके सम्भोगसे ही आनन्दित है। निनादरूपमें परिणत दामोदरके अधरसुधारसको अपने उच्छिष्टरूपमें सरसियोंको और वृक्षोंको वेणुने दिया। वह महामोहन नादरूपमें प्रकट रस सभीने लिया। वेणूच्छिष्ट रससम्भोगसे सरसियोंको होनेवाला रोमांच व्याजसे आनन्द है तो वेणुको कितना आनन्द होता होगा! इसलिये हम भी गोपीजन्म त्यागकर वेणुजन्म लें। अथवा यह वेणु कितना निर्दय है कि हमारी वृषभानुनन्दिनीके दामोदरके अधरसुधाको स्वयं भोगता है और अपने कुटुम्बियोंको भी बाँटता है। देखो न! नदियाँ रोमांचित हो उठी हैं, वृक्षोंमें आनन्दाश्रु आये हैं। अथवा यह दुरुपयोग करता है। दूसरेकी सम्पत्तिको—सर्वस्वको लेता है तो ले, पर ऐसी दुर्लभ वस्तु सुमधुर अधरसुधारस उसको यह अतृप्तिसे इतना पान करता है कि छिद्रोंसे वह रस निकलकर सरसियोंको भी आप्लावित करता है अर्थात् इन अनधिकारियोंको प्रदान करता है। जो रस वृषभानुनन्दिनीको तथा हमको दुर्लभ है, उसे इन जड़ और पाषाणोंको देना कितना निर्दयताका काम है। अथवा सखि! दामोदरके अवशिष्ट अधरसुधारसको इन सरसियोंने पान किया जलविहारके अवसरमें। पर वह रस नहीं था, द्रवमात्र और वह भी उच्छिष्ट है। सुधाका पान तो वेणुने ही कर लिया, उसके उच्छिष्टको पान करके भी इनको इतना आनन्द हुआ और उस सरसी तटके तरुओंने सरसीका जल पान किया, इस परम्परासे उनको वेणूच्छिष्ट प्राप्त है। अथवा तरुओंको उसकी प्राप्ति न होनेसे वे रोने लगे, देखो! हमारे सजातीय बाँसका वेणु पान करता है। सरसियोंको भी थोड़ा मिला। हम हतभाग्योंको कभी भी नहीं मिला। कहा—तरुओंको तो सम्भावना ही नहीं, फिर वह अप्राप्तिमें क्यों रोते हैं? भृत्योंको साम्राज्याप्राप्तिमें दुःख होता है? तो यह रंकभूत्योपम वृक्ष है। कहा— 'यथार्या:'—जैसे आर्यलोग। यद्यपि दामोदरके अधरसुधारस-सम्भोगकी प्राप्ति उन्हें नहीं तथापि शोक करते हैं। साधारण स्थितिमें गोपांगनाभावप्राप्ति बिना सुमधुर अधरसुधारसकी प्राप्ति नहीं, फिर भी श्रवणसे श्रोता लोग अश्रुमोचन करते हैं। वैसे ही यह परोपकारक छाया, फल, फूल, काष्ठसे सेवा करनेवाले वृक्ष, शोकमें अश्रुमोचन करते हैं तो मालूम होता है कि वेणु परमपुण्यवान् है। अच्छा सखि! फिर क्या बात है, भोग लेने दो! तो कहते हैं, वह अवशिष्ट रस 'गोपिकानां अवशिष्टरसम्' जिस रसका यह वेणु दुरुपयोग कर रहा है, वह गोपांगनाओंका अवशिष्ट ही रह रहा है। यानी गोपियोंने एक दामोदरके अधरसुधाकी आशासे

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