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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

चीरहरण १५९ गया, उनका वस्त्र अपहरण किया गया, फिर भी उन्होंने श्रीकृष्णमें दोषबुद्धि नहीं की; किंतु वे प्रियतम मनमोहनके संगसे परम प्रसन्न हुईं। अपने वस्त्रोंको पहनकर प्रेष्ठ-संगमके लिये सज्जित होकर श्रीकृष्णाकर्षितचित्त होनेके कारण अचल और चित्रलिखित-सी रह गयीं। राग, तृष्णा, मोह आदि निन्द्यभाव भी भगवत्सम्बन्धसे अतिमूल्यवान् हो जाते हैं प्रथम तो व्रजांगनाओंसे त्यक्त होकर लज्जा श्रीकृष्णकी शरण गयी, अन्तमें श्रीकृष्णका बल पाकर, फिर वह नेत्रोंके ही मार्गसे श्रीव्रजांगनाओंमें आयी। कोई भी पदार्थ अहंता और ममतापूर्वक ही सेवन करनेसे बन्धक होता है, भगवान्‌में समर्पित कर देनेसे फिर वही भगवान्‌का प्रसाद होकर निर्गुण हो जाता है—'मत्प्रसादान्ते निर्गुणम्'। यहाँतक कि यद्यपि राग, तृष्णा, मोह आदि राजस-तामस भाव अत्यन्त त्याज्य एवं निन्द्य होते हैं, परंतु भगवान्‌के सम्बन्धसे उनका भी सर्वाधिक मूल्य हो जाता है— तावद् रागादयः स्तेनास्तावत् कारागृहं गृहम्। तावन्मोहोऽङ्‌घ्रिनिगडो यावत् कृष्ण न ते जनाः॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३६) रागादि तभीतक स्वरूप-सुखअपहारी होनेसे चोर हैं, गृह तभीतक कारागार है, मोह तभीतक सम्बन्धक है, जबतक प्राणी भगवान्‌का भक्त नहीं होता। श्रीकृष्णानुरागीको तो राग भी होगा तो श्रीकृष्णमें ही, मोह होगा तो श्रीकृष्णमें ही, भक्तका गृह भी भगवदालय होनेसे निर्गुण ही है। विषयसे ही वैराग्य है, जैसे वैराग्यसे वैराग्य इष्ट नहीं है, वैसे ही ज्ञान-वैराग्यके भी फलभूत भगवान्‌से भी वैराग्य इष्ट नहीं है। इसीलिये सनकादि, शुकादि- जैसे अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रगण सहस्रों ज्ञान- वैराग्योंका समर्पण करके भगवान्‌के श्रीचरणोंमें राग या तृष्णाकी प्रार्थना करते हैं— कामं भवः स्ववृजिनैर्निरयेषु नः स्ता- च्चेतोऽलिवद्यदि नु ते पदयो रमेत। वाचश्च नस्तुलसिवद्यदि तेऽङ्‌घ्रिशोभाः पूर्येत ते गुणगणैर्यदि कर्णरन्ध्रः॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४९) श्रीसनकादिका कहना है कि 'हे नाथ! यदि आपके श्रीचरणोंमें अलि (भौरे)-के समान मन आसक्त हो और आपके गुणगणोंसे यदि कर्णरन्ध्र निरन्तर पूरित होता रहे, तब तो भले ही अपने कर्मोंके अनुसार नरकोंमें जन्म हो तो भी कोई चिन्ता नहीं।' अतः भगवान्‌के सम्बन्धसे तृष्णा और रागका भी अद्भुत महत्त्व हो जाता है। भगवान्‌में मोह, भगवान्‌में राग, उनके सम्मिलनकी तृष्णा किसी परम सौभाग्यशालीको ही प्राप्त हो सकती है। किसी भावुकने कहा है— कृष्णाभावरसभाविता मतिः क्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते। तत्र मूल्यमपि लौल्यमेकलं जन्मकोटिसुकृतैर्नु लभ्यते॥ श्रीकृष्णप्रेमरसभक्तिभावित मति दुर्लभ है। यदि वह मिल सके तो उसे खरीदना ही जीवनका साफल्य है, परंतु उसका मूल्य भी केवल लौल्य (व्याकुलता) है। वह भी करोड़ों जन्मोंके संकल्पोंसे किसी सौभाग्यशालीको प्राप्त होता है। प्राणीको भगवान्‌की प्राप्तिमें अविद्या, लज्जा और अहंकार आदि ही व्यवधान हैं। अपनेको भगवान्‌से भिन्न समझकर उनसे अपनेको छिपाने और आवृत रखनेका प्रयास किया जाता है। वस्त्ररूप अविद्याके छिन जानेपर व्रजांगनाएँ अहंकार और लज्जासे अपनेको छिपाना चाहती थीं, परंतु सर्वव्यापक, सर्वप्रकाशक, सर्वसाक्षी, सर्वान्तरात्मा भगवान्‌ने यह भी अनुचित समझा और सर्वथा निरावरण, निश्छल होनेका अनुरोध किया। भगवान्‌के संकल्पसे व्रजांगनाओंने वैसा ही किया। अत्यन्त निरावरण होकर शुद्धभावसे दोनों हाथोंसे मूर्धाञ्जलिबन्धनपुरःसर प्रणाम किया। भगवान्‌ने शुद्धभावसे प्रसन्न होकर अपना प्रसाद करके लज्जा आदि सभी आवरणोंको लौटा दिया, परंतु अब वे सब भगवत्प्रसाद

