भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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१३४ भक्तिसुधा

सम्भोग करता है, दूसरी तरफसे निकलता है। इसलिये यह दामोदरके अधरसुधाको निर्लज्ज होकर पान करता जाता है। यह अतृप्तिपुरःसर धैर्य छोड़कर पीता ही जाता है। वही वेणुनादरूपमें निकलता है। यह वेणुगीत सुमधुर अधरसुधा वेणुनादरूपमें प्रकट होकर नदियोंको मिला। देखो, उस वेणुरव—वेणुगीत पीयूषरूपमें प्रकट दामोदरके अधरकी अधरसुधाका पानकर सरसियोंको रोमांच हो रहा है। यही कहा 'हृष्यत्त्वचः' जिसके उच्छिष्ट रसको पानकर सरसियोंमें कमल-कमलिनी विकसित होते हैं—रोमांच हो रहे हैं। बड़े आनन्दोद्रेकमें रोमांच होते हैं तो क्या इसका उच्छिष्ट पान करनेवाली—ह्रदिनी पान करती है तो यह नहीं करता होगा? कैसे कहती हो 'बहन'! 'तरवोऽश्रु मुमुचुः'—सखि! तरुओंमें भी उसी नादसे मधुधाराएँ टपकने लगीं। श्रीकृष्णचन्द्र जब मुखचन्द्रपर वेणु धारणकर गीत विस्तार करने लगते हैं, तब लताओंमें, वृक्षोंमें मधुधारा टपकने लगती है। उसीपर व्रजांगनाओंकी कल्पना है कि मानो वृक्ष आनन्दाश्रु मोचन कर रहे हैं। शोकाश्रु गरम होते हैं। आनन्दाश्रु ठण्डे होते हैं। तोह करके पहिचानना चाहिये। जैसे आर्यजन परमरसामृतसिन्धुमें अवगाहनकर आनन्दाश्रु छोड़ते हैं, वैसे ही अथवा यह कि वेणुने जरूर दामोदरके अधरसुधाका भोग किया है; क्योंकि ये जो सरसी-सरिताएँ कमलसंयुक्त हो रही हैं, वह यह आनन्द है कि हमारे जलसे ही यह बाँसका वेणु सौभाग्यशाली है, जो—'गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।९) व्रजसीमन्तिनी कहती है—हे सखि, इस वेणुने कौन-सा पुण्यकर्म किया, जो यह दामोदरके अधरसुधाका पान करने लगी। अभीतक तो हृदयमें, करारविन्दमें रहती रही, पर अब तो अधरसुधाका सम्भोग कर रही है। यहाँपर 'दामोदर' से राधादामोदरका द्वन्द्व विवक्षित है तो दामोदरसे याने द्वन्द्वमें एकका नाम लेनेसे अन्य सम्बन्धका भी बोध होता है, अर्थात् इस वेणुने रासेश्वरी नित्यनिकुंजेश्वरी जो वृषभानुनन्दिनी है, उसके जो प्रियतम प्राणधन श्रीदामोदर हैं, उनके सुमधुर अधरसुधाको भी पान करना आरम्भ किया। जबकि हमारी स्वामिनी रासेश्वरी नित्यनिकुंजेश्वरी वृषभानु- नन्दिनीके प्रियतम प्राणधन मनमोहन श्यामसुन्दरके अमृतमय मुखचन्द्रकी अधरसुधा हमारी ही है। उसपर वेणुका अधिकार नहीं तो भी यह सम्भोग करती है। हमलोगोंकी सम्पत्ति प्राणाधारसर्वस्वको, यह स्वयं स्वातन्त्र्येण—यथेष्ट—यह नहीं कि थोड़ा, बिना पूछे- ताछे भोग रही है। दूसरी गोपिका पूछती है—सखि! यह कैसे जाना कि यह अधरसुधाका भोग कर रही है ? यह तो नीरस काष्ठ है, अधरसुधाका पान तो चेतनका धर्म है, अचेतनका नहीं और चेतनमें भी सबका नहीं, केवल गोपांगनाभावापन्नोंका ही। इसलिये पुंस्त्वेनापि भोगायोग्यता दिखलायी। यह वेणु तो पुमान् तत्रापि अचेतन काष्ठमय नीरस है, यानी अगर चेतन हो, तत्रापि गोपांगनाभावापन्न हो, सरस हो, रसाक्रान्त हो, तब दामोदरके अधरसुधाके सम्भोगकी योग्यता प्राप्त होती। तब कैसे कल्पना करती हो कि इस वेणुने अधरसुधाका पान किया? तो कहा—मातृतुल्या सरसियोंको रोमांच हो रहा है। रोमांच हर्षोद्रेकमें होता है तो यह सरसियोंका रोमांच निर्हेतुक कैसे हो सकता है? इनके हर्षका मूल्य यही कि इन्हींके जलसे यह वेणु पालित-पोषित है। उसका यह लोकोत्तर सौभाग्य देखकर, जैसे माता अपने पाले-पोसे बच्चेको साम्राज्याधिरूढ़ देखकर पुलकावलीयुत होती है, वैसे ही यह सरिता सोचती है कि हमारे ही जलसे पालित वेणु आज श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मुखचन्द्रपर विराजमान होकर अधरसुधाका पान कर रही है। तो इस रोमांचसे ही पता चलता है कि वेणु अधरसुधाका भोग लेती है। कुलवृद्धतुल्य तरुओं तथा लताओंसे बहती हुई मधुधारा हर्षके आँसू हैं। यह समझ रहे हैं कि हमारे वंशमें उत्पन्न बाँसका वेणु इतना सौभाग्यशाली हुआ कि अधरसुधाका पान कर रहा है। अथवा यह कि सरसियोंको अधरसुधाका सम्भोग प्राप्त नहीं है,