भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ भक्तिसुधा बदलेमें आपका केवल नमन कर सकती हैं। इस तरह नन्दव्रजकुमारिका श्रीकृष्णमें आसक्त- मन होकर भद्रकाली भगवतीकी अर्चना किया करती थीं। उषाकालमें ही उठकर अपने-अपने वर्गोंसे आहूत होकर अन्योऽन्याबद्धबाहु होकर उच्च स्वरसे श्रीकृष्णका ही गायन करती हुई प्रतिदिन कालिन्दी नहाने जाती थीं। थोड़े ही कालके आराधनसे उनका मन श्रीकृष्णमें आकर्षित हो गया। व्रतका फल यह भी है, परंतु अभी महाफल अवशिष्ट ही है। अस्तु, पूर्णमासीके दिन नित्य प्रतिके समान ही तीरपर आकर पूर्ववत् वस्त्रोंको खोलकर श्रीकृष्णके मंगलमय यशका गायन करती हुई प्रसन्नतासे जल-विहार करने लगीं। व्रतकी पूर्तिका दिन था, प्रसन्नतासे देहानुसन्धानशून्य होकर मानस, वाचिक, कायिक तन्मयतासे श्रीकृष्ण- यश गाती हुई विहार करने लगीं। कुछ भावुकोंका कहना है कि रास-क्रीड़ाके समान अन्योऽन्य- बाहुबद्ध होकर गोपांगनागण परिवेष्टित श्रीकृष्णका यश गाती हुई कालिन्दीमें विहार करने लगीं। कालिन्दीके अवगाहनसे सब प्रकारके दोष दूर होते हैं। ‘कलिं द्यति खण्डयति इति कलिन्दः, तस्यापत्यं कन्या कालिन्दी’। इस व्युत्पत्तिके अनुसार कलिन्दपर्वत ही कलिदोषको दूर करनेवाला है। उसकी कन्यामें भी वे ही सब गुण हैं। अतः कालिन्दी-श्रीयमुनाजीका सेवन करनेसे उन गोप-कुमारिकाओंका परस्पर कलह, भगवान्के साथ कलह और कलिकालके दोष दूर होंगे। पुनः अत्यन्त शुद्ध होनेपर श्रीकृष्णप्राप्तिकी योग्यता सम्पन्न होगी। यमुनास्नानका माहात्म्य भावुकोंका कहना है कि श्रीयमुनामें स्नान करते ही प्राणीको श्रीकृष्ण-सम्मिलनकी योग्यता हो जाती है। प्राकृत स्त्रीत्व-पुंस्त्वभाव वर्जित होकर शुद्ध गोपांगना-भावकी प्राप्ति ही रसोपासनाका मूल है। वेदान्तियोंके समान ही रसिकोंके यहाँ भी पहले ‘त्वं’ पदार्थका शोधन अपेक्षित होता है। स्वरूपनिष्ठाके अनन्तर ही निखिल रसामृतमूर्ति श्रीकृष्णकी रसोपासनाका अधिकार प्राप्त होता है। यह सब भाव बहुकालके परिश्रमसे सिद्ध होता है, परंतु श्रीकालिन्दीके सेवनसे सहजहीमें यह भाव मिल जाता है। योगेश्वरेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण व्रजांगनाओंके व्रतका अभिप्राय जानकर, उस कर्मकी सिद्धिके लिये ही अपने दाम, सुदाम, वसुदाम, किंकिणी, गन्ध-पुष्पकादि परम अन्तरंग सखाओंसे परिवृत होकर वहाँ गये। ये सखा श्रीकृष्णके साक्षात् अन्तःकरण ही हैं। भगवान्स्तदभिप्रेत्य कृष्णो योगेश्वरेश्वरः। वयस्यैरावृतस्तत्र गतस्तत्कर्मसिद्धये॥ (श्रीमद्भा० १०।२२।८) यह लीला अलौकिक एवं अप्राकृत है, यही बात प्रदर्शित करनेके लिये इस श्लोकमें श्रीकृष्णके लिये भगवान् और योगेश्वरेश्वर इत्यादि विशेषण आये हैं अर्थात् भगवान् व्रजकुमारिकाओंकी शुद्धभावनासे की गयी आराधनासे सन्तुष्ट होकर उनकी कर्मसिद्धिके लिये पधारे हैं, गोपियोंके नग्न अंग देखनेके लिये नहीं। योगसिद्ध प्राणी भी प्रत्याहारद्वारा इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर लेता है, फिर योगेश्वर तो सर्वज्ञता, सत्य-संकल्पता आदिके स्वामी होते हैं, उनके मनमें ऐसी वासनाओंका जाग्रत् होना नितान्त असम्भव है। फिर महा-महायोगेश्वर, जिनके पादपंकजका सेवन करते हैं, वे योगेश्वरेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण अजातयौवन उन कुमारिकाओंका नग्न अंग देखनेकी ही रुचिसे वहाँ गये, ऐसी दुर्भावना जिनके मनमें उठे, उनसे अधिक हतभाग्य कौन हो सकता है? नन्ददासजीने श्रीकृष्ण और व्रजांगनाओंके सम्बन्धको इसी रूपमें दिखलाया है। ‘तरंगन वारि ज्यों’। जैसे तरंगके प्रत्यंशमें वारि भरपूर है, वैसे ही व्रजांगनाओंके अन्तरात्मा-अन्तःकरण किं बहुना रोम-रोममें श्रीकृष्णरस भरपूर है। परमानन्दरसामृतसिन्धुकी तरंगस्थानीया व्रजांगनाओंकी अपेक्षा भी परमानन्द रसामृतसारसर्वस्व श्रीकृष्णकी माधुर्याधिष्ठात्री महालक्ष्मी अधिक अन्तरंग हैं। जैसे अमृत स्वयं अभेद- सम्बन्धसे अपनी मधुरिमाका अनुभव करे, उसी तरह