भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 166

जब श्रीकृष्णने अंजलि-बन्धनके लिये कहा तो व्रजांगनाओंने नीचे ही अंजलि-बन्धन किया। श्रीकृष्णने कहा कि मूर्धापर अंजलि बन्धन ही प्रणाम है। जब उन्होंने एक हाथसे आच्छादनीय अंगको आच्छादित करके एक हाथद्वारा सिरसे प्रणाम किया, तब भी श्रीकृष्णने कहा—एक हाथका प्रणाम भी अशास्त्रीय है। फिर उन्होंने निश्चल एवं निष्कपट भावसे श्रीकृष्णको सर्वान्तरात्मा और सर्वेश्वर समझकर व्रतपूर्त्यर्थ प्रणाम किया। वस्तुतः जीव भगवान्‌के सन्मुख निरावरण एवं निष्कपट होनेमें अनेक तरहसे आनाकानी करता है, परंतु जब भगवान् जिसपर अनुकम्पा करते हैं, तब किसी-न-किसी तरह उसे अपने सामने कर ही लेते हैं। यह प्रभुकी विचित्र लीला है, बड़े-बड़े मुनीन्द्रगण इसलिये लालायित रहते हैं कि प्रभु मुझे अपने सन्मुख करें, उनमें मेरा मन आसक्त हो, परंतु जिसपर प्रभुकी कृपा होती है, उसकी चाहे इच्छा न हो तो भी उसके शतधा आनाकानी करनेपर भी भगवान् उसको खींच लेते हैं। तभी प्रेमी लोगोंने कृष्णावेशको ग्राहावेश कहा है। बलिने भी कहा है कि 'नाथ! आप हम सबके परोक्ष गुरु हैं, हमलोगोंकी इच्छा न होनेपर भी बलात् सन्मुख कर लेते हैं; क्योंकि बिना सर्वव्यवधानशून्य निरावरण हुए जीवकी कृतकृत्यता नहीं होती।' परमानन्दरसामृतसिन्धु भगवान्‌की तरंगस्थानीया उनकी चिदानन्दमयी शक्तियाँ ही जीव हैं। वही भगवान्‌की अन्तरंगा एवं परा प्रकृति या शक्ति पदसे कही जाती हैं। 'प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।', 'जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥' (गीता ७।५) जब तरंगके भीतर-बाहर-मध्यमें या अंश-अंशमें जल भरपूर रहता है, तब महासमुद्रमें तरंगका क्या व्यवधान (परदा)? वैसे ही जब चिदानन्दमयी जीव- शक्तियोंके अन्तर-बाह्य सर्वत्र परमानन्दरसामृतमूर्ति श्रीभगवान् व्याप्त हैं, तब उन भगवान्‌से जीवका क्या छिपाव? विश्वके स्थूल, सूक्ष्म और कारण त्रिविध शरीरोंकी समस्त हलचलोंका जो कारण एवं भासक साक्षी है, उससे क्या छिप सकता है? प्राणियोंके मन, बुद्धि और अहंकारकी सभी सद्भावनाओं और दुर्भावनाओंका जो साक्षी है, पिपीलिकाओंकी भी समस्त मनोवृत्तियोंका जो सर्वथा ज्ञाता है, उससे क्या छिपाव? फिर भी अनादि अनिर्वचनीय मोहिनी शक्तिके प्रभावसे मोहित वे शक्तियाँ भगवान्‌से अपने अंगोंको आवृत रखना चाहती हैं और उनसे लज्जा करती हैं। वे ही व्रजांगना हैं और सर्वान्तरात्मा सर्वसाक्षी ही श्रीकृष्ण हैं। 'चैतन्याभासोपेतबुद्धिवृत्तियाँ' भी व्रजांगना कही जा सकती हैं। उनके प्रकाश साक्षी श्रीकृष्ण हैं। यद्यपि साक्षीकी अन्तरंगता न समझनेसे उनसे छिपनेकी चेष्टा होती है। साभास मनोमयी वृत्तिरूपा श्रुतियाँ भी व्रजांगना हैं, उनका तात्पर्य या हृदय जिस परम तत्त्वमें निहित है, उन परमानन्दरसामृतमूर्ति भगवान्‌से उनका क्या अन्तर? जैसे जलमें शीतलता, अमृतमें मधुरता वैसे ही श्रीकृष्णचन्द्रमें श्रीवृषभानुनन्दिनी राधिका हैं। परमानन्दरसामृतमूर्ति श्रीकृष्णचन्द्रकी माधुर्याधिष्ठात्री महालक्ष्मी ही श्रीराधा हैं। वेदान्तियोंने गुण-गुणीका तादात्म्य माना है। अतएव गन्धात्मिका ही पृथिवी है। कर्पूर और उसकी गन्धका तादात्म्य स्पष्ट ही है। इस दृष्टिसे अमृत और उसके माधुर्यका परमानन्दरसामृतसिन्धु और उसकी माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्तिका अभेद ही है। तभी भावुकोंने श्रीकृष्णहृदयवर्ती महाभावस्वरूपा श्रीराधाको और उनके हृदयवर्ती मूर्तिमान् शृंगारस्वरूप श्रीकृष्णको माना है। अतएव महाभावपरिवेष्टित मूर्तिमान् शृंगार- रसके ही रूपमें भावुकजन राधाकृष्णका दर्शन करते हैं। श्रीकृष्णांगवर्ती पीताम्बर एवं विविध भूषण श्रीराधा और व्रजदेवियाँ ही हैं (श्रीराधाके अंगमें कस्तूरिका, महेन्द्र नीलमणि, हार एवं नीलाम्बररूपमें श्रीकृष्ण ही हैं)। श्रवसोः कुवलयमक्षणोरञ्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम। वृन्दावनतरुणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति॥ वृन्दावनतरुणी व्रजदेवियोंके कानोंमें कुवलय