भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ भक्तिसुधा श्रीउद्धवजीका कहना है—'अहो! इन श्रीव्रजांगनाओंके पाद-पंकज-रज-सेवन करनेवाले वृन्दावनके गुल्म, लता, औषधियोंमें कुछ मैं भी हो जाऊँ; क्योंकि इन्होंने दुस्त्यज स्वजन एवं आर्यपथको छोड़कर श्रुतिविमृग्य मुकुन्दपदवीका सेवन किया।' यहाँ साफ विदित होता है कि स्वैरिणी वेश्याओंके समान इनके लिये लज्जा या आर्यधर्मका त्याग सुगम नहीं था; किंतु जैसे दुर्व्यसनीको दुर्व्यसन दुस्त्यज होता है, माता, पिता, गुरुजनों एवं शास्त्रोंके उपदेश और अपने चाहनेपर भी नहीं छूटता, वैसे ही सुदृढ़ व्रजांगनाओंकी आर्य-धर्मनिष्ठा थी। स्वैरिणियोंको आर्यधर्मसे सम्बन्ध ही नहीं होता, तब वह उन्हें दुस्त्यज क्यों होगा? परंतु यहाँ तो आर्यधर्म अत्यन्त दुस्त्यज था। तभी उसको त्यागकर श्रीकृष्णके भजनेका लोकोत्तर माहात्म्य है। आर्यपथको सुरक्षित रखकर श्रीकृष्णको भजनेवालोंसे भी इनका माहात्म्य अधिक है। अतएव यद्यपि स्वकर्मसे भगवान्का आराधन करना प्रथम कोटि है— 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥' (गीता १८।४६) तथापि उससे भी ऊँची एक कोटि और है, जहाँ सर्वकर्म-संन्यास करके एकमात्र भगवत्परायण हुआ जाता है— 'नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति॥' (गीता १८।४९) आज्ञायैवं गुणान् दोषान् मयादिष्टानपि स्वकान्। धर्मान् सन्त्यज्य यः सर्वान् मां भजेत स सत्तमः॥ (श्रीमद्भा० ११।११।३२) यहाँ ध्यान देनेकी बात है कि दुस्त्यज त्यागके कारण ही श्रीव्रजांगनाओंकी दिव्य महिमा है। विशेषता यह है कि किसीको दुराचार, दुर्विचार एवं तद्भावनाजन्य दुर्व्यसन दुस्त्यज होता है, परंतु यहाँ तो आर्यपथ ही दुस्त्यज है। आर्यपथपर चलकर उच्छृंखल पथका त्याग किया जाता है, यह धर्मनिष्ठाकी अद्भुत महिमा है कि आर्यपथ दुस्त्यज हो जाय। वेश्याओंके लिये क्या आर्यमार्ग दुस्त्यज है? जिसने जिसका संस्पर्शतक न किया, वह उसके लिये दुस्त्यज कैसे हो सकता है? इसीलिये वेदोंने पहले पहल श्रौतस्मार्त-कर्मानुष्ठान- रूप आर्यमार्गके आश्रयद्वारा उच्छृंखल पथरूप स्वाभाविक कामकर्मज्ञानके त्यागका आदेश किया है। जैसे किसी दुराचारीको दुराचारका दुर्व्यसन हो जाता है, फिर माता-पिता, गुरुजनों एवं शास्त्रोंके शतशः निषेधसे भी उन दुर्व्यसनोंसे निवृत्ति कठिन हो जाती है। जो प्राणी माता-पिता, गुरुजनोंके आदेशानुसार वेदादि सच्छास्त्रोक्त धर्मोंका सेवन करने लगता है, फिर शनैः-शनैः उसके उच्छृंखलता-सम्बन्धी समस्त संस्कार छूट जाते हैं और सद्धर्मके संस्कार सुस्थिर हो जाते हैं। यहाँतक कि फिर उसे सद्धर्मका ही सद्व्यसन हो जाता है और उसका भी छूटना कठिन हो जाता है। पहले-पहल जब पाशविक कर्मोंकी प्रधानता रहती है, तबतक सत्कर्मोंमें प्रवृत्ति दुष्कर होती है। अतएव कर्मोंका प्रशंसन करके उनका विधान किया जाता है, परंतु सत्कर्मानुष्ठानद्वारा दुष्कर्मोंका त्यागकर जब सत्कर्मनिष्ठाके संस्कार दृढ़ हो जाते हैं, तब नैष्कर्म्यप्राप्तिके लिये या निदिध्यासनादि तत्परता-सम्पादनके लिये उनका त्याग करना अभीष्ट है। एतदर्थ उनका त्याग अभीष्ट होता है। त्यागके लिये ही कहीं-कहीं कर्मोंकी निन्दा भी की गयी होती है—'प्लवा ह्येतेऽदृढा यज्ञरूपाः'। यह एक सर्वसम्मत नियम है कि किसी पदार्थकी स्तुति उसके ग्रहणके लिये और निन्दा उसके त्यागके लिये की जाती है। उच्छृंखलता और पाशविकता स्वाभाविकी है। श्रौतस्मार्तशृङ्खलानिबद्ध चेष्टा दुर्लभ है। रागप्राप्त द्रव्य-क्रियादिकी निन्दाद्वारा निषेध करके स्वतः अप्राप्त धर्मका प्रशंसा-पुरस्सर विधान किया जाता है। श्रीव्रजांगनाएँ पूर्ण स्वधर्मनिष्ठाद्वारा पाशविकी भावनाओंसे अत्यन्त असंस्पृष्ट रहीं। स्वधर्मनिष्ठा उनकी इतनी दृढ़ थी कि जैसे दुर्व्यसनीको दुर्व्यसन दुस्त्यज होता है, वैसे ही उनकी धर्मनिष्ठा आर्यधर्म दुस्त्यज था। जिस समय श्रीकृष्णने अपने अमृतमय