भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचीरहरण १५३ मुखचन्द्रपर वेणुको धारण करके उसे सुमधुर अधरसुधासे पूरितकर बजाया; उस समय व्रजांगनाएँ अपने जातिधर्म, वर्णधर्म, आश्रमधर्म एवं कुलधर्ममें लगी थीं। कोई गोदोहन कर रही थीं, कोई पति-शुश्रूषामें लगी थीं तो कोई शिशुओंको पयःपान करा रही थीं। व्रजांगनाओंने अपनी रुचिसे कर्मोंका त्याग नहीं किया, किंतु श्रीकृष्णमुखचन्द्र-निर्गत वेणुगीतपीयूषके सम्पर्कसे श्रीव्रजांगनाओंके हृदयस्थ प्रेममहार्णवके उद्वेलित हो जानेपर वे अपनेको सम्भाल न सकीं। जैसे गंगाके तीव्र प्रवाहमें पड़कर शतधा बचनेका प्रयत्न करनेपर भी प्राणीको बहना ही पड़ता है, वैसे ही वेणुगीत- समुद्बुद्ध प्रेमप्रवाहमें व्रजांगनाएँ बह चलीं। शतधा बचनेका प्रयत्न करनेपर भी वे श्रीमद्वृन्दारण्यधामवर्ती व्रजचन्द्र श्रीकृष्णके पास पहुँच गयीं। जैसे ग्रहगृहीत प्राणी अपने वशमें नहीं होता, वैसे ही श्रीकृष्ण- ग्रहगृहीतात्मा होकर वे अस्वतन्त्र हो गयीं— निशम्य गीतं तदनङ्गवर्धनं व्रजस्त्रियः कृष्णगृहीतमानसाः। (श्रीमद्भा० १०।२९।४) इससे विदित होता है कि व्रजांगनाओंकी आर्यधर्मनिष्ठा कितनी अविचल थी। पाशविकी चेष्टा उनको वशमें तो क्या, स्पर्शतक नहीं कर सकती थी, किंतु लोकोत्तर श्रीकृष्णप्रेमने ही उन्हें स्वजन और आर्यधर्मत्यागद्वारा संन्यासके लिये बाध्य किया। जैसे कोई कर्मनिष्ठ कर्मोंके महाफलभूत भगवत्-साक्षात्कारके लिये ही सर्वकर्मोंका संन्यास करता है, वैसे ही सर्व धर्मोंके महाफल श्रीकृष्णप्रेमके लिये ही व्रजांगनाओंने सर्वधर्मोंका संन्यास किया। कोई त्याग पतनका मूल और कोई परम कल्याणका मूल होता है। किसी व्यभिचारी (जीव)- के लिये स्त्रीका आर्यधर्म त्याग करना महापाप है, परंतु परमात्मा श्रीकृष्णके लिये आर्यधर्मका भी संन्यास युक्त ही है। साध्यप्राप्ति होनेपर साधनका संन्यास स्वाभाविक ही है। काम, क्रोध और लोभ आदिसे अपने कर्मोंका संन्यास पाप है, परंतु सर्वचेष्टा- विवर्जित निर्विकल्पसमाधिद्वारा ब्रह्मसाक्षात्कारके लिये सर्वकर्मोंका संन्यास युक्त ही है। विवेकियोंने कर्मोंको ही कर्मसंन्यासद्वारा नैष्कर्म्यका मूल बतलाया है। वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे। नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्था फलश्रुतिः॥ (श्रीमद्भा० ११।३।४६) धर्म, राष्ट्र एवं शरणागतकी रक्षाके लिये प्राणोंका त्याग बड़े महत्त्वका है, किंतु कंचन-कामिनीके लिये चोरी-व्यभिचारादिद्वारा प्राणत्यागका महत्त्व नहीं है, अपितु महापापका मूल है। ठीक ऐसे ही सर्वकर्म- समर्पणीय भगवान्के लिये सर्वकर्मोंका त्याग संन्यास शब्दसे आदरणीय होता है। अन्य लौकिक पदार्थोंके लिये आर्यधर्मका त्याग महापाप है। दुस्त्यज दुर्व्यसन एवं पाशविकी चेष्टाओंको दूर करनेके लिये दुस्त्यज धर्मनिष्ठाकी अपेक्षा होती है और फिर उस दुस्त्यज धर्मनिष्ठाके त्यागके लिये दुस्त्यज ब्रह्मनिष्ठा या भगवदनुरागकी अपेक्षा होती है। श्रीव्रजांगनाओंका श्रीकृष्णप्रेम दुस्त्यज था। सर्वत्यागका मूल यही था, परंतु इसके त्यागका कोई भी और कहीं भी साधन ही नहीं था। जैसे योगी- मुनि विषयोंसे मनको हटाकर श्रीकृष्णमें लगाना चाहते हैं, वैसे ही व्रजांगनाएँ श्रीकृष्णसे मन हटाना चाहती हैं। जैसे ग्रह-गृहीतात्मा ग्रहसे अपनेको मुक्त करना चाहता है, वैसे ही कृष्णग्रहगृहीतात्मा व्रजांगनाएँ श्रीकृष्णसे अपने-आपको मुक्त करना चाहती हैं। जैसे मुमुक्षु विषयोंमें दोषानुसन्धान करते हैं, वैसे ही वे श्रीकृष्णमें दोषानुसन्धान करती हैं। दोषानुसन्धान करनेपर भी गोपांगनाएँ मनमोहन श्रीकृष्णको भूल नहीं पातीं मृगयुरिव कपीन्द्रं विव्यधे लुब्धधर्मा स्त्रियमकृत विरूपां स्त्रीजितः कामयानाम्। बलिमपि बलिमत्त्वावेष्टयद् ध्वाङ्क्षवद् य- स्तदलमसितसख्यैर्दुस्त्यजस्तत्कथार्थः ॥ (श्रीमद्भा० १०।४७।१७) हे सखि! श्रीकृष्ण अन्यान्य जन्मोंके भी कपटी