भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचीरहरण १४९ निखिल रसामृतमूर्ति श्रीकृष्ण अपनी माधुर्याधिष्ठात्री महालक्ष्मी श्रीवृषभानुनन्दिनीका अनुभव करते हैं। नायिका-नायकके रूपकसे जीवात्मा-परमात्माके सम्मिलनका वर्णन किया जाता है। अत्यन्त अभिन्न सदा सम्मिलितस्वरूपमें भी वियोग एवं तज्जन्य व्याकुलता आदिकी प्रतीति होती है। सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥ (रा०च०मा० ७।१११।६) कर्मयोग और भक्तियोगकी विलक्षणता कुछ महानुभावोंका कहना है कि नन्द- व्रजकुमारिकाओंके कात्यायनी-अर्चन-व्रतमें चार दोष आ गये। भले ही वे भक्तिमार्गके गुण हों, परंतु कर्ममार्गमें तो दोष ही हैं। कालिन्दी-स्नानमें मौन और सवस्त्र होना आवश्यक था, परंतु ये वस्त्रनिक्षेपपूर्वक कृष्णयशगान करती हुई स्नानमें प्रवृत्त हुईं। अतः मौनका त्याग और वस्त्रका त्याग—ये दो दोष हुए और व्रत-नियममें रहकर क्रीड़ा और देहविस्मरण भी दोष ही हैं। कर्ममें किसी प्रकारकी व्यंगता न आये, सम्यक् रूपसे उसका अनुष्ठान हो, इसलिये ही कर्म फलनिरपेक्ष एवं असक्त होकर कर्मोंके अनुष्ठानका आदेश किया जाता है। क्योंकि ऐसा होनेसे कर्तव्यबुद्ध्या तत्परतासे कर्मोंका ही अनुष्ठान किया जाता है, फलापेक्षया उसमें गौणता बुद्धि या असावधानी नहीं आने पाती। कर्मफलकी चिन्ता और आसक्तिसे साधकको कर्मानुष्ठानमें उचित सावधानी नहीं रह जाती। ऐसी स्थितिमें कर्मकी व्यंगता अवश्य हो जाती है। लीलावती, कलावतीको सत्यनारायण-व्रत-कथामें प्रीति एवं विश्वास था, परंतु जब उन्होंने पति और जामाताका आगमन सुना, तब लीलावती पति- सम्मिलनकी उत्सुकतावश पुत्रीको पूजामें लगाकर, स्वयं पूजा छोड़कर पतिसे मिलने चली गयी। पुत्री भी उसी उत्सुकताके कारण पूजा समाप्तकर, बिना प्रसाद-ग्रहण किये ही चली गयी। बस, व्रतमें व्यंगता आ गयी, अन्ततोगत्वा फिर विघ्न भी खड़ा हो गया। इधर व्रजकुमारिकाओंको भी व्रत-फल, श्रीकृष्ण- प्राप्तिकी उत्सुकतासे व्रतके नियमोंका स्मरण नहीं रहा। जन्मजन्मान्तरों, कल्पकल्पान्तरोंकी श्रीकृष्ण- सम्मिलन-वाञ्छाका प्रवाह कैसे रोका जाय? श्रीकृष्ण- प्रेमोन्मादमें उन्हें कर्म और उसके नियम भूल गये। वे विभोर होकर वस्त्र और मौन—दोनोंको त्यागकर श्रीकृष्णका यशगान करने लगी थीं। प्रेमोन्मादमें ही जल-क्रीड़ा करती-करती देह, दैहिक समस्त प्रपंचको भूल गयी थीं। ये सब कर्ममार्गमें अवश्य दोष हैं, परंतु प्रेममार्गमें तो ये ही सब गुण हैं, प्रेमी तो उसी पूजाको सफल और सांग मानते हैं, जिसमें आराध्य- देवकी स्मृति एवं तन्मयतामें पूजा और उसकी सामग्री विस्मृत हो जाय। हाँ तो भक्ति-सिद्धान्तके गुणोंसे प्रसन्न होकर भगवान् कर्ममार्गके दोषोंसे उत्पन्न हुई व्यंगताको दूर करनेके लिये प्रकट हुए। याज्ञिक लोग उनकी स्मृति और नामोक्तिसे ही कर्मच्छिद्र दूर किया करते हैं— यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु। न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥ श्रीकृष्ण उनके हितकारी परमानन्दरस स्वरूप हैं और योगेश्वरेश्वर हैं। अतः अन्तःस्थित सब प्रकारके दोषोंके निकालनेमें समर्थ हैं। योगेश्वर लोग योगबलसे अन्तःप्रविष्ट होकर दोषको दूर करते हैं, फिर योगेश्वरेश्वरकी तो बात ही क्या है? कुछ महानुभावोंने 'योगेश्वरेश्वर' इस शब्दमेंसे यह अभिप्राय निकाला है कि भगवान् योगेश्वरोंके भी ईश्वर हैं, अतएव उन अपरिगणित व्रजकुमारिकाओंमें प्रत्येकका मनोरथ पूर्ण कर सके और व्रजकुमारिकाओंके नेत्रोंके सामने रखे हुए सभी वस्त्रोंके चुरानेमें समर्थ हुए। प्राणत्यागसे भी अधिक दुष्कर जिनका लज्जात्याग था, उन कुल-कुमारियोंको जलसे निकालकर निरावरण- रूपसे नमन करानेका सामर्थ्य भी उन्हींमें था, फिर निर्जन प्रदेशमें उनके निरावरण सर्वांगका दर्शन करनेपर भी, अत्यन्त स्वाधीन परम सुन्दरियोंका सम्भोग आदि न करना भी योगेश्वरेश्वर श्रीभगवान्का ही कार्य है।