भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 170

१६० भक्तिसुधा हो गये। जीवके लिये मोहिनी अविद्या भी भगवत्प्रसाद होकर वैष्णवी माया हो जाती है। भगवल्लीलामें उपयोगी भेदका समर्थक होनेसे भक्तोंमें भगवान् वैष्णवी मायाका संचार करते हैं। जब श्रीनन्दरानीको अपने ललन श्रीकृष्णके मुखमें निखिल विश्व देखकर यह बोध हुआ कि 'अरे! ये तो पूर्ण परब्रह्म परमात्मा हैं, मैं तो मोहमें इन्हें पुत्र मान रही हूँ', बस, वहीं भगवान्ने देखा कि यह ऐश्वर्य-ज्ञान तो लीलामें बाधक होगा। वात्सल्यभावका माधुर्य विलक्षण है। ऐश्वर्यका बोध रहनेसे प्रत्येक प्रवृत्तिमें भय और संकोच रहेगा। निःसंकोच, निर्भर, ममत्वपुरःसर वात्सल्य रसमें ऐश्वर्य बाधक ही होगा। अतएव 'व्यतनोद्वैष्णवीं मायां पुत्रस्नेहमयीं विभुः।' उस पुत्रस्नेहमयी वैष्णवी मायाका विस्तार किया, जिससे शुद्ध वात्सल्यरसकी वृद्धि हो। पहले तो भगवान् भजनेवालोंको भक्ति दे देते हैं, मुक्ति नहीं देते हैं; क्योंकि मुक्तिमें तो भक्त भगवत्स्वरूप हो जाता है, परंतु भक्तिमें तो भगवान्को अपने वशमें कर लेता है। भक्तिकी ही महिमासे भगवान् यशोदाकी छड़ीसे एवं उलूखल-बन्धनसे भयभीत होकर रोते हैं। 'माँ मैंने मिट्टी नहीं खायी' ऐसा झूठ भी बोलते हैं- 'अस्त्वेवमङ्ग भगवान् भजतां मुकुन्दो मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम्।' तथापि जब भगवान् भक्ति दे देते हैं, तब फिर अपनी लीलामें बाधा नहीं डालना चाहते। ऐश्वर्य- बोध होनेपर वैष्णवी मायासे पुनः उसे छिपाकर लीला-सुखका आस्वादन करते और कराते हैं। गोप्याददे त्वयि कृतागसि दाम तावद् या ते दशाश्रुकलिलाञ्जनसम्भ्रमाक्षम्। वक्त्रं निनीय भयभावनया स्थितस्य सा मां विमोहयति भीरपि यद्विभेति॥ (श्रीमद्भा० १।८।३१) माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्तिकी यही तो महिमा है कि यहाँ ऐश्वर्य छिप जाता है, यहाँ स्वतन्त्र भगवान् भी भक्त-परतन्त्र होते हैं। परम निर्भय कालके भी कालरूप भगवान् भी भयभीत होते हैं। अनन्त जीवोंको मुक्ति देनेवाले भगवान् भी प्रणयपाशमें बँध जाते हैं, यहाँ पूज्यता और समाधि अनादरणीय होती है, सेतुधारक ही यहाँ भिन्न सेतु हो जाता है। वस्तुतः प्रकृति, प्राकृत प्रपंचके विधि-निषेधोंका प्रपंचातीत रसमय भगवान्में न होना स्वाभाविक ही है, फिर भी जिन्हें स्वाभाविक काम, कर्म, ज्ञानरूप मृत्युसे तरना है, उनके लिये तो भगवान्का मर्यादामय, सेतुधारक स्वरूप ही अपेक्षित है। जैसे भगवदवतारभूत नर-नारायण एवं ऋषभदेवके चरित्र ब्रह्मचारियों, गृहस्थोंके अनुकरणीय हैं, वैसे ही संसारतितीर्षुके लिये श्रीकृष्णचरित्र भी अनुकरणीय है। यह तो केवल चिन्तनसे पापनाशक है। अद्वैतसे सुन्दर द्वैत इसीलिये भावुकगण तत्त्वबोधके अनन्तर भी भक्तिके लिये द्वैत प्रतीतिको स्वीकार करते हैं। अतः पूर्ण निरावरण होकर रसमय आवरण भगवान् और भक्त दोनोंको अभीष्ट होता है- द्वैतं मोहाय बोधात्प्राक् जाते बोधे मनीषया। भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥ निरावरणरूपसे प्रत्यक् चैतन्याभिन्न परब्रह्मके साक्षात्कारके पहले द्वैत केवल मोहके ही लिये है, परंतु भक्तिके लिये भावित द्वैत तो अद्वैतसे भी सुन्दर है। पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिः स्यात् सा तु मुक्तिशताधिका॥ पारमार्थिक अद्वैत और भजनके लिये द्वैत, बस इस तरहकी जो भक्ति है, वह तो सैकड़ों मुक्तियोंसे श्रेष्ठ है। इस तरह प्रेमतत्त्वज्ञ भगवान्के साथ आत्माका अभेद जानकर भी आहार्य भेदभावसे भगवान्को भजता है-