भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४२ भक्तिसुधा पनोदकता, मनोहारिता इत्यादि जो गुण हैं, वे तो सब प्रभुमें हैं ही; पर आखिर वह नीरद यह अमृतद, वह जलद, यहाँ प्रेमानन्दकी वर्षा। प्राकृत दामिनीसे अनन्तकोटिगुणित दीप्तिसम्पन्न पीताम्बर और वेणुवादनकी अद्भुत मनोहारिता इत्यादि। प्राकृत नीरदोंसे जब उसे विशेष अतिशयिताका अनुभव होता, तब मयूर भी स्तब्ध हो जाते हैं। इस पक्षमें पहले ‘मयूरेभ्यः अन्यानि’ ऐसा अर्थ किया। अब ‘अवरतानि अन्यसमस्ततत्त्वानि’ ‘अवरते अन्ये रजस्तमसी अवरत’ उपरत है अन्य रज, तम जिसमें। वह समस्त सत्त्व जिसमें रज और तमकी सामस्त्येन निवृत्ति है, ऐसा पूर्णरूपेण विकसित सत्त्व जहाँ है, ऐसा श्रीवृन्दारण्यधाम ‘वृन्दावन’। ‘वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिम्।’ (श्रीमद्भा० १०।२१।१०) कहते हैं, गोपालचूड़ामणि श्रीकृष्णचन्द्र