भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 151

लिये प्रभुका अवतार है। इसलिये इनपर कृपा है। आकर सुरभीने कहा—हम सब अपने ईश्वर इन्द्ररूपसे आपका अभिषेक करना चाहती हैं। प्रभुने प्रार्थना स्वीकार की, सुरभीने दुग्धसे अभिषेक किया, तबसे गोविन्द नाम प्रख्यात हुआ। वेणुनादसे आकृष्ट मयूरोंका नर्तन गोपालचूड़ामणि भगवान् वन्यवेश धारण किये हुए, गोपाल-गोवत्स आदिसे परिवेष्टित जैसे वनमें पधारते हैं, वैसे उनके मंगलमय अमृतमय मुखचन्द्रके दर्शनसे मयूर-मयूरी लोग प्रसन्न हो जाते हैं और जानते हैं कि कोई अद्भुत दामिनीसे विद्युल्लताके समान पीताम्बरसे परिवेष्टित नवनील नीरद मन्द- मन्द गर्जनतुल्य वेणुनिनाद करता हुआ अभिव्यक्त हुआ है। उनको देखते ही मयूर नाचने लगते हैं। उस पीताम्बरके अद्भुत दमक-चमक आनन्दोल्लासमें विभोर होकर नाचते हैं। एक मयूर नहीं 'मयूराः' यह भक्तिकी सूचना। इन मयूरोंकी तरह भक्त भी प्रफुल्ल होकर नाचने लगते हैं, मानो वृन्दारण्य धाम भी नाचने लगा। उस स्थितिमें कपोत, हंस, कारण्डवादि दूसरे जन्तु सब-के-सब ऊँचे गोवर्धन सानुपर बैठकर उस नृत्यको देख, मनमोहन श्यामसुन्दरके मंगलमय श्रीअंगको देखकर और वेणुका मधुर-मधुर नाद श्रवणकर जहाँ-के-तहाँ चित्रलिखितसे रह जाते हैं। वल्लभाचार्यजी कहते हैं—इससे ज्ञान सूचित है और सब ज्ञानी मयूर भक्त हैं। सो पशु-पक्षी तथा सर्पादि तामस हैं और ज्ञान तो सात्त्विक है। तो इसीलिये वह सब गोवर्धनके उच्च शिखरपर निर्भय होकर बैठे हैं—'ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था' (गीता १४।१८)। तात्पर्य यह कि श्रीवृन्दारण्यधामने ज्ञान, भक्ति सबको प्राप्त कर लिया, इसीलिये वह धन्य है सखि! 'वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिम्' (श्रीमद्भा० १०।२१।१०)। कुछ भावुक कहते हैं—'गोविन्दस्य वेणुरेव मनुः मोहनमन्त्रः' गोपालचूड़ामणि श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका वेणुनाद ही मोहनमन्त्र है। उसीसे मत्त होकर मयूरोंने नृत्य आरम्भ किया। उसको देखकर अन्य सब स्तब्ध होकर तल्लीन हो गये। वह कहता है—सब छोड़ो, केवल प्रभुके श्रीचरणारविन्दोंमें मन लगाओ। इसीलिये कहा—संसारके सब प्रवाह दूसरी तरफ खींचते हैं, वेणुध्वनिप्रवाह प्रभुकी ओर खींचता है। 'अद्रिसान्वपरतान्यसमस्तसत्त्वम्' (श्रीमद्भा० १०।२१।१०) 'अद्रिसानुषु उपरतानि सर्वाभ्यः क्रियाभ्य उपरतानि अत्र समस्तसत्त्वानि।' ऐसा वृन्दारण्यधाम है। कुछ लोग कहते हैं— मयूरपिच्छधारी प्रभुको देखकर जैसे अन्य समस्त प्राणी स्तब्ध हो गये, वैसे मयूर क्यों नहीं हुए ? उसे नृत्य कैसे सूझा ? तो कहते हैं—मयूरोंको श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द दामिनीपरिवेष्टित मन्द गर्जन करते हुए नवनीलनीरद स्वरूपमें ही प्रकट हुए। जैसे 'मल्लानामशनि' के वर्णनके अनुसार हर एकको अलग-अलग प्रभु दीखे, वैसे ही यहाँ भी मयूरोंके लिये मेघस्वरूपमें प्रकट होनेसे उनको नाचना ही सूझा एवं कोकिलाओंको सरस वसन्तस्वरूपकी प्रभुमें स्फूर्ति हुई अथवा ये मयूरपिच्छधारी श्रीकृष्ण मयूर- प्रिय हैं, उनको देखकर मयूरने नाचना आरम्भ किया और प्रार्थना की कि आप बजाओ और हम नाचें। कैसा सुन्दर दृश्य है। मनमोहन श्यामसुन्दर वेणुनाद करते हैं और मयूर नृत्य करते हैं। यही कहा— 'वेणुमनु'। वेणुमें गायन भी और वादन भी, तदनुकूल नृत्य हो रहा है और सब खग-मृगादि सभ्यवृन्द द्रष्टा-श्रोता स्तब्ध हैं। अब जिस प्रकार बजानेवाले वादकने अगर ठीक बजाया तो उसपर प्रसन्न होकर इनाम दिया जाता है, वैसे ही मयूरने श्रीभगवान्के वादनपर प्रसन्न होकर पिच्छ दिया और प्रभुने भी बड़े आदरके साथ उसको अपने मस्तकपर धारण किया। अथवा पहले तो मयूरने दामिनीपरिवेष्टित नवनीलनीरद मानकर नृत्य आरम्भ किया। उसके नृत्यको देखकर भगवान्ने वेणु-वादन आरम्भ किया तो पीछे भेद खुल गया। नवनीलनीरदमें गम्भीरता, श्यामलत्ता, तापा-