भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचीरहरण १४३ गोपांगनाओंकी भगवत्क्रीड़ामें परम आसक्ति कही गयी है। अब नन्दव्रजकुमारिकाओंकी आसक्तिका निरूपण किया जाता है। कुमारिकाएँ श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द भगवान्को वररूपमें प्राप्त करनेके लिये दुर्गम-संगमनी भगवती कात्यायनीकी अर्चनामें लगी हैं। स्मरण रहे कि इनमें परमानन्दरसामृतमूर्ति भगवान्की माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्ति श्रीवृषभानुनन्दिनी और उनकी अंशभूता ललिता, विशाखा प्रभृति एवं अन्याय नित्य सिद्ध ब्रजकुमारिकाएँ भी सम्मिलित हैं। उनकी साधना रसविशेषके पोषणमें एवं लीलाविशेषके विकासार्थ ही है, परंतु साधन-सिद्धाओंकी साधना तो ठीक श्रीकृष्णप्राप्तियोग्यतासिद्ध्यर्थ है। युवती व्रजांगनाएँ इन कुमारिकाओंसे भिन्न हैं। उनमें भी अनन्यपूर्विका, अन्यपूर्विका आदि भेद हैं। इन कुमारिकाओंमें भी आगे चलकर अन्यपूर्विका-अनन्य- पूर्विकाका भेद तो है, परंतु वस्तुतः श्रीकृष्णसम्बन्धी सभी ब्रजयुवतीजन अनन्यपूर्विका ही थीं। रसविशेषके विकासके लिये उनमें अन्यपूर्विकात्वकी कल्पना थी। महानुभावोंने इनका भेद इस तरह कहा है— पहले नित्य सिद्धा और सिद्धा दो भेद हैं। नित्य सिद्धा श्रीकृष्णके साथ ही अवतीर्ण होती है और बहुत उपासनाओं तथा मनोरथोंद्वारा श्रीकृष्णप्रसादसे सिद्ध होनेवाली सिद्धा कही जाती हैं। नित्य सिद्धाओंमें भी ऊढ़ा (विवाहिता), अनूढ़ा (कन्या) ये दो भेद हैं। ऊढ़ा भी अपने पतिकी सम्बन्धिनी कभी नहीं होतीं, किंतु वे केवल पतिकी ममतामात्रकी भाजन हैं—'न जातु व्रजदेवीनां पतिभिः सह सङ्गमः।' व्रजदेवियोंका कभी अपने पतियोंसे समागम नहीं हुआ। भगवान्की अचिन्त्य शक्ति योगमायासे उनके पतियोंको मायामयी अन्य ही सेवामें उपस्थित मिलती हैं। अतएव रासक्रीड़ावसरमें जबकि व्रजांगनाएँ श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें थीं, तब भी सभी गोपोंने अपनी- अपनी दाराओंको अपने पास ही पाया था। 'मन्यमानाः स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः॥' (श्रीमद्भा० १०।३३।३८) अनूढ़ा कन्या ही थीं। श्रीकृष्णके इच्छानुसार नित्य सिद्धाओंमें भी ऊढ़ा (विवाहिता) हुईं, उसका परम प्रयोजन दुर्लभताकी प्रतीति होना ही था। शास्त्रोंका मत है कि नायिका-नायकमें परस्पर सम्मिलनकी जितनी दुर्लभता हो, उतनी ही अधिक रसाभिव्यक्ति होती है। जहाँ माता-पिता, गुरुजनों एवं शास्त्रोंका अत्यन्त निषेध हो, जहाँ अत्यन्त दुर्लभता हो, वहीं उत्कट प्रीति होती है। जैसे प्रवहणशील जल रोकनेसे अधिक वेगवान् होता है, वैसे ही स्वाभाविक राग एवं प्रेमके आस्पदमें स्वाभाविकी प्रवृत्ति होती है। उधर रुकावट एवं विघ्न-बाधाओंसे मनोवेग अधिक बढ़ता है, दुर्लभतासे उत्कण्ठा भी अधिक बढ़ जाती है। इसीलिये परकीया रति श्रेष्ठ समझी जाती है— 'यत्र निषेधविशेषः या च मिथो दुर्लभता तत्रैवासह्यते चेतः।' फिर भी परकीया रति घोर नरकका मूल है, अतः शास्त्रोंने उसकी घोर निन्दा की है, परंतु सर्वान्तरात्मा सर्वेश्वर सर्वपति भगवान्के सम्बन्धसे समस्त दूषण भी भूषण ही हो जाते हैं। इसीलिये यहींपर परकीया रतिका वास्तविक सदुपयोग होता है। जैसे यहाँ महाकामिनी तन्मय होकर दुर्लभजार उपपतिका चिन्तन करती है, वैसे यदि किसी जीवात्माका मन पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान्का चिन्तन करे तो उसका अहोभाग्य है। जैसे कोई महाकामुक अति दुर्लभ अपनी प्रेयसी कामिनीके सम्मिलनकी लालसामें व्यग्र हो, परमानन्दरसात्मक भगवान् जिन व्रजांगनाओंके चिन्तनमें ऐसे व्यग्र हों, उन व्रजांगनाओंके महा-महा भाग्योंका कौन वर्णन करे? अतएव महानुभावोंने कहा है—'नेष्टा यदङ्गिनि रसे कविभिः परोढ़ा तद्गोकुलाम्बुजदृशां कुलमन्तरेण।' अर्थात् जो कवियोंने शृङ्गाररसमें परोढ़ा (परकीया) कामिनीको अनभिमत माना है, वह तो गोकुल-कुलांगनाओंको छोड़कर माना है अर्थात् यहाँकी नायिका और नायक दोनों ही अलौकिक हैं। ऐसे ही स्वरूपसिद्धा भी कन्या होकर, कात्यायनी भगवतीकी अर्चनाद्वारा