भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकराती हैं। यद्यपि किसी दृष्टिसे 'घट' का वाच्य घटाकारमें परिणत मृत्तिका भी हो सकती है तथापि लोकमें 'घट' पदका वाच्य घट व्यक्ति ही समझा जाता है। इस प्रकार अभिधानात्मक ब्रह्म तरंगका वाच्य अभिधेयात्मक ब्रह्म तरंग तो है, परंतु लक्षणासे ही है। फिर मीमांसकोंने तो जातिमें ही शक्ति मानी है। जाति घटत्वादिको कहते हैं, जिसे घटभाव भी कहा जा सकता है, घट कार्य है, कार्यका भाव कारणसे व्यतिरिक्त नहीं हुआ करता। समस्त कार्योंका भाव कारणमें ही पर्यवसित होता है, अतः समस्त शब्दोंकी वाच्यताका पर्यवसान-कारण परम्परा-क्रमसे सन्मात्रमें ही होता है। इसलिये सारे शब्दोंका वाच्य परमात्मा ही है। इस प्रकार वाच्य-वाचकका अभेद है और समस्त श्रुतियाँ तत्पदार्थसे अभिन्न ही हैं। श्रुतियोंके दो भेद श्रुतियाँ दो प्रकारकी हैं, अन्यपरा और अनन्यपरा। अनन्यपरा श्रुतियाँ वे हैं, जो साक्षात् रूपसे परब्रह्ममें पर्यवसित होती हैं, जैसे—'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।' (तैत्तिरीय० २।१) तथा अन्यपरा श्रुतियाँ वे हैं, जिनका साक्षात् तात्पर्य तो अन्य देवतादिमें है, किंतु परम्परासे उनका महातात्पर्य परब्रह्ममें ही होता है। जैसे—'इन्द्रोयातोऽवसि तस्य राजा' इत्यादि। इन्हें ही ऊढ़ा और अनूढ़ा अथवा अनन्यपूर्विका भी कह सकते हैं अर्थात् एक वे गोपियाँ, जो केवल कृष्णपरायण हैं और दूसरी वे जो श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य पुरुषोंके साथ विवाही गयी हैं। इनके ये दो भेद भी प्रतीतिमात्रके लिये हैं, वास्तविक नहीं। वरुणादि देवताओंमें श्रुतियोंका तात्पर्य तभीतक जान पड़ता है, जबतक 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठ० १।२।१५) इस वाक्यके अनुसार उनका महातात्पर्य एकमात्र परब्रह्ममें ही नहीं जान पड़ता है। वास्तवमें तो जिस प्रकार तरंग समुद्रसे भिन्न नहीं है और घटादि मृत्तिकासे भिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार उपक्रम, उपसंहारादि षड्विध लिंगसे समस्त श्रुतियोंका तात्पर्य ब्रह्ममें ही है, किंतु फिर भी लीलाविशेषके विकासार्थ वस्तुतः अनन्यपरा श्रुतियोंमें भी अन्यपरातत्त्वकी प्रतीति होती है। यहाँ सन्देह होता है कि श्रीराधिकाप्रभृति व्रजांगनाएँ परमात्मा समझी जाती हैं। इतना ही नहीं, बल्कि श्रीव्रजांगनाओंको ही श्रीकृष्ण-प्रेयसी कहा गया है—'यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाऽऽचरत्तपः।' (श्रीमद्भा० १०।१६।३६) जिन श्रीकृष्णके पाद-पंकज-रजकी कामनासे श्रीललना तपस्या करती हैं— नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः। रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ................॥ (श्रीमद्भा० १०।४७।६०) जो प्रसाद श्रीव्रजसीमन्तिनियोंको प्राप्त हुआ है, वह लक्ष्मीको भी नहीं मिल सकता, फिर देवांगनाओंकी तो बात ही क्या ? श्रीदामोदरकी अधरसुधा गोपिकाओंकी ही है। 'दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्' इत्यादि वचनोंसे यही विदित होता है कि श्रीव्रजांगनाएँ अन्योंसे असंस्पृष्ट भगवान्की ही शुद्ध प्रेयसी थीं, फिर 'यद्धामार्थसुहृत्प्रियात्मतनयप्राणाशयास्त्वत्कृते॥' (श्रीमद्भा० १०।१४।३५) जिनका धाम, अर्थ, सुहृत्, प्राण, अन्तरात्मा सब कुछ श्रीकृष्णहीके लिये था, वे श्रीकृष्णसे भिन्नको पतिरूपसे स्वीकार कैसे कर सकती थीं ? वह रुक्मिणीकी तरह यह दृढ़ प्रतिज्ञा कर सकती थीं कि—'जह्यामसून् व्रतकृशाञ्छत- जन्मभिः स्यात्॥' (श्रीमद्भा० १०।५२।४३) अर्थात् 'हे नाथ ! व्रतसे कृश प्राणोंको मैं छोड़ दूँगी', फिर उनका अन्य सम्बन्ध कैसे सम्भव है? परंतु यहाँ यह समाधान समझना चाहिये कि श्रुतार्थापत्ति प्रमाणद्वारा अर्थात् श्रुत तत्तत् प्रमाण-वचनोंके अर्थका उपपादन करनेके लिये यह मानना चाहिये कि भगवान्की दिव्य लीलाशक्तिसे ही सबको वैसी प्रतीतिमात्र हुई है। श्रीकृष्णसम्मिलनकी आशासे ही ऐसी प्रतीति होनेपर भी व्रजांगनाओंने जीवनकी रक्षा की। उनका अन्य पुरुषोंके साथ सम्बन्ध नहीं हुआ, किंतु उन्हींके समान मायामयी अन्य अंगनाओंसे ही