१६० भक्तिसुधा हो गये। जीवके लिये मोहिनी अविद्या भी भगवत्प्रसाद होकर वैष्णवी माया हो जाती है। भगवल्लीलामें उपयोगी भेदका समर्थक होनेसे भक्तोंमें भगवान् वैष्णवी मायाका संचार करते हैं। जब श्रीनन्दरानीको अपने ललन श्रीकृष्णके मुखमें निखिल विश्व देखकर यह बोध हुआ कि 'अरे! ये तो पूर्ण परब्रह्म परमात्मा हैं, मैं तो मोहमें इन्हें पुत्र मान रही हूँ', बस, वहीं भगवान्ने देखा कि यह ऐश्वर्य-ज्ञान तो लीलामें बाधक होगा। वात्सल्यभावका माधुर्य विलक्षण है। ऐश्वर्यका बोध रहनेसे प्रत्येक प्रवृत्तिमें भय और संकोच रहेगा। निःसंकोच, निर्भर, ममत्वपुरःसर वात्सल्य रसमें ऐश्वर्य बाधक ही होगा। अतएव 'व्यतनोद्वैष्णवीं मायां पुत्रस्नेहमयीं विभुः।' उस पुत्रस्नेहमयी वैष्णवी मायाका विस्तार किया, जिससे शुद्ध वात्सल्यरसकी वृद्धि हो। पहले तो भगवान् भजनेवालोंको भक्ति दे देते हैं, मुक्ति नहीं देते हैं; क्योंकि मुक्तिमें तो भक्त भगवत्स्वरूप हो जाता है, परंतु भक्तिमें तो भगवान्को अपने वशमें कर लेता है। भक्तिकी ही महिमासे भगवान् यशोदाकी छड़ीसे एवं उलूखल-बन्धनसे भयभीत होकर रोते हैं। 'माँ मैंने मिट्टी नहीं खायी' ऐसा झूठ भी बोलते हैं- 'अस्त्वेवमङ्ग भगवान् भजतां मुकुन्दो मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम्।' तथापि जब भगवान् भक्ति दे देते हैं, तब फिर अपनी लीलामें बाधा नहीं डालना चाहते। ऐश्वर्य- बोध होनेपर वैष्णवी मायासे पुनः उसे छिपाकर लीला-सुखका आस्वादन करते और कराते हैं। गोप्याददे त्वयि कृतागसि दाम तावद् या ते दशाश्रुकलिलाञ्जनसम्भ्रमाक्षम्। वक्त्रं निनीय भयभावनया स्थितस्य सा मां विमोहयति भीरपि यद्विभेति॥ (श्रीमद्भा० १।८।३१) माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्तिकी यही तो महिमा है कि यहाँ ऐश्वर्य छिप जाता है, यहाँ स्वतन्त्र भगवान् भी भक्त-परतन्त्र होते हैं। परम निर्भय कालके भी कालरूप भगवान् भी भयभीत होते हैं। अनन्त जीवोंको मुक्ति देनेवाले भगवान् भी प्रणयपाशमें बँध जाते हैं, यहाँ पूज्यता और समाधि अनादरणीय होती है, सेतुधारक ही यहाँ भिन्न सेतु हो जाता है। वस्तुतः प्रकृति, प्राकृत प्रपंचके विधि-निषेधोंका प्रपंचातीत रसमय भगवान्में न होना स्वाभाविक ही है, फिर भी जिन्हें स्वाभाविक काम, कर्म, ज्ञानरूप मृत्युसे तरना है, उनके लिये तो भगवान्का मर्यादामय, सेतुधारक स्वरूप ही अपेक्षित है। जैसे भगवदवतारभूत नर-नारायण एवं ऋषभदेवके चरित्र ब्रह्मचारियों, गृहस्थोंके अनुकरणीय हैं, वैसे ही संसारतितीर्षुके लिये श्रीकृष्णचरित्र भी अनुकरणीय है। यह तो केवल चिन्तनसे पापनाशक है। अद्वैतसे सुन्दर द्वैत इसीलिये भावुकगण तत्त्वबोधके अनन्तर भी भक्तिके लिये द्वैत प्रतीतिको स्वीकार करते हैं। अतः पूर्ण निरावरण होकर रसमय आवरण भगवान् और भक्त दोनोंको अभीष्ट होता है- द्वैतं मोहाय बोधात्प्राक् जाते बोधे मनीषया। भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥ निरावरणरूपसे प्रत्यक् चैतन्याभिन्न परब्रह्मके साक्षात्कारके पहले द्वैत केवल मोहके ही लिये है, परंतु भक्तिके लिये भावित द्वैत तो अद्वैतसे भी सुन्दर है। पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिः स्यात् सा तु मुक्तिशताधिका॥ पारमार्थिक अद्वैत और भजनके लिये द्वैत, बस इस तरहकी जो भक्ति है, वह तो सैकड़ों मुक्तियोंसे श्रेष्ठ है। इस तरह प्रेमतत्त्वज्ञ भगवान्के साथ आत्माका अभेद जानकर भी आहार्य भेदभावसे भगवान्को भजता है-

