भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचीरहरण १५१ शपथपूर्वक सत्य कहता हूँ, आपलोग व्रतोंसे कर्षित (दुर्बल) हैं। मैं परिहास नहीं करता हूँ, आप तपस्विनियोंपर दया, भक्ति एवं धर्मका भी भय है, यदि मुझे मिथ्यावादी समझकर अविश्वास करती हो तो भी ठीक नहीं, क्योंकि मैंने कभी भी इस जन्ममें इतनी अवस्थातक झूठ जाना ही नहीं। इस बातको यह सब बालक जानते हैं। यदि कहो कि दूरसे ही इस जलमें वस्त्रोंको फेंक दो या बालकोंद्वारा भेज दो, सो भी ठीक नहीं, क्योंकि ये वस्त्र तुम्हारे हैं या अन्यके, यह नहीं जाने जाते। धार्मिक लोग दूसरोंकी वस्तुओंको नखाग्रसे भी नहीं छूते। अतः तुम्हीं लोग आकर अपने-अपने वस्त्रोंको पहचानकर ले लो। हम दूसरोंकी वस्तुको न लेते हैं, न देते हैं, न छूते हैं। यदि यह समझती हो कि हम लोग कुलकुमारी हैं, तुम्हारे पास आनेमें डरती हैं तो पहले तुममेंसे कोई एक साधारण बाला आये, फिर देख लेना यदि उसके साथ कोई विडम्बना हो तो न आना। अथवा तुम सब मिलकर आओगी तब तो कोई डर ही नहीं है। अये सुमध्यमाओ! तुम्हें आनेमें क्यों संकोच होता है? व्रजांगनाओ! आपलोग जो कहती हैं कि हम राजासे जाकर कहेंगी तो यह सब निरर्थक है; क्योंकि अभी तो आपलोग नग्न हैं, ऐसी अवस्थामें न कंसके पास जा सकती हो, न श्रीनन्दरायके पास ही जा सकती हो। दूसरा कोई तुम्हारे पास है भी नहीं, तब आपलोग राजाके पास कैसे जा सकेंगी? यदि आपलोग अपनेको मेरी दासी कहती हैं और हमारी आज्ञा मानती हैं तो यहाँ आकर अपना वस्त्र लो। प्रेममयी कुमारिकाओंद्वारा अपने वस्त्रोंकी याचना भगवान्के ऐसे परिहास-वचनोंको सुनकर कृष्णाकृष्टचेता होकर शीतल जलमें आकण्ठमग्ना होकर प्रेमर्तिपुरःसर 'हे अंग' ऐसा सम्बोधन करती हुई बोलीं— मानयं भोः कृथास्त्वं नो नन्दगोपसुतं प्रियम्। जानीमोऽङ्ग व्रजश्लाघ्यं देहि वासांसि वेपिताः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२२।१४) ऐसा अन्याय मत करो, हम तो आपको व्रजशिरोमणि, प्रियतम, श्रीनन्दरायका पुत्र समझती हैं, हम काँप रही हैं, वस्त्र दे दो। ऐसा कहकर सब प्रेमसागरमें निमग्न हो गयीं। प्रियतमके प्रेमालापमें मनोलोप हो गया, बाह्य दृष्टिसे परस्पर एक-दूसरीको देखती हुई कहती हैं—'अयि कमलेक्षणे ! श्यामसुन्दर तुम्हें बुलाते हैं।' दूसरी कहती हैं—'अयि सुधामुखी ! तुम्हीं जाओ, इन्हें सुधा पान करा दो।' इस तरह परस्पर परिहास करती रहीं, निकलीं नहीं। श्रीकृष्णके रसमय रहस्य वचनोंको सुनकर कुमारिकाएँ रसाविष्ट हो गयीं। उसी स्थितिमें उन्हें आन्तर दृष्टिसे ही श्रीकृष्ण-सम्बन्ध प्राप्त हुआ। बाह्य ज्ञान होनेपर, लज्जित होकर, प्रत्यक्षके समान श्रीकृष्ण-सम्बन्ध मानकर, संवादार्थ अन्योऽन्यका वीक्षण करने लगीं। अन्योऽन्यका ज्ञान न होनेसे कौतुकमय रसका आस्वादन करती हुई हँसने लगीं, और कहने लगीं—'अये सखि ! जब प्रियतम श्रीकृष्णके बिना रह सकना असम्भव ही है, तब फिर मनमोहनकी ही रुचिका पालन करो। लज्जाको जलांजलि दो', बस हाथोंसे अंगोंका आच्छादन करके निकलीं। प्रीतिकी यही विशेषता है कि प्रियतमके सम्बन्धसे तीव्रातितीव्र दुःख भी परमानन्दमय होकर प्रतीत हो। वेश्याको नहीं, किंतु एक साध्वी सती पतिव्रताके लिये सर्वाधिक कष्ट लज्जात्यागमें ही होता है। प्राणोंका परित्याग उनके लिये सरल है, परंतु लज्जात्याग अतिदुष्कर है, किंतु श्रीकृष्णप्रेममें श्रीकृष्ण-सम्बन्धसे उसको भी वे सहन कर सकीं। महानुभावोंने इस सम्बन्धमें भी उनका महत्त्व गाया है। दुस्त्यज्य त्यागके कारण व्रजांगनाओंकी दिव्य महिमा आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्। या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥ (श्रीमद्भा० १०।४७।६१)