भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 167

(कमलविशेष), नेत्रोंमें अंजन, उर (हृदय)-में महेन्द्र नीलमणिकी माला, किं बहुना समस्त मण्डन (भूषणालंकार) श्रीकृष्ण ही हैं। इस तरह विचार करनेपर सभी प्राणियोंके निरतिशय निरुपाधिक परप्रेमके आस्पद प्रत्यक्चैतन्याभिन्न भगवान्‌से छिपावकी बात ही नहीं बनती। मोटी दृष्टिसे देखें तो भी चाहे कितनी भी असूर्यमपश्या साध्वी सती पतिव्रता क्यों न हो, परंतु क्या वह अपने अंगोंको वायुसे असंस्पृष्ट रख सकती है? जलसे क्या उसके गुह्यातिगुह्यका स्पर्श नहीं होता? तेज, वायु किंवा आकाशसे कौन स्त्री अपने अंगोंको अदृष्ट एवं असंस्पृष्ट रख सकती है? तस्मात् यही कहना होगा कि स्वपतिसे भिन्न अन्य पुरुषसे ही आवरण किया जाता है। जब यह स्थिति है, तब तो फिर आकाशका भी कारण अहंतत्त्व, उसका भी कारण महत्तत्त्व, महत्तत्त्वका कारण अव्यक्त तत्त्व और उसका भी कारण या अधिष्ठान सत्तत्त्व सबसे अन्तरंग है। फिर सर्वान्तरंग सर्वान्तरात्मा उस स्वप्रकाश सर्वभासक सत्तत्त्वसे व्यवहित, अदृष्ट कौन वस्तु हो सकती है? विश्वमें कोई भी अणु या परमाणु ऐसा नहीं, जो सत्ता और स्फूर्तिसे अनालिंगित हो, फिर व्रजांगना या कोई साध्वी स्त्री या कोई चिदानन्दमयी जीव शक्ति, किं बहुना कोई भी तत्त्व स्वप्रकाश सदानन्दघन श्रीकृष्णसे अनालिंगित असंयुक्त कैसे हो सकता है? जब कोई जल, तेज, वायु और आकाशसे भी अपने-आपको अस्पृष्ट नहीं रख सकता, तब वह उन सबके परम कारण अधिष्ठान या प्रकाशकसे कैसे अपनेको असंस्पृष्ट रख सकता है? भोक्ताके साथ भोग्यका तादात्म्य ही भोग है। 'सविता गोभी रसं भुङ्क्ते' सूर्य अपनी रश्मियोंसे रसका सम्भोग करते हैं। यहाँ भी रश्मिद्वारा रसकी सूर्यके साथ अभेदापत्ति ही भोग है। भोक्ता भोग्यका अपने साथ तादात्म्य कर लेता है। अनुकूल-प्रतिकूल विषयोंके एवं तज्जन्य सुख-दुःखोंके साक्षात्कारको ही भोग कहा जाता है। साक्षात्कार जड़ मन, बुद्धि और अहंकार आदिसे असम्भव है। अतः स्वप्रकाश चेतनसे ही समस्त विषयोंका साक्षात्कार या भोग सम्पन्न होता है। अतएव बौद्ध बोधसे भिन्न एक पौरुषेय बोध माननेकी अपेक्षा पड़ती है। जैसे जपाकुसुमादिद्वारा लोहित स्फटिकपर प्रतिबिम्बित पुरुषमें भी उसी लौहित्यका भान होता है, उसी तरह श्रोत्रादि इन्द्रियप्रत्युपस्थापित शब्द-स्पर्शादि विषयोंके आकारसे आकारित- वृत्तिमदन्तःकरणके आरोपित सम्बन्धसे चिदात्मामें भी विषयाकारता बन जाती है। जैसे जपाकुसुमोपाधिसे लोहित स्फटिक स्वप्रतिबिम्बित पुरुषमें भी अपने लौहित्य आकारका समर्पण कर देता है, वैसे ही इन्द्रियोंद्वारा विषयाकाराकारित वृत्तिमदन्तःकरण भी स्वप्रतिबिम्बित चैतन्यमें अपनी विषयाकारताका समर्पण करता है। बस, इस तरह असंगमें परम्परया विषय- सम्बन्ध, प्रकाशकता या भोक्तृता बनती है। सभी विषयोंका मुख्य भोक्तृत्व चिदात्मामें ही बनता है तथा सभी कान्तास्पर्शादि सुखका भी मुख्यभोक्ता अन्तरात्मा श्रीकृष्ण ही हैं। इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि तथा समष्टि मनका अभिमानी चन्द्रमा—सभी भोगोंके साधन हैं। इतनेपर भी सर्वदर्शन, सर्वस्पर्शमें साधक बनकर भी वे व्यष्टि-अभिमानशून्य होनेसे अप्रत्यवायी हैं। उसी तरह समष्टिके अन्तरात्मा भगवान् श्रीकृष्ण सर्वभोक्ता होनेपर भी अप्रत्यवायी ही हैं। जैसे सब मनोंका अभिमानी होनेसे चन्द्रके स्पर्शसे किसी भी साध्वीका पतिव्रत नहीं बिगड़ता, वैसे ही सर्वान्तरात्मा श्रीकृष्णका संस्पर्श किसीके भी पतिव्रतका व्यापादक नहीं है— गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम्। योऽन्तश्चरति सोऽध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक् ॥ ( श्रीमद्भा० १०।३३।३६) जो गोपियों और उनके पतियों एवं सभीका अन्तरात्मा है, वह सर्वाध्यक्ष सर्वथा निर्लेप एवं निर्दोष ही रहता है। भोक्तासे भोग्यके अत्यन्त अव्यवधानको भोग