चीरहरण १६१ प्रियतमहृदये वा खेलतु प्रेमरीत्या पदयुगपरिचर्यां प्रेयसी वा विधत्ताम्। विहरतु विदितार्थो निर्विकल्पे समाधौ ननु भजनविधौ वा तुल्यमेतद्द्वयं स्यात्॥ प्रियतमा चाहे प्रेमोद्रेकमें अपने प्रियतमके वक्षःस्थलपर क्रीड़ा करे, चाहे सावधानीसे प्रियतमके पाद-पद्मकी सपर्या (सेवा) करे, उसके लिये सभी ठीक है। वैसे ही तत्त्वनिष्ठ चाहे अभेदभावसे समाधिमें निरत रहे, चाहे भेदभावसे भजनभावमें निरत रहे, उसके लिये दोनों ही शोभा देते हैं। फिर भी रसिकोंका कहना है— विश्वेश्वरोऽपि सुधिया गलितेऽपि भेदे भावेन भक्तिसहितेन समर्चनीयः। प्राणेश्वरश्चतुरया मिलितेऽपि चित्ते चैलाञ्चलव्यवहितेन निरीक्षणीयः॥ भगवान्‌के साथ भक्तका भेदभाव मिट जानेपर भी सुधीजनोंको भेदभावसे ही व्यवहारमें भगवान

१६२ भक्तिसुधा

श्रीकृष्ण आत्मरति हैं, अतः जबतक व्रजांगना रसात्मक श्रीकृष्णमय न हो जायँ, तबतक वे श्रीकृष्णरमणार्ह नहीं हो सकतीं, श्रीकृष्णांगसंस्पृष्ट वस्त्रोंके संसर्गसे व्रजांगनाओंके प्राकृतभावकी निवृत्ति एवं श्रीकृष्णभावकी प्राप्ति होती है। जैसे अभिव्यक्त अग्निके सम्बन्धसे अनभिव्यक्त अग्निवाले काष्ठमें भी अग्निकी व्यक्ति हो जाती है। अग्नि सर्वत्र व्यापक है, केवल प्राकट्यकी ही विशेषता होती है, उसी भाँति 'रसो वै सः', 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतिवचनोंके आधारपर यह प्रसिद्ध है कि रसात्मक ब्रह्मस्वरूप ही सब कुछ है। केवल अनाद्यनिर्वचनीयाविद्यामय नामरूपोंद्वारा वह तत्त्व आवृत रहता है। निरावरण रसात्मक ब्रह्म श्रीकृष्णके सम्बन्धसे सभी वस्तुएँ निरावरण रसात्मक श्रीकृष्णमय हो जाती हैं। बस, इस तरह श्रीकृष्णके स्पर्शसे व्रजांगनाओंके वस्त्र नियवरणस्वरूप हो गये, फिर उनके धारणसे व्रजांगनाओंमें भी रसात्मकता आ गयी। लोकमें भी प्रियसंसृष्ट पुष्पमाला, वस्त्र आदिको प्रेमी बड़े अनुरागसे हृदय एवं नयनोंमें लगाते हैं। श्रीकृष्ण-संसृष्ट वस्त्रको धारणकर व्रजांगनाएँ रसाक्रान्त हो उठीं। श्रीकृष्णबल पाकर लज्जा नेत्रोंद्वारा पुनः उनमें प्रविष्ट हुई। श्रीकृष्णने वस्त्र और अपने- आपको तो दे दिया, परंतु उनके मनको चुरा लिया। अतः प्रेष्ठ-संगमके लिये लालायित होकर वे व्रज न जा सकीं। परमानन्द रसात्मक श्रीकृष्णके सम्मिलन, संस्पर्श, सम्भोग तादात्म्यापत्तिके लिये जो न लालायित हो, उसका जीवन सचमुच व्यर्थ है। अस्तु, श्रीकृष्णने उन व्रजकुमारिकाओंके संकल्पको जान लिया कि इन्होंने मेरे ही पादस्पर्शकी कामनासे यह व्रत धारण किया है, फिर तो श्रीकृष्ण भक्त-परतन्त्र होकर गोपीकी प्रेम-रज्जुसे बँधकर दामोदर हो गये। प्रेम- पाशगृहीत होकर बोले—साध्वियो! आपलोगोंके संकल्पको मैंने जान लिया और मैंने उसका अनुमोदन किया, वह सफल होनेयोग्य है। मुझमें जिनके मन और बुद्धि निविष्ट हैं, उनकी कामनाएँ कामना न होकर केवल रसरूप ही होती हैं। जैसे भर्जित एवं क्वथित धानसे अंकुरकी उत्पत्ति नहीं होती, वैसे ही मद्विषयक काम संसारका हेतु नहीं बनता। हाँ! जैसे भर्जित वा क्वथित बीज विशिष्ट स्वादयुक्त होनेसे आस्वादनीय होता है, वैसे ही मद्विषयक काम रसात्मक होनेसे रसिकोंके लिये आस्वादनीय होता है। अस्तु, अब आपलोग व्रज जायें। जिस उद्देश्यसे आपलोगोंने आर्याकी अर्चना की है, वह इन रात्रियोंमें सफल होगी। 'मयेमा रंस्यथ क्षपाः।' यद्यपि कहा जाता है कि उसी क्षण श्रीव्रजांगनाओंका मनोरथ पूर्ण करना चाहिये था, परंतु गम्भीरतासे विचार करें तो विदित होगा कि पूर्वकथनानुसार आत्मरति भगवान्‌का रमण आत्मामें ही होता है। अतः व्रजांगनाओंमें जबतक पूर्ण रसात्मकता न होगी, तबतक उनमें रमण असम्भव है। भगवत्सम्मिलनकी उत्कट उत्कण्ठा ही भक्ति है जबसे प्राणी भगवान्‌का अर्चन-स्मरण आरम्भ करता है, तभीसे प्राणीका प्राकृतभाव नष्ट होने लगता है और भगवत्स्वरूपभूत अप्राकृत रसात्मकता आ जाती है। व्रजकुमारिकाएँ युगोंसे श्रीकृष्णप्राप्तिके लिये तप, जप, ध्यान कर रही थीं। बहुत अंशोंमें उनका प्राकृतत्व नष्ट हो चुका था, अप्राकृत रसरूपता भी उनमें बहुत अंशोंमें आ गयी थी। तथापि अभी वह सब अपूर्ण ही था। भगवत्सम्मिलनकी उत्कट उत्कण्ठा और ध्यानमय सम्मिलन-परिरम्भणादिजन्य रसके आस्वादनसे रसमय देहेन्द्रिय, मन और बुद्धिकी पुष्टि होती है। वियोगजन्य दुःखके तीव्र तापसे देहेन्द्रिय, मन और बुद्धि आदिका दाह होता है, परंतु उत्कण्ठा और वियोग भी उस वस्तुमें नहीं होता, जिसका मिलना ही असम्भव है। अति सुलभ पदार्थमें भी उत्कण्ठा नहीं होती और अति दुर्लभमें भी असम्भव बुद्धिसे प्रीतिकी कमी होती है। जिन्हें साम्राज्य आदिका मिलना असम्भव

प्रतीत होता है, उनकी उधर उत्कण्ठा या प्रयत्न कुछ नहीं होता। एक दीन-हीन भिक्षुकीको सम्राट्का सम्मिलन असम्भव है, अतः उसे उसकी उत्कण्ठा भी नहीं होती। जीव भी अपनेको कर्ता, भोक्ता, सुखी, दुःखी और महापापी समझकर तथा भगवान्‌को अनन्त- ब्रह्माण्डनायक समझकर उनसे अपना मिलना असम्भव समझे तो न उसे सम्मिलनकी उत्कण्ठा होती है और न वह उत्कट प्रयत्न ही करता है। इसीलिये भगवत्सम्मिलनसे वंचित रहता है। भगवत्सम्मिलनकी उत्कट उत्कण्ठा ही भक्ति है। भक्ति हुई कि भगवान्‌का सम्मिलन हुआ। इसीलिये भगवती श्रुति भगवान्‌की चिदानन्द रसमयी जीव शक्तियोंको भगवत्सम्मिलनकी सुलभता दिखलाती है—‘द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।’ (श्वेताश्वत० ४।६) तुम दोनों सुपर्ण हो, तुम दोनोंका स्वाभाविक सख्य है, तुम दोनों सदा सम्बन्धित और एक ही स्थानमें रहते हो। तुम भगवान्‌के हो, भगवान् तुम्हारे हैं। भगवान् तुम्हारे सम्मिलनकी प्रतीक्षामें हैं। तुम श्रद्धा- भक्तिसे एक बार भगवान्‌के मंगलमय नामका उच्चारण करो, समस्त पाप-तापसे मुक्त होकर भगवत्प्राप्तिके योग्य हो जाओगे। इस तरह चिदानन्दमयी जीव-शक्तियोंको प्रभुमिलनकी सम्भावना, उत्कण्ठा, उत्सुकता होती है। जब कभी सुलभ समझकर असावधानी होने लगती है, तब ‘दूरात्सुदूरे’ कहकर उसकी दुर्लभता भी बतायी जाती है। जप, तप और देवाराधनादिद्वारा जीवशक्तिको शुद्ध जिज्ञासा तथा प्रेप्सा होती है। श्रीव्रजांगनाओंको भी कात्यायनीसमर्चनद्वारा वर प्राप्त करके भगवत्सम्मिलनकी सम्भावना और उत्कट उत्कण्ठा हुई, परंतु फिर भी अभी उत्सुकता और उत्कण्ठाकी अपेक्षा है। इसीलिये भगवान् अभी कुछ अवधिका निर्देश कर रहे हैं। परम बुभुक्षुके सन्मुख जिस समय मधुर मनोहर पक्वान्न उपस्थित हो और उसके सम्मिलनकी सम्भावना हो गयी हो तो फिर उत्सुकताका ठिकाना नहीं रहता। व्रजांगनाओंको श्रीकृष्णांगसंसृष्ट-वस्त्रद्वारा श्रीकृष्णांग-संस्पर्शका रसास्वाद होनेसे अधिकाधिक आकर्षण हुआ। किसी भी रसका जबतक अनुभव न हो, तबतक उधर आकर्षण नहीं होता। यही स्थिति ब्रह्मरसकी है। श्रीनारदजीको भी जब एक क्षणके लिये भगवत्स्वरूपके माधुर्यका अनुभव हुआ, तब उन्हें एक विचित्र लालसा हुई। ध्यायस्तच्चरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा। औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।६।१७) फिर अनेकशः प्रार्थना करनेपर भी भगवान्‌ने यही कहा कि—‘सकृद् यद् दर्शितं रूपमेतत्कामाय तेऽनघ।’ (श्रीमद्भा० १।६।२३) एक बार तुम्हें स्वरूप-माधुर्यका अनुभव कराया। यह केवल उत्कट कामनाके लिये। उत्कट कामनासे ही प्राणी समस्त पाप-तापोंको नष्ट कर देता है। इसीलिये भावुकोंने कहा है— न वै जनो जातु कथंचनाव्रजे- न्मुकुन्दसेव्यन्वयदङ्ग संसृतिम्। स्मरन्मुकुन्दाङ्घ्र्युपगूहनं पुन- र्विहातुमिच्छेन्न रसग्रहो यतः॥ (श्रीमद्भा० १।५।१९) मुकुन्दसेवी औरोंके समान कभी संसृतिमें नहीं पड़ता, किंतु वह मुकुन्दके श्रीचरणका उपगूहन (आलिंगन) करता हुआ, उसके सुस्पर्श सौगन्ध्यामृत रसका आस्वादन करता हुआ उसे कभी छोड़ना नहीं चाहता। अस्तु, श्रीव्रजांगनाओंको श्रीकृष्णके श्रीअंग एवं अमृतमय मुखचन्द्रिकाका दर्शन हुआ। उनके वचनामृत, हास-परिहासका आस्वादन हुआ एवं वस्त्रद्वारा परम्परया श्रीकृष्णांगका संस्पर्श भी हुआ, अतः सर्वात्मना श्रीकृष्णकी ओर उनका आकर्षण हुआ और वरप्राप्तिसे श्रीकृष्णका पूर्ण संस्पर्श हो सकेगा, यह भी सम्भव हो गया।

अब उनकी उत्सुकता और उत्कण्ठा उन्हें क्षण-क्षणको युगके या कल्पके समान प्रतीत कराने लगी। अब एक-एक क्षणका विलम्ब उनके लिये असह्य हो गया। एक-एक क्षणके वियोगजन्य तीव्र तापसे उनके अविद्या, काम, कर्म, हृदय-ग्रन्थि, किं बहुना गुणमय पाँचों कोश जलने लगे और क्षणिक सम्मिलनकल्पनाजन्य लोकोत्तर सुखसे रसमय स्वरूप परिपुष्ट होने लगा। जब यह कार्य पूर्ण हो जायगा, तब रासके लिये वेणुगीतपीयूषसे उनका आकर्षण करके उनके साथ विलासादि रमण होगा। कुछ ऐसी भी व्रजांगनाएँ थीं कि जिनके प्राकृत पंचकोशों और रसात्मक स्वरूपका दाह तबतक भी नहीं हुआ था। जब कृष्णका वेणुनाद सुनकर वे श्रीमद्वृन्दारण्यधामकी ओर चलीं, तब उनके पिता, भ्राता और पति आदिने उन्हें रोककर उन्हें गृहमें बन्द कर दिया। जब वे किसी तरह निकल न सकीं तो वहाँ ही नेत्र मींचकर श्रीकृष्णका ध्यान करने लगीं। दु

करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि आपलोग इन रात्रियोंमें रमण करना। अनन्त, अखण्ड और ब्राह्मारसका सम्भोग परिच्छिन्न रात्रियोंमें नहीं हो सकता। अतः एक ही प्रहर-चतुष्टयवती रात्रिमें अनन्त कोटि दिव्य ब्राह्मी रात्रियोंका निवेश करके यह रासलीला श्रीकृष्ण- रमण-सम्पन्न होती है। विलक्षण व्रजांगनाओंकी श्रीकृष्ण-रसदात्री वह रात्रि परम रसमयी है। रासपंचाध्यायीके प्रारम्भमें ही इनका स्मरण किया गया है— भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः। वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१) श्रीकृष्ण, उनकी लीलाएँ, लीलाओंका काल और धाम सब भगवत्स्वरूप ही होते हैं। इसीलिये— 'इमाः, ताः' आदि पदोंसे उनकी विलक्षणता, तत्पदार्थता आदि जानी जाती है। बस, इस तरह श्रीकृष्णसे वर पाकर भगवान्के आज्ञानुसार व्रजांगनाएँ भगवान्के चरणाम्भोजका चिन्तन करती हुई बड़ी कृच्छ्रता (कष्ट)-के साथ व्रज गयीं। तास्तथावनता दृष्ट्वा भगवान् देवकीसुतः। वासांसि ताभ्यः प्रायच्छत् करुणस्तेन तोषितः ॥ दृढं प्रलब्धास्त्रपया च हापिताः प्रस्तोभिताः क्रीडनवच्च कारिताः। वस्त्राणि चैवापहृतान्यथाप्यमुं ता नाभ्यसूयन् प्रियसङ्गनिर्वृताः ॥ परिधाय स्ववासांसि प्रेष्ठसङ्गमसज्जिताः। गृहीतचित्ता नो चेलुस्तस्मिँल्लज्जायितेक्षणाः ॥ तासां विज्ञाय भगवान् स्वपादस्पर्शकाम्यया। धृतव्रतानां संकल्पमाह दामोदरोऽबलाः ॥ संकल्पो विदितः साध्व्यो भवतीनां मदर्चनम्। मयानुमोदितः सोऽसौ सत्यो भवितुमर्हति ॥ न मय्यावेशितधियां कामः कामाय कल्पते। भर्जिता क्वथिता धाना प्रायो बीजाय नेष्यते ॥ याताबला व्रजं सिद्धा मयेमा रंस्यथ क्षपाः। यदुद्दिश्य व्रतंमिदं चेरुरार्यार्चनं सतीः ॥ श्रीशुक उवाच इत्यादिष्टा भगवता लब्धकामाः कुमारिकाः। ध्यायन्त्यस्तत्पदाम्भोजं कृच्छ्रान्निर्विविशुर्व्रजम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।२२।२१-२८) श्रीकृष्णलीला कृष्णके लिये ही है, किसी दूसरेके लिये नहीं अतएव जैसे सर्वभुक् अग्निके समान कोई सर्वभक्षी नहीं हो सकता, रुद्रके समान कालकूटभोजी नहीं हो सकता, कृष्णके समान गोवर्धन नहीं उठा सकता, वैसे ही चीरहरण और रासलीलाका भी आचरण कोई नहीं कर सकता। यदि मूढ़तासे कोई करेगा तो अवश्य ही उसका सर्वनाश हो जायगा। शास्त्रविरुद्ध श्रेष्ठोंके आचरणोंका अनुकरण कदापि नहीं करना चाहिये। अतएव श्रुतिने कहा है— 'यान्यनवद्यानि कर्माणि। तानि सेवितव्यानि। नो इतराणि।' (तैत्तिरीय० १।११) वही कार्य किसीके लिये अदोषवह होता है, किसीके लिये शास्त्रविरुद्ध एवं सावद्य होता है। ऋषभदेवके लिये अवधूतचर्या ठीक ही है, परंतु औरोंके लिये वही अनुचित है। वैसे ही कृष्ण-लीला कृष्णके ही लिये है, दूसरोंके लिये नहीं। दूसरे तो यही शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं कि ओह! श्रीकृष्ण ऐसी परम सुन्दरी स्वाधीन नग्न व्रजबाललाओंके दर्शनसे निर्विकार एवं अक्षुब्धमनस्क रहे, ऐसे ही दृढ़ ब्रह्मचर्य और मनकी स्थिरता और एकाग्रता बनानी चाहिये।

१६६ भक्तिसुधा व्रजभूमि व्रजभूमिका अद्भुत वैभव श्रीव्रजराजकिशोरके प्रेममें विभोर भावुकोंका सर्वस्व श्रीव्रजतत्त्व अपार, महामहिम, वैभवशाली तथा प्रकृति-प्राकृतप्रपंचातीत है। साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द वृन्दावनचन्द्रके ध्वज-वज्रांकुशादियुक्त, परमपावन, योगीन्द्र-मुनीन्द्र-ब्रह्मरुद्रेन्द्रादिवन्द्य पादार- विन्दसे अंकित व्रजतत्त्वके सम्बन्धसे भूमिने अपनेको परम सौभाग्यशालिनी समझा है। अहो! जिसके कृपा-कटाक्षकी प्रतीक्षा ब्रह्मेन्द्रादि देवाधिदेव भी करते रहते हैं, वह वैकुण्ठाधिष्ठात्री सर्वसेव्या महालक्ष्मी ही जहाँ सेविका बनकर रहनेके लिये लालायित है, उस सर्वोच्च-विराजमान व्रजभूमिके अद्भुत वैभवका कौन वर्णन कर सकता है ? परमाराध्यचरण श्रीव्रजदेवियोंने वृन्दावन-नव- युवराज नन्दनन्दनके प्रादुर्भावसे व्रजकी सर्वाधिक विजय बतलायी है— जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि। (श्रीमद्भा० १०।३१।१) लोक और वेदसे अतीत दिव्यप्रेमवती व्रज- युवतीजन वहाँ प्राणपणसे अपने प्राणनाथ प्रियतम परमप्रेमास्पदके अन्वेषणमें प्रेमोन्मादसे उन्मत्त होकर इधर-उधर डोल रही हैं। लोक तथा वेदमें यह प्रसिद्ध ही है कि 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' (बृहदारण्यक० २।४।५) अर्थात् संसारभरकी समस्त वस्तुएँ स्वात्म-सम्बन्धसे ही प्रेमास्पद होती हैं। स्वदेह, स्वपुत्र, स्वकलत्र एवं गेह-ग्राम-नगर-राष्ट्र, यहाँतक कि इष्ट देवता भी स्वात्म-सम्बन्धी ही प्रिय होते हैं। परमात्माके स्वरूपान्तरोंमें भी वैसा प्रेम नहीं होता, जैसा स्वात्म-सम्बन्धी इष्टदेवमें होता है। जब शर्करादि मधुर पदार्थोंके सम्बन्धसे अमधुर चूर्णादि भी मधुर प्रतीत होते हैं, तब शर्करादि स्वयं निरतिशय माधुर्यसे सम्पन्न हों—यह बात जैसे निर्विवाद सिद्ध है, वैसे ही जिस स्वात्मतत्त्वके सम्बन्धसे अनात्मा भी प्रेमास्पद होता है, वह स्वात्मतत्त्व स्वयं निरतिशय निरुपाधिक प्रेमका आस्पद है—यह बात भी निर्विवाद सिद्ध है; परंतु ये व्रजसीमन्तिनियाँ तो अपने जीवनधन अशेषशेखर नट-नागरके लिये ही अपने स्वात्मासे भी प्रेम करती हैं। उनका भाव है कि 'हे दयित ! हे चपल ! आपके सुखके लिये ही हम इन प्राणोंको धारण करती हैं। हृदयेश्वर ! यदि यह देह, प्राण, आत्मादि आपके उपयोगमें न आयें तो ये किस कामके ? हमलोग तो आपके लिये ही इन सौन्दर्य-माधुर्य-सौगन्ध्य-सौकुमार्य आदि गुणोंकी रक्षा करती हैं। हे प्राणवल्लभ ! नन्दलाल ! समस्त सौख्यजात तथा तच्छेषी आत्मा—ये सभी आपके लोकोत्तर मनोहर मन्दहास-माधुर्य-सुधासिन्धुपर न्योछावर हैं। किंवा, पादारविन्दगत नखमणि-ज्योत्स्नापर राई-नोनके समान वारनेयोग्य हैं।' धन्य है वह मंगलमय व्रजधाम, जो ऐसी व्रजराजकुमार-प्रेयसी व्रजदेवियोंके पादपद्मसे समलंकृत है; जहाँ नयनाभिराम घनश्याम मनमोहनकी मोहिनी मुरलिकाकी मधुर ध्वनिसे त्रिलोकीके चराचर चकित हो रहे हैं; जहाँ श्रीकृष्णचन्द्र-मुख-पंकज-निर्गत वेणुगीत-पीयूषसे पाषाण द्रवीभूत होकर बह चले तथा प्रेमार्त होकर कलिन्द-नन्दिनी महेन्द्र-नीलमणिके सदृश घनीभूत हो गयी; जहाँ गौएँ छविधाम घनश्यामके परम कमनीय माधुर्यका अनिमीलित नयन-पुटोंसे अधैर्यके साथ पान कर रही हैं और श्रोत्रपुटोंसे वेणुगीत-पीयूषका आस्वादन कर रही हैं; जहाँ प्रेमविभोर वत्सवृन्द सुतवत्सला जननीके प्रेमप्रसूत स्तन्यामृत-पानके लिये प्रवृत्त हुए; परंतु वंशी-निनाद- मन्त्रसे मुग्ध हो गये और उनके मुखसे दुग्ध बाहर गिरने लगा, अन्दर ले जानेकी क्रियाको वे भूल गये; जहाँकि मृग-विहंग भी विविध प्रकारके उपचारोंसे प्रियतमकी प्रसन्नताके लिये व्यग्र हैं।

जिस परम-पावन धाममें तरु-लता-गुल्मादि भी वेणुछिद्र-निर्गत शब्द-ब्रह्मरूपमें परिणत भगवदीय अधर-सुधाका पानकर कुड्मल-पुष्प-स्तबकादिरूप रोमांचोद्गम छद्मसे तथा मधुधारारूप हर्षाश्रुविमोकसे अपने दुरन्त भावका व्यक्तीकरण कर रहे हैं; जिस धाममें प्रेमातिशयसे प्रभु-पादपद्मांकित ब्रजभूमिगत ब्रह्मादिवन्द्यरजके स्पर्शके लिये आज भी समस्त तरु- लताएँ विनम्र हो रही हैं अथवा मनमोहनके दिये हुए निर्भर प्रेमके भारसे ही विनम्र हो रही हैं; जिस ब्रजकी प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक परमाणु बलपूर्वक जीवन-धनकी स्मृति उत्पन्नकर प्रियतमके सम्मिलनकी उत्कण्ठाको उत्तेजित करते हैं, जिस ब्रजमें निवास करनेवाले सौभाग्यशाली महापुरुष-धौरेयोंके ऋणी अनन्तकोटि- ब्रह्माण्डनायकको भी होना पड़ा, उस ब्रजका महत्त्व किन शब्दोंमें, किस लेखनीद्वारा व्यक्त किया जाय ? सत्यलोकपति ब्रह्माने कहा कि 'हे नाथ! आप इन लोकोत्तरसौभाग्यशाली ब्रजवासियोंको क्या देकर उनसे उऋण होंगे ?' इस बातको सोचता हुआ मेरा मन निश्चय करनेमें असमर्थ हो व्यामोहको प्राप्त होता है। प्रभुने कहा— 'ब्रह्मन्! मैं अनन्तकोटि-ब्रह्माण्ड- नायक हूँ। मेरे पास दिव्यातिदिव्य अनन्त वस्तुएँ हैं, जिन्हें देकर मैं इनके ऋणसे उन्मुक्त हो सकता हूँ। फिर तुम्हें ऐसा व्यामोह क्यों ?' इसपर ब्रह्माने कहा— 'प्रभो! इन अनन्तानन्त दिव्य वस्तुओंके प्रदानसे आप इन घोष-निवासियोंसे उऋण नहीं हो सकते; क्योंकि अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत सब दिव्यातिदिव्य तत्त्व तो केवल सुखके अभिव्यंजक होनेसे ही उपादेय हो सकते हैं, पर उन अनन्तकोटि- ब्रह्माण्डगत व्यक्त सौख्य-बिन्दुके परम उद्गम-स्थल अचिन्त्यानन्त-सौख्यसिन्धु आप ही हैं। फिर भला जिनके प्रांगणमें साक्षात् अनन्त परमानन्दसुधासिन्धु ही कन्दर्पकामित परम कमनीय कान्तिमय मूर्तिमान् धूलि- धूसरित होकर विहरण करे और रसिकेन्द्रवर्ग नन्दप्रांगणमें जिस अप्रमेय सबाह्याभ्यन्तर तत्त्वको उलूखल-निबद्ध दारुयन्त्रवत् व्रजसीमन्तिनी-वर्ग-विधेय बतलाते हैं, उन्हें तुषार-बिन्दु-स्थानीय सौख्याभिव्यंजक वस्तुके प्रदानसे आप कैसे प्रसन्न कर सकते हैं? जैसे कृतसंज्ञक चतुरंक द्यूतके विजित होनेपर त्र्यंक-द्व्यंक- एकांक द्यूत भी उसके अन्तर्भूत हो जाते हैं, किंवा सर्वतः संप्लुतोदकस्थानीय महासमुद्रको प्राप्त कर लेनेपर वापी-कूप-तड़ागादिगत जलकी अपेक्षा नहीं रह जाती, वैसे ही सौख्य-सुधानिधि सर्वफलात्मास्वरूप प्रभुके स्वायत्त होनेपर फल्गु फलोंकी अपेक्षा कौन विवेकी कर सकता है ? अतः हे गोपालचूड़ामणे! आप व्रजनिवासी वर्गके ऋणसे कैसे उन्मुक्त हो सकते हैं ?' चतुर-चूड़ामणि ब्रजवन-नवयुवराज बोले— 'ब्रह्मन्! तब तो मैं स्वात्मसमर्पणद्वारा इनके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा। जब मैं ही सर्वफलात्मा हूँ तो मैं इनको स्वात्म-समर्पणसे भी प्रसन्न कर सकता हूँ।' ब्रह्माजीने कहा— 'नाथ! वह स्वात्म-समर्पण तो आपने सर्वफल-समर्हणीय श्रीचरणोंकी जिघांसासे विषलिप्त-स्तन्यपान करानेवाली द्वेषवती उस पूतनाके लिये भी किया है। आप यदि यह कहें कि कुल- कुटुम्बसमेत व्रजवासियोंको स्वात्म-समर्पणकर उऋण हो सकूँगा तो भी ठीक नहीं; क्योंकि पूतनाका भी कोई कुलकुटुम्ब आपकी प्राप्तिसे वंचित नहीं रहा। भला, जब आपका स्वात्म-समर्पण इतना सस्ता है कि बालघ्नी पूतनाको भी आपने स्वात्म प्रदान कर दिया, तब जो धरा-धन-धाम-सुहृत्-प्रिय तनय तथा आत्माको भी आपके पादारविन्द-माधुर्यपर न्योछावर करनेवाले ब्रजवासी जन हैं, उनसे आप स्वात्म- समर्पणमात्रसे कैसे उऋण हो सकते हैं ? यद्यपि कहा जा सकता है कि बड़े-बड़े योगियोंको भी दुर्लभ स्वात्म-समर्पण उनके लिये पर्याप्त है, परंतु विज्ञजनोंकी दृष्टिमें ब्रजधाम-निवासियोंकी पदवी योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंको भी दुर्लभ है; क्योंकि यम-नियम-प्राणायाम- प्रत्याहारादि-द्वारा बाह्य-विषयोंसे मनको संयतकर योगीन्द्र अनुक्षण जिस तत्त्वके अनुसन्धानका प्रयत्न करते हैं, उसी तत्त्वमें इन व्रजवासियोंकी स्वारसिकी

१६८ भक्तिसुधा प्रीति है। राग यद्यपि प्राणियोंके निःसीम स्वात्मसौख्यका अपहरण करनेवाला होनेके कारण शत्रुवत् परिहार्य है; परंतु परम सौभाग्यशाली इन घोषनिवासियोँका राग तो प्रियतम—परम प्रेमास्पद आपके मंगलमय स्वरूपमें ही है। मोह भी प्राणियोंकी स्वाभाविकी स्वतन्त्रताका अपहरण करनेवाला होनेसे साक्षात् शृंखलारूप है; परंतु इनका तो मोह भी आपमें ही है। अतः इनके तो रागमोहादि दूषण भी भूषणरूप हैं। कारण भगवत्तत्त्व-व्यतिरिक्त प्रांपंचिक पदार्थविषयक ही रागादि त्याज्य हैं। भगवद्विषयक रागादिकी प्रेप्सा तो प्रत्येक प्रेक्षावान्को ही होती है। कथंचित् वैराग्यसे भी विराग हो सकता है, पर प्रेममय भगवान्से नहीं। तात्पर्य यह कि सर्वविषयक राग-त्यागसे यद्विषयक रागकी उत्कट प्रेप्सा सम्पादन की जाती है, तद्विषयक उत्कट राग- सम्पन्न इन घोषनिवासियोंके माहात्म्यकी एक कलाकी भी बराबरी कौन कर सकता है?' एषां घोषनिवासिनामुत भवान् किं देव रातेति न- श्चेतो विश्वफलात् फलं त्वदपरं कुत्राप्ययन्मुह्यति। सद्धेषादिव पूतनापि सकुला त्वामेव देवापिता यद्धामार्थसुहृत्प्रियात्मतनयप्राणाशयास्त्वत्कृते ॥ तावद् रागादयः स्तेनास्तावत् कारागृहं गृहम्। तावन्मोहोऽङ्घ्रिनिगडो यावत् कृष्ण न ते जनाः॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३५-३६) प्रभो! अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायक स्वयं आप जिनके ऋणी हैं, उन घोषनिवासियोंकी महिमाका कौन वर्णन करे। सत्यलोकाधिपति जगत्पितामह श्रीब्रह्माजी भी व्रजके रजःस्पर्शलाभार्थ व्रजवृन्दाटवीके तृण-गुल्मादिके रूपमें जन्म लेनेके सौभाग्यकी अभिलाषा रखते हैं। उनको आशा है कि यहाँके तृण-गुल्मादि होनेसे भी व्रजवासियोंके चरण-रजका अभिषेक उन्हें प्राप्त होगा। उस व्रजके अन्तर्गत भगवान्की अनेक लीला- भूमियाँ हैं, जो साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्रविषयिणी प्रीतिका उद्दीपन करनेवाली हैं। यमुना-पुलिन, गोवर्धनाद्रि, गह्वरवन, कदम्बखण्डियाँ, नन्दग्राम, बरसाना, चरणाद्रि आदि ऐसे-ऐसे मनोहर स्थान हैं, जहाँकि परमाणु- परमाणुमें श्रीकृष्ण-प्रीतिका संचार करनेकी अद्भुत शक्ति देखी जाती है। वज्र-सदृश कठोर चित्त भी वहाँ हठात् द्रवीभूत हो जाता है। श्रीवृन्दावन-धाम तो व्रजभूमिका सर्वस्व है। श्रीव्रजभक्तोंकी पद-पंकज-रजके संस्पर्श-लोभसे, 'नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनः' (श्रीमद्भा० ३।४।३१)- के अनुसार, साक्षात् श्रीकृष्णसे भी अन्यून महाभागवत उद्धव भी वृन्दावन-धामके तृण-गुल्मादि होनेकी स्पृहा प्रकट करते हैं— आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्। (श्रीमद्भा० १०।४७।६१) श्रीमत्प्रबोधानन्दसरस्वतीप्रभृति महानुभाव तो वृन्दावनधामबहिर्भूत अनन्त चिन्तामणियोंकी ही नहीं वरं च श्रीहरिकी भी उपेक्षा करनेकी सलाह देