भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 168

१५८ भक्तिसुधा कहा गया है। चिदात्मा भोक्ताका विषयोंके साथ इन्द्रिय, मन और बुद्धिके द्वारा अव्यवधान होता है। भगवान्‌की चिदानन्दमयी जीवशक्तियोंका उनके साथ स्वाभाविक आत्यन्तिक अव्यवधान है। भ्रमर पुष्प- परागका रसास्वादन करता है, परंतु यह सम्बन्ध या अव्यवधान कृत्रिम है। हाँ, यदि पुष्पमें ही अपने सौगन्ध्य या परागरसास्वादनकी शक्ति हो, तब ही पूर्ण भोग या रसास्वादन बन सकता है, परंतु यहाँ तो परमानन्दरसामृतमूर्ति भगवान् श्रीकृष्ण ही अपने माधुर्य (माधुर्याधिष्ठात्री श्रीवृषभानुकिशोरी)-का आस्वादन करते हैं। सभी जीव भगवान्‌के परतन्त्र होते हैं श्रीराधाकी अंशभूत या चिदानन्दमयी जीव- शक्तियोंका तादात्म्येन सम्मिलन, सम्भोग आदि सम्पन्न होता है। जैसे महासमुद्रमें तरंगें होती हैं, वैसे ही भगवान्‌में जीवोंका भाव है। अतएव जैसे एक तरंगका सम्बन्ध दूसरे तरंगसे होता है, उसी तरह एक जीवका सम्बन्ध दूसरे जीवोंसे होता है। यह सम्बन्ध आगन्तुक और स्थायी होता है, परंतु तरंगका महासमुद्रके साथ सम्बन्ध स्वाभाविक होता है, (जबतक तरंग है, तबतक उसके साथ समुद्रका सम्बन्ध भी अनिवार्य है) वैसे ही जीवका भगवान्‌के साथ सम्बन्ध ही अकृत्रिम एवं स्वाभाविक है। इसीलिये भावुकोंका कहना है कि किसी भी स्त्रीके मुख्य पति भगवान् ही हैं। कोई भी जीव हो, उसके साथ जीवका सम्बन्ध अस्थायी ही है। सभी तरंग जैसे समुद्रके परतन्त्र होते हैं, वैसे ही सभी जीव भगवान्‌के परतन्त्र होते हैं। भगवान् ही सबके मुख्य पति हैं इस तरह पारतन्त्र्यरूप स्त्रीत्व सभी जीवोंमें है। जीवभाव मिटकर परमात्मभावप्राप्तिमें ही पूर्ण स्वातन्त्र्य एवं पुंस्त्व प्राप्त होता है तथा किसी भी स्त्रीका अखण्ड सौभाग्य एवं पातिव्रत्य तभी रह सकता है, जब वह अनन्त अखण्ड भगवान्‌को ही अपना पति बनाये। जीवोंका कर्मानुसार सम्बन्ध-विच्छेद होता ही है। अतः अखण्ड सम्बन्ध न रहनेसे सौभाग्य एवं पातिव्रत्य अखण्ड नहीं रह सकता। अतएव अनन्त, अखण्ड, नित्य, सहज-सम्बन्धी भगवान् ही सबके मुख्य पति हैं, उन्हींसे सम्बन्ध जोड़ना मुख्य है। दूसरे पति तो उसी मुख्य पतिकी प्रतिमा हैं, मुख्य परम पतिकी प्राप्तिमें प्रतिमाकी गौणता होना स्वाभाविक है। जैसे शालग्रामप्रतिमापूजन मुख्य-विष्णुप्राप्तिका साधन है, उसी तरह लौकिक पतिका पूजन मुख्य पति भगवान्‌की प्राप्तिका साधन है। तभी कन्यादानका संकल्प इस भावसे होता है कि 'विष्णुरूपाय वराय लक्ष्मीरूपामिमां कन्यामहं सम्प्रददे।' इसीलिये बड़ी श्रद्धासे साधनका आदर करना ही चाहिये। अज्ञानियोंकी दृष्टिसे व्यभिचारिणी, किंतु परम पतिव्रता व्रजांगनाओंकी मुख्य परम पति भगवान्‌में अद्भुत निष्ठा देखकर ही अरुन्धतीप्रभृति सतीवृन्द उनके लिये श्रद्धासे सिर झुका देती हैं। 'श्रद्धाराज्यदरुन्धतीमुखसतीवृन्देन वन्द्ये हि ताः।' किसी समय रासक्रीड़ा करते-करते श्रीकृष्ण लीलाविशेषार्थ किसी निकुंजमें छिप गये। जब अन्वेषण करती हुई व्रजांगनाएँ वहाँ पहुँचीं तो छिपनेके ही भावसे श्रीकृष्णने श्रीमन्नारायणका रूप धारण कर लिया, परंतु श्रीमन्नारायणके अद्भुत ऐश्वर्य- सौन्दर्य और माधुर्यपूर्ण रूपपर व्रजांगनाओंका आकर्षण नहीं हुआ। वे श्रद्धा-भक्तिसे भगवान्‌को प्रणामकर कहने लगीं- 'हे भगवन्! आप कृपाकर हमारे मनमोहन श्यामसुन्दर श्रीव्रजेन्द्रनन्दनसे हमको मिला दो।' कोई जीव चाहे कितना ही पतिव्रतधर्मसम्पन्न हो, किंतु ईश्वरीय ऐश्वर्य-माधुर्यमें उसका आकर्षण होना स्वाभाविक है, परंतु व्रजांगनाओंकी अद्भुत, अखण्ड, अनन्य निष्ठा सचमुच अरुन्धतीप्रभृति सतियोंके भी मनको चकित कर देती है। अस्तु, इस तरह अवनत व्रजांगनाओंको देखकर परम करुण भगवान्‌ने उनके शुद्ध भावसे प्रसन्न होकर उन्हें वस्त्र दे दिये। वस्त्रके साथ अद्भुत ब्राह्म संस्पर्श प्रदान किया या अपने-आपको ही समर्पण कर दिया। अहो! उनका कितना दृढ़ प्रलम्भ किया गया, उन्हें लज्जाविहीन किया गया, उन्हें क्रीड़नक (खिलौना)-सा बनाया