भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० भक्तिसुधा ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसश्श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥ (श्रीविष्णुपुराण ६।५।७४) समग्र ऐश्वर्य, सम्पूर्ण धर्म, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण श्री एवं सम्पूर्ण ज्ञान, वैराग्य जिनमें विद्यमान हों, उन्हें भगवान् कहा जाता है। भिन्न-भिन्न साधकोंमें भगवान्की कृपासे भगवान्का ही कुछ (असमग्र या असम्पूर्ण) ऐश्वर्य एवं धर्म प्राप्त होता है। यही स्थिति ज्ञान-वैराग्यकी भी है। साधारण धर्मात्मा पुरुष भी नग्न कुमारीको या परस्त्रीको देखनेके लिये उत्सुक नहीं होते। सम्पूर्ण रूपसे धर्म जिसमें विराजमान है, उनकी ऐसी उत्सुकता क्यों होगी? कोई भी वैराग्यवान् एवं ज्ञानवान् मायामय विषयोंके प्रलोभनमें नहीं फँसता, फिर सम्पूर्ण वैराग्य, ज्ञानसम्पन्न भगवान् व्रजकुमारिकाओंके सुन्दर निरावरण अंगमात्र देखनेके लिये ऐसा कैसे कर सकते थे? भगवान्का व्रजकुमारिकाओंके साथ परिहास अतएव भावुकोंका कहना है कि यह उन व्रजकुमारिकाओंकी विशेषता है। भगवान्ने अपने अद्भुत माधुर्यादि लोकोत्तर चमत्कारसे समग्र ज्ञान- वैराग्यवान् सनकादि, शुकादि मुनीन्द्रोंके मनको खींच लिया है। अतएव अत्यन्त निःस्पृह, निष्काम होनेपर भी भगवान्में उन सबका आकर्षण हुआ, परंतु ये व्रजांगनाएँ भगवान्से भी अधिक गुणवती हैं, अतः अपने लोकोत्तर प्रेमसे समस्त ज्ञान-वैराग्यवान्के मनको भी खींच लिया। इसीलिये कहा है कि समस्त जीव तो भगवान्के साथ रमण करनेके लिये सदा लालायित रहते ही हैं; किंतु अहोभाग्य उन लोगोंका है, जिनके साथ रमण करनेके लिये भगवान् उत्सुक हैं। यह केवल विशुद्ध प्रेमकी ही महिमा है कि उनके कर्म सिद्ध करनेके लिये वयस्योंसे समावृत भगवान् पधारे। बड़ी शीघ्रतासे उनके वस्त्रोंको लेकर कदम्बपर चढ़ गये और हँसते हुए बालकोंके साथ उनसे इस तरह परिहास करने लगे—क्यों शीतल जलमें कम्पित हो रही हो? निकलकर शुष्क वस्त्र धारण करो अथवा हे व्रज-बालिकाओ! इस कदम्बकी शाखामें इतने वस्त्रोंको किसने लाकर बाँधा है? क्या आप सब जानती हैं? मैं तो गौ चराते हुए दूरसे यह देखकर कि मेरे कदम्बमें आज विचित्र वस्त्रोंके ही फल-फूल लगे हैं, अभी इसपर चढ़ा हूँ। यदि आपलोग यह कहें कि ये हमारे वस्त्र हैं तो यह तो सम्भव नहीं। तुम्हारे वस्त्र इतने ऊँचे कैसे चढ़ सकते थे? यदि कहो कि तुम्हींने चुराकर इतने ऊँचे रख दिया है तो ठीक है। क्या यह भी कहनेका साहस करोगी? क्या नन्दरायका पुत्र मैं चोर हूँ? क्या तुमलोग मथुरास्थ कंसके पास जाना चाहती हो? यदि कहो कि वस्त्र ही देखो-पहचानो, यह पुरुषके वस्त्र हैं या स्त्रीके हैं? परंतु क्या इस संसारमें तुम्हीं स्त्री हो और कोई स्त्री नहीं है? यदि कहो कि यह ठीक है, परंतु इस निर्जन वनमें हम व्रजबालाओंको छोड़कर और कौन स्त्री आ सकती है? अये! रहःसंचारिणी व्रजबालाओ! क्या आप ही लोग रहस्य क्रीड़ा करती हैं? यदि कहो कि हमलोग यहाँ खेलने नहीं आतीं, अपितु कदम्बदेवता श्रीदुर्गाकी पूजा करने आती हैं तो भी क्या तुम्हीं दुर्गाकी पूजा करती हो? अये मुग्धाओ! यहाँ तो प्रत्येक अर्धरात्रमें वैमानिकी देवियाँ आकर दुर्गाकी पूजा करती हैं। यदि कहो कि ठीक है, परंतु वे वस्त्र छोड़कर क्यों जातीं? परंतु बालाओ, तुम इस तत्त्वको नहीं जानतीं। आज पुनः पूजाके लिये वे वस्त्र छोड़ गयी हैं। व्रजबालाएँ कहती हैं—हे कृष्ण! आप ही इस रहस्यको नहीं जानते, ये वस्त्र हमारे ही हैं।' श्रीकृष्णने कहा—व्रजबालाओ! यदि सचमुच ये तुम्हारे ही वस्त्र हों तो आओ, अपना-अपना वस्त्र पहचानकर विश्वासके लिये शपथ करके ले लो। चाहे सब लोग साथ ही आओ, चाहे दो-तीन मिलकर अथवा एक-एक ही आओ। मिलकर आनेमें भीड़में कोई लोभवती अधिक वस्त्र भी ले सकती है। यदि न आओगी तो वस्त्र नहीं मिलेंगे। यदि समझती हो कि मैं कपटी हूँ, मुझपर विश्वास नहीं है तो मैं