भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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चीरहरण १५५ तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही॥ x अंजन कहा आँख जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं॥ x जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो॥ (विनय-पत्रिका १७४) सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ॥ जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू॥ (रा०च०मा० २।२९१।१-२) सारांश यही कि पति-शुश्रूषा, पतिव्रत और लज्जा आदि सभी आर्यधर्मोंका परम फल यही है कि समस्त प्राणियोंके निरतिशय, निरूपाधिक, परमप्रेमास्पद सर्वाराध्य और सर्वपति भगवान् श्रीकृष्णकी प्राप्ति हो। जबतक जो इसके अनुकूल है, तबतक ही वह आदरणीय है, परंतु जब वही उस चरमध्येयकी प्राप्तिमें प्रतिबन्धक होने लगा, तब तो उसका त्याग ही श्रेष्ठ है— 'बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी॥' (विनय-पत्रिका १७४) सर्वव्यवधानशून्य निरावरण हुए बिना जीवकी कृतकृत्यता नहीं होती अतः श्रीनन्दव्रजकुमारिकाएँ भी श्रीकृष्णप्रेमके विपरीत लज्जा त्यागकर श्रीकृष्णके सामने निकल आयीं। उन्होंने परस्पर विचार किया कि 'हे सखि! श्रीकृष्ण-सम्मिलनकी आशा ऐसी दुश्छेद्य है कि मरणजन्य पीड़ासे भी शतगुणित अधिक लज्जात्यागके कष्टको सहकर भी प्राण-वियोग नहीं होने देती। सखि! प्रियतम हठीले हैं। ये अपने हठको नहीं छोड़ेंगे। इतनेहीमें यदि कोई आ जायगा तो हम सब और बिडम्बनाम्बुधिमें निमग्न हो जायँगी। अतः प्रियतमके हठको रखो, लज्जाको तिलांजलि दो, सखि आँख मूँदकर सर्वतः प्राप्त गाढ़ान्धकारसे ही अपने अंगोंको छिपाकर श्रीकृष्णके सामने चलो।' यह विचारकर वे अंगोंको हाथोंसे ढँककर श्रीकृष्णके सम्मुख आयीं। श्रीकृष्ण भी उनकी दृढ़ भक्ति, दिव्यत्यागको देखकर उनके शुद्ध भावसे प्रसन्न हो उठे और सोचा कि अहो! इन्होंने दुष्कर त्याग किया और-तो-और कुलांगनाजनोंके स्वभावसिद्ध दुस्त्यज लज्जाको भी इन्होंने तृणके समान त्याग दिया। अच्छा, अब इनकी एक परीक्षा और लेनी चाहिये। यदि ये उसमें उत्तीर्ण हो गयीं, तब तो उनके वस्त्र ही नहीं, वस्त्रोंके साथ अपने-आपको भी समर्पित करना होगा। बस, यह ठानकर श्रीकृष्ण बोले— 'स्कन्धे निधाय वासांसि प्रीतः प्रोवाच सस्मितम् ॥' (श्रीमद्भा० १०।२२।१८) उनके वस्त्रोंको अपने स्कन्धपर धारण करके (उनके अधोवस्त्रोंको अपने उत्तमांगपर धारण करके भक्तवश्यता दिखलायी) बोले—'आपलोगोंने जो विवस्त्र होकर जलमें स्नान किया, इससे देवताका अपमान हुआ, आपलोगोंका व्रत खण्डित हो जायगा। हन्त! आपलोगोंने कितना कष्ट करके व्रत किया, फिर भी यदि वह भंग हो जाय तो कितनी विडम्बनाकी बात है। अस्तु, अब आपलोग उस अपराधकी शान्तिके लिये सिरपर अंजलि बाँधकर प्रणाम करके अपना अधोवस्त्र लें।' श्रीकृष्णकी ऐसी उक्ति सुनकर सरल स्वभावकी व्रजबालाओंने नग्न-स्नानसे व्रतभंग मानकर उसकी पूर्तिकी कामनासे श्रीकृष्णको प्रणाम किया। समस्त कर्मोंकी व्यंगताको दूर करनेवाले श्रीकृष्ण हैं। यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु। न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥ जिसके स्मरण तथा नामोच्चारणसे तप और यज्ञक्रियादिकी न्यूनता मिटकर उनकी पूर्ति हो जाती है, उन अच्युत भगवान्‌की वन्दना अवश्य ही कर्मोंकी व्यंगताको मिटा देती है। यहाँ भी स्पष्ट है कि शुद्धभावसे किये गये श्रीकृष्ण-प्राप्त्यर्थ व्रतकी व्यंगतावारणार्थ ही व्रजांगनाओंने श्रीकृष्णकी आज्ञा मानी। महा-महात्यागकर और कठोरातिकठोर कष्ट सहन करके भी व्रजकुमारिकाएँ अपने व्रतकी सांगता चाहती हैं।