भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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ही हैं, इन्होंने सीताके प्रेमार्थ रामावतारमें व्याधकी तरह छिपकर कपीन्द्र बालीको मारा। कामानुरागिणी शूर्पणखाका नाक-कान काटकर विरूप कर दिया। वामनावतारमें राजा बलिकी पूजा ग्रहणकर उन्हें बाँधकर पाताल भेज दिया। जैसे काक जिस पत्रावली (पत्तल)-में खाता है, उसीमें छिद्र कर देता है, सखि! इनकी भी वही स्थिति है। सखि! जैसे श्यामल पीतपंख मधुरभाषी बिम्बोष्ठ भ्रमर सरस पुष्पोंके परागोंका रसास्वादन करके फिर उसे त्याग देता है, वैसे ही पीतपटधारी बिम्बाधरोष्ठ मधुरालापी श्यामसुन्दरने भी यावत्प्रयोजन प्रेम करके हमलोगोंको त्याग दिया है। हे सखि! असितों (कालों)-का संग कदापि नहीं करना चाहिये। लो, हम भी महेन्द्रमणिकी मालाओं, चूड़ियों, मृगमद एवं नीलाम्बरका त्याग करेंगी। केशोंकी भी श्यामलता मिटानेके लिये उनपर धूलि धारण करेंगी, परंतु सखि! इतना दोषानुसन्धान करनेपर भी मनमोहन श्रीकृष्णकी वह मधुर मूर्ति एक क्षणके लिये भूलती नहीं। उनकी लीलाएँ, हास-विलास और क्रीड़ाएँ विस्मृत नहीं होतीं। एक बार एक गोपांगना, श्रीकृष्णप्रेममें मूर्च्छित थी। एक सखी इत्र, गुलाब-जल और व्यजनसे उपचार कर रही थी कि इतनेहीमें एक तीसरी सखी आकर कुछ श्रीकृष्णलीलाका गायन करने लगी। श्रीकृष्ण नाम सुनते ही प्रथमने कहा— संत्यज सखि तदुदन्तं यदि सुखलवमपि समीहसे सख्याः । स्मारय किमपि तदितरद् विस्मारय हन्त मोहनं मनसः ॥ 'हे सखि! यदि इसको तू थोड़ी-सी भी शान्ति लेने देना चाहती है तो श्रीकृष्णका उदन्त (कथा) मत चला। किसी दूसरी वस्तुका स्मरण करा। सखि! उस मनमोहन श्यामसुन्दरको किसी तरह भुला दे।' अहो! योगीन्द्रगण बाह्य विषयोंसे मनको प्रत्यावर्तित करके जिन श्रीकृष्णमें लगाना चाहते हैं, यह बाला उन्हीं श्रीकृष्णसे मन हटाकर विषयोंमें लगाना चाहती है। योगीन्द्रगण एक क्षणके लिये अपने मनमें जिसकी स्फूर्ति चाहते हैं, यह मुग्धा उन्हीं श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दको अपने मनसे निकालना चाहती है। प्रत्याहृत्य मुनिः क्षणं विषयतो यस्मिन्मनो धित्सति । बालाऽसौ विषयेषु धित्सति मनः प्रत्याहरन्ती ततः ॥ यस्य स्फूर्तिलवाय हन्त हृदयं योगी समुत्कण्ठते । मुग्धेयं किल पश्य तस्य हृदयान्निष्कान्तिमाकाङ्क्षति ॥ जो ब्रह्मनिष्ठा औरोंको दुष्प्राप्य है, वही इनके लिये दुस्त्याज्य है। अन्यान्य दुस्त्यजोंका भी त्याग हो सकता है, परंतु यह अन्तिम दुस्त्यज है। श्रीभगवान्‌से अधिक माधुर्य कहाँ सम्भव है कि जिससे उसका त्याग सम्भव होगा? जैसे लोकैषणा, पुत्रैषणा और वित्तैषणा-विनिर्मुक्त ब्रह्मनिष्ठ सर्वकर्मसंन्यासीका कर्मत्याग भूषण है, दूषण नहीं है, वैसे ही श्रीकृष्ण- प्रेमोन्मादमें लोक-वेदातीत श्रीव्रजांगनाओंका लज्जा एवं आर्यधर्मत्याग भूषण ही है, दूषण नहीं है। जैसे मुख्य पतिकी प्राप्तिमें पतिकी प्रतिमाके पूजनका त्याग, किंवा मुख्य विष्णुकी प्राप्तिमें विष्णु-प्रतिमाका पूजनत्याग दोष नहीं है, वैसे ही परमाराध्य परम पति भगवान् श्रीकृष्णकी प्राप्तिमें व्रजांगनाओंका आर्यधर्मत्याग भूषण ही है। कर्म और उपासनाओंसे मलविक्षेपकी निवृत्ति- द्वारा ज्ञानसे ब्रह्मका स्फुरण होता है। ब्रह्मस्फुरण होनेपर फिर सर्वचेष्टाओंसे विवर्जित होकर ब्रह्मनिष्ठा ही सम्पादन करनी होती है। उस समय कर्म और उपासना किसी प्रकारका भी प्रयत्न उस निष्ठामें प्रतिबन्धक होनेसे त्याज्य ही है। इसीलिये कहा है— 'आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥' (गीता ६।२५) भगवान्‌के अनुभव और सेवनमें जिसका जबतक उपयोग है, वह तबतक ही ग्राह्य है। जब वही भगवदनुभवका प्रतिबन्धक हो, तब तो वह निःसंकोच रूपसे त्याज्य है। भगवत्प्राप्त्यर्थ या धर्म और राष्ट्र आदिके रक्षार्थ प्राणत्याग 'त्याग' है और पर स्त्री, पर धनके लिये प्राणत्याग भी 'त्याग' है, परंतु एककी पुण्यरूपता तथा दूसरेकी पापरूपता स्पष्ट ही है, यथा—