भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 169, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंचीरहरण १५९ गया, उनका वस्त्र अपहरण किया गया, फिर भी उन्होंने श्रीकृष्णमें दोषबुद्धि नहीं की; किंतु वे प्रियतम मनमोहनके संगसे परम प्रसन्न हुईं। अपने वस्त्रोंको पहनकर प्रेष्ठ-संगमके लिये सज्जित होकर श्रीकृष्णाकर्षितचित्त होनेके कारण अचल और चित्रलिखित-सी रह गयीं। राग, तृष्णा, मोह आदि निन्द्यभाव भी भगवत्सम्बन्धसे अतिमूल्यवान् हो जाते हैं प्रथम तो व्रजांगनाओंसे त्यक्त होकर लज्जा श्रीकृष्णकी शरण गयी, अन्तमें श्रीकृष्णका बल पाकर, फिर वह नेत्रोंके ही मार्गसे श्रीव्रजांगनाओंमें आयी। कोई भी पदार्थ अहंता और ममतापूर्वक ही सेवन करनेसे बन्धक होता है, भगवान्में समर्पित कर देनेसे फिर वही भगवान्का प्रसाद होकर निर्गुण हो जाता है—'मत्प्रसादान्ते निर्गुणम्'। यहाँतक कि यद्यपि राग, तृष्णा, मोह आदि राजस-तामस भाव अत्यन्त त्याज्य एवं निन्द्य होते हैं, परंतु भगवान्के सम्बन्धसे उनका भी सर्वाधिक मूल्य हो जाता है— तावद् रागादयः स्तेनास्तावत् कारागृहं गृहम्। तावन्मोहोऽङ्घ्रिनिगडो यावत् कृष्ण न ते जनाः॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३६) रागादि तभीतक स्वरूप-सुखअपहारी होनेसे चोर हैं, गृह तभीतक कारागार है, मोह तभीतक सम्बन्धक है, जबतक प्राणी भगवान्का भक्त नहीं होता। श्रीकृष्णानुरागीको तो राग भी होगा तो श्रीकृष्णमें ही, मोह होगा तो श्रीकृष्णमें ही, भक्तका गृह भी भगवदालय होनेसे निर्गुण ही है। विषयसे ही वैराग्य है, जैसे वैराग्यसे वैराग्य इष्ट नहीं है, वैसे ही ज्ञान-वैराग्यके भी फलभूत भगवान्से भी वैराग्य इष्ट नहीं है। इसीलिये सनकादि, शुकादि- जैसे अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रगण सहस्रों ज्ञान- वैराग्योंका समर्पण करके भगवान्के श्रीचरणोंमें राग या तृष्णाकी प्रार्थना करते हैं— कामं भवः स्ववृजिनैर्निरयेषु नः स्ता- च्चेतोऽलिवद्यदि नु ते पदयो रमेत। वाचश्च नस्तुलसिवद्यदि तेऽङ्घ्रिशोभाः पूर्येत ते गुणगणैर्यदि कर्णरन्ध्रः॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४९) श्रीसनकादिका कहना है कि 'हे नाथ! यदि आपके श्रीचरणोंमें अलि (भौरे)-के समान मन आसक्त हो और आपके गुणगणोंसे यदि कर्णरन्ध्र निरन्तर पूरित होता रहे, तब तो भले ही अपने कर्मोंके अनुसार नरकोंमें जन्म हो तो भी कोई चिन्ता नहीं।' अतः भगवान्के सम्बन्धसे तृष्णा और रागका भी अद्भुत महत्त्व हो जाता है। भगवान्में मोह, भगवान्में राग, उनके सम्मिलनकी तृष्णा किसी परम सौभाग्यशालीको ही प्राप्त हो सकती है। किसी भावुकने कहा है— कृष्णाभावरसभाविता मतिः क्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते। तत्र मूल्यमपि लौल्यमेकलं जन्मकोटिसुकृतैर्नु लभ्यते॥ श्रीकृष्णप्रेमरसभक्तिभावित मति दुर्लभ है। यदि वह मिल सके तो उसे खरीदना ही जीवनका साफल्य है, परंतु उसका मूल्य भी केवल लौल्य (व्याकुलता) है। वह भी करोड़ों जन्मोंके संकल्पोंसे किसी सौभाग्यशालीको प्राप्त होता है। प्राणीको भगवान्की प्राप्तिमें अविद्या, लज्जा और अहंकार आदि ही व्यवधान हैं। अपनेको भगवान्से भिन्न समझकर उनसे अपनेको छिपाने और आवृत रखनेका प्रयास किया जाता है। वस्त्ररूप अविद्याके छिन जानेपर व्रजांगनाएँ अहंकार और लज्जासे अपनेको छिपाना चाहती थीं, परंतु सर्वव्यापक, सर्वप्रकाशक, सर्वसाक्षी, सर्वान्तरात्मा भगवान्ने यह भी अनुचित समझा और सर्वथा निरावरण, निश्छल होनेका अनुरोध किया। भगवान्के संकल्पसे व्रजांगनाओंने वैसा ही किया। अत्यन्त निरावरण होकर शुद्धभावसे दोनों हाथोंसे मूर्धाञ्जलिबन्धनपुरःसर प्रणाम किया। भगवान्ने शुद्धभावसे प्रसन्न होकर अपना प्रसाद करके लज्जा आदि सभी आवरणोंको लौटा दिया, परंतु अब वे सब भगवत्प्रसाद