भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 157

चीरहरण १४७ कहा है कि व्रजकुमारिकाओंके अंगोंमें अनंगका संचार तो अवस्थाक्रमसे ही हुआ, परंतु सांग श्रीश्यामसुन्दर तो बहुत पहले ही उनके अंग ही क्या, अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रियों एवं रोम-रोममें प्रविष्ट हो गये थे। वे सुगन्धित पुष्पों, बलियों, धूप, दीप एवं प्रवाल, फल, तण्डुल आदि नाना प्रकारके उच्चावच उपहारोंसे श्रीकात्यायनीका पूजन करती थीं। कभी-कभी प्रेममें पूजाका क्रम विस्मृत हो जाता था। श्रीकात्यायनीकी प्रार्थना करती हुई कहती थीं— ‘हे कात्यायनी! आप कात्यायनमुनिवंशप्रकाशक होनेसे परम धर्मदात्री हो। हे महायोगिनी! आप अघटितघटना- पटीयसी हो, अतः हमारे लिये दुर्घट श्रीकृष्ण वर- सम्मिलन भी आपकी कृपासे संगत होगा। हे अम्ब! आप ही अधीश्वरी सर्वोत्कृष्ट स्वामिनी हो। आपको छोड़कर हम सब किसकी शरण जायँ। हे देवि! श्रीमन्नन्दगोप राजकुमारको ही हमारा पति बनाओ। उनकी आराधनासे भी यह सिद्ध हो सकता है, किंतु उनके लिये उन्हींसे प्रार्थना करना रसानुकूल नहीं है। आपकी प्रसन्नताके लिये हम आपको नमस्कार करती हैं।’— कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः। (श्रीमद्भा० १०।२२।४) परम प्रेमोल्लासवश श्रीव्रजकुमारिकाएँ श्रीदेवीकी पूजामें प्रवृत्त हुई हैं, इसमें अनन्यताका व्याघात नहीं होता। भगवत्-प्रेम गन्धके सम्बन्धी गन्धवाह वायुको भी प्रेमी स्पर्श करते हैं। शुद्ध प्रेम ही परम पुरुषार्थ है, अन्यान्य देवतोपासना आदि तो साधनमात्र है। परम साध्यस्वरूप प्रेमके प्रसंगमें वह गौण हो जाता है। प्रेममें माधुर्यभावकी ही प्रधानता रहती है। वहाँ ऐश्वर्यकी स्फूर्ति नहीं होती। अनन्य भक्ति बिना ऐश्वर्यस्फूर्ति नहीं होती। माधुर्यानुभवकालमें ऐश्वर्यका अनुभव होनेपर आश्चर्य होता है। अहो! प्रेमसे ही व्रजांगनाओंने भगवान्‌को वशमें कर लिया, जिसे कि ब्रह्मा आदि न पा सके, परंतु अपनी स्वाभाविकी दृष्टिसे व्रजांगना केवल शुद्ध-माधुर्यका ही आदर करती थीं। यह कात्यायनी-अर्चन-व्रत शुद्ध मधुर प्रेमका ही विलास है। अतएव वे उनसे 'भगवान् पति दो' ऐसा न कहकर नन्दगोपराजकुमार पति माँगती हैं। ऋषिरूपा होनेके कारण उन्हें इस मन्त्रका प्रत्यक्ष हुआ। यहाँ कात्यायनी आधिदैविकी संहारिणी शक्ति हैं। अतः भगवान्‌की अप्राप्तिके हेतुभूत प्रतिबन्धको वे ही दूर कर सकती हैं। भगवत्प्राप्ति-प्रतिबन्धक दुरदृष्ट मिटानेका साधन तप भी है, परंतु वह तो ऋषिरूपा कुमारिकाओंमें पहलेसे ही सिद्ध है। अतः आधिदैविक प्रतिबन्धक मिटानेके लिये आधिदैविकी महाशक्ति कात्यायनी ही समर्थ हैं। कहा जा सकता है कि यदि आधिदैविक प्रतिबन्धक है, तब तो वह भगवान्‌की इच्छासे ही होगा, फिर इसकी निवृत्ति कैसे होगी? परंतु वह महाशक्ति महाभागा है। अल्पभागा होनेसे उन्हें भगवान्‌की आज्ञा न होती, श्रीयशोदाके यहाँ जन्म न होता। अतः महाभागा भगवती कात्यायनीकी प्रार्थनासे प्रभु अपनी इच्छाको भी भगवतीके इच्छानुगुण कर देंगे। हे देवि! आप प्रभुकी ज्येष्ठा भगिनी हैं। सब तरहसे आप हमारे मनोरथको पूरा कर सकती हैं। यदि आप यह कहें कि यह प्रतिबन्ध हमसे नहीं दूर हो सकता तो ठीक नहीं; क्योंकि आप महायोगिनी हैं। यदि आप देवकीके उदरसे बलरामको रोहिणीके उदरमें पहुँचा सकती हैं तो मेरे भगवत्प्राप्ति-प्रतिबन्धक आधिदैविक दुरदृष्टको क्यों नहीं मिटा सकतीं? यदि कहें कि यह आधिदैविकी प्रतिबन्धक शक्ति अत्यन्त बलवती है तो भी देवि! आप अधीश्वरी हैं। भगवान्‌की आप अन्तरंग शक्ति हैं। सर्वप्रकारसे आप व्रजराजकुमारको हमारा पति बना सकती हैं। यदि यह कहो कि भगवान् किसीके पति नहीं हो सकते तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि जब श्रीव्रजराजके कुमार हो गये तो हमारे पति बननेमें क्या आपत्ति है? फिर आप देवी हो, किसी अलौकिक रीतिसे भी आप यह कार्य कर सकती हो। हम इसके