भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४४ भक्तिसुधा श्रीकृष्ण-लीलाके लिये साधक भावको प्राप्त हुई थीं। श्रुतियाँ ही व्रजकुमारियाँ बनीं इनके अतिरिक्त श्रुतियोंकी अधिष्ठात्री महाशक्तियोंने जब परमतत्त्वका अन्वेषण करते-करते महा-महा तपस्याके पश्चात् श्रीकृष्णका दर्शन पाया, तब उन्होंने उनके साथ रमण (तादात्म्येन सम्मिलन)- की इच्छा प्रकट की। श्रीकृष्णने कहा कि 'तुम मेरी आराधनाद्वारा व्रजकुमारिका बनो, तब वहाँ तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा।' इस तरह कृष्णका वर प्राप्त करके वे भी नन्दव्रजकुमारिका हुई हैं। उनमें आगे चलकर साक्षात् परब्रह्मपर्यवसायिनी 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियाँ अनन्यपूर्विका या स्वकीया हुई हैं, एवं कर्मकाण्ड या अन्यान्य देवतातत्त्व पर्यवसायिनी श्रुतियाँ परकीया हुई हैं, जैसे 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति।' (कठ० १।२।१५) 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः॥' (गीता १५।१५) इत्यादि श्रुति- स्मृतिके अनुसार समस्त वेदोंका महातात्पर्य परब्रह्ममें ही है। वैसे ही यहाँ भी श्रुतिरूपा गोपांगनाओंका, अन्य सम्बन्ध केवल काल्पनिक है, मुख्य सम्बन्ध तो उनका भगवान्से ही है। उनमें भी श्रुतिरूपा गोपांगना वाच्य-वाचकके अभेदरूपसे ब्रह्मरूपा ही हैं, ओंकार मूलवाचक है, उसका वाच्य परब्रह्म है। समस्त वाङ्मय ओंकारका विकार है और सारा प्रपंच ब्रह्मका कार्य है। अतः ओंकारका विकारभूत समस्त वाङ्मय ब्रह्मके कार्यभूत सम्पूर्ण प्रपंचका वाचक है। वाच्य और वाचकका अभेद हुआ करता है, इसीलिये समस्त वाङ्मय भी वस्तुतः ब्रह्मरूप ही है। इसके सिवा श्रुतियोंके अवान्तर तात्पर्य अन्य- अन्य होनेपर भी उनका प्रधान तात्पर्य तो ब्रह्ममें ही है। शब्दसे दो बातोंका बोध हुआ करता है—जाति और व्यक्ति। त्वतलादिप्रत्ययवेद्य जाति भावरूप ही होती है। 'तस्य भावस्त्वतलौ' इस पाणिनिसूत्रके अनुसार घटकी भावरूप जाति ही घटत्व है, वह वस्तुतः एक भावविशेषमें स्थित मृत्तिका ही है। इस प्रकार घटका वाचक 'घट' शब्द भी मूलतः उसके कारण मृत्तिकाका ही बोधन करता है। इसी प्रकार जितने शब्द हैं, वे सब अपने अभिधेय विभिन्न पदार्थोंके मूल कारण परब्रह्मके ही वाचक हैं। अतः अवान्तर श्रुतियोंका भी मुख्य तात्पर्य तो परब्रह्ममें ही है। विचार किया जाय तो वस्तुतः वाच्य-वाचकका भेद भी नहीं है। ये दोनों एक ही चेतनके विवर्त हैं। अभिधेयप्रपंचजननानुकूल शक्त्यवच्छिन्न चेतनका विवर्त अभिधेय है और अभिधानात्मकप्रपञ्च जननानुकूल- शक्त्यवच्छिन्न चेतनका विवर्त अभिधान है। जिस प्रकार एक ही परब्रह्ममें अभिधान-अभिधेयरूप अनन्त तरंगें प्रादुर्भूत हो गयी हैं, किंतु 'तदभिन्नाभिन्नस्य तद्भिन्नत्वनानियमात्' इस न्यायके अनुसार तरंगाभिन्न समुद्रके साथ तरंगोंका अभेद होनेके कारण उनका आपसमें भी अभेद है। यह बात तो तरंगसे तरङ्गान्तरके अभेदकी रही, किंतु मूल दृष्टिसे तो अभिधानात्मक तरंग जिस समुद्रमें है, लक्षणावृत्तिसे वह उस समुद्रका ही बोधन करती है, हाँ, अभिधेयात्मक तरङ्गान्तरको वह अभिधावृत्तिसे बोधित करती है; क्योंकि किसीकी भी शक्ति अपने शक्यमें ही सफल हुआ करती है, अपने कारणमें नहीं होती। दाहकत्व, प्रकाशकत्व आदि शक्तियोंवाला अग्नि अपने दाह्य काष्ठादिको ही दग्ध कर सकता है, अपने स्वरूपभूत अग्निका दहन नहीं कर सकता। मूल रूपसे तो तरंगें समुद्रसे भिन्न नहीं हैं, यह दूसरी बात है कि 'अकारो वै सर्वा वाक्' इस श्रुतिके अनुसार सम्पूर्ण वाङ्मय-प्रपंचका अकारमें, अकारका उकारमें और उकारका मकारमें तथा उसके पश्चात् सम्पूर्ण प्रपंचका तुरीयमें लय होता है। तात्पर्य यह है कि अभिधानात्मिका श्रुतियाँ अनन्त चैतन्यान्दसुधासिन्धुकी तरंगोंके समान हैं और वे उसकी अभिधेयरूप अन्य तरंगोंके साथ वृद्धिको प्राप्त होकर प्रकाशित होती हैं; क्योंकि अभिधेय अर्थ उनके शक्य हैं। श्रुतियाँ अपने उद्गमस्थलभूत परमतत्त्वका तो लक्षणासे ही बोध