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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 156

१४६ भक्तिसुधा उन पतियोंका सम्बन्ध होता था। श्रीकृष्णप्रेयसी ब्रजांगना सदा ही असंस्पृष्ट रही थीं। जैसा कि कहा गया है— नासूयन् खलु कृष्णाय मोहितास्तस्य मायया। मन्यमानाः स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः॥ (श्रीमद्भा० १०।३३।३८) यह भी उनकी उत्कण्ठा बढ़ानेके लिये एक लीला थी। जैसे निर्धन प्राणी धन पाकर बड़ा प्रसन्न होता है, उसके नष्ट होनेपर उसकी चिन्तामें इतना तल्लीन होता है कि अन्य समस्त प्रपंचको भूल ही जाता है, वैसे ही इसमें वैचित्र्यसम्पादनार्थ ही व्यूढ़ा और कुमारीभेद थे। दण्डकारण्यनिवासी मुनिगण भी गोपकुमारियोंके रूपमें प्रकट हुए उनके सिवा दण्डकारण्यनिवासी मुनिगण भी गोपकुमारीके रूपमें प्रकट हैं। वे भी भगवान् रामचन्द्रको देखकर मोहित हो गये थे। अहो! खरदूषण-जैसे मांसरुधिराशी क्रूरकर्मा हिंस्र राक्षस भी जिनकी सरसता, मनोहरतापर मुग्ध हो जाते हैं और कहते हैं—‘जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा॥’ (रा०च०मा० ३।१९।५), वीतराग अरण्यवासी मुनिगण उनपर मुग्ध हो जायें तो क्या आश्चर्य? यहाँ तो रामचन्द्र मर्यादापुरुषोत्तम थे, उन्होंने यही वरदान दिया कि लीलापुरुषोत्तमरूपसे आपलोग व्रजकुमारिका होकर मिलें। वे भी व्रजकुमारिका बनकर कात्यायनीकी अर्चनामें लगे। इसी तरह कुछ देवांगनाएँ भी भगवत्कृपासे सिद्धि प्राप्तकर भगवान्‌को प्राप्त हुई थीं। ऐसे ही कोई भौमवैकुण्ठमें रहनेवाली भौमी थीं, कोई अभौम वैकुण्ठकी अभौमी थीं। युग- युगान्तरों, कल्प-कल्पान्तरोंसे, यह सब पूर्णतम पुरुषोत्तम सर्वप्राणियोंके पर-प्रेमास्पद श्रीकृष्णके सम्मिलनके लिये व्यग्र हो घोर तपस्या कर रही थीं, अब उन्हें व्रजवास, व्रजकुमारिका-जन्म प्राप्त हो गया है। उन्हें यद्यपि श्रीकृष्णदर्शन होता है, परंतु अभी इन्हें श्रीकृष्ण अति दुर्लभ प्रतीत होते हैं। दुर्लभ वस्तु प्राप्त करनेके लिये भगवतीका आश्रयण करना ही चाहिये। पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म श्रीकृष्णकी प्राप्तिके लिये तो ब्रह्मविद्यारूपा कात्यायनीका अवलम्बन युक्त ही है— मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषै- र्विद्यासि सा भगवती परमा हि देवि॥ (श्रीदुर्गासप्तशती ४।९) गोपकुमारिकाओंद्वारा उत्तम वरकी प्राप्तिके लिये देवी कात्यायनीका आराधन अस्तु, समस्त दोष-मोक्षार्थी मुनि अम्बाको श्रीविद्यारूपसे सेवते हैं। इसलिये श्रीमन्नन्दव्रजकुमारिका कृष्णप्राप्तिके लिये कात्यायनीके शरण गयीं। लौकिकी दृष्टिसे भी यह अत्यन्त पवित्र भाव है। कुलीन कुमारिकाएँ सुन्दर वरप्राप्तिके लिये श्रीदेवीकी आराधना करती हैं। श्रीकृष्णका लोकोत्तर सौन्दर्य-माधुर्यादि गुणगण भुवनविख्यात था। ऐसे सुन्दर सर्वगुणसम्पन्न सत्कुलोत्पन्न श्रीकृष्णके प्रति कुमारिकाओंको अपने वरणके लिये स्पृहा होना स्वाभाविक है। अतः उस मनोरथपूर्तिके लिये उनका कात्यायनी अर्चन-व्रत ठीक ही था। जैसे दुर्लभ पदार्थकी प्राप्तिके लिये लोकमें देवताका आराधन किया जाता है, वैसे ही दुर्लभ श्रीकृष्णकी प्राप्तिके लिये नन्दव्रजकुमारिकाएँ भी कात्यायनीके आराधनमें लगीं। भिन्न-भिन्न फलोंके लिये श्रीकृष्णकी आराधनामें कृष्ण-प्रेम गौण रहता है, फल-प्रेम मुख्य होता है। श्रीकृष्णके ही लिये श्रीकृष्णकी आराधनामें श्रीकृष्ण ही फल होते हैं और वे ही साधन भी होते हैं, परंतु श्रीकृष्णप्राप्त्यर्थ कात्यायनीकी आराधनामें श्रीकृष्ण फल ही हैं, उनमें साधनताका निवेश नहीं है। केवल शुद्ध फल श्रीकृष्णके लिये श्रीकुमारिकाओंका कात्यायनी-व्रत अद्भुत कृष्णप्रेमका साधन है। वे अरुणोदयके समय ही कालिन्दीके निर्मल जलमें स्नान करके जलके समीपमें ही देवीकी सिकता (बालुका)-मयी मूर्ति बनाकर पूजा करती थीं। यौवन-संचारके पहले ही श्रीकृष्ण-प्रेममें मोहित होकर वे उन्हें पति चाहने लगी थीं। महानुभावोंने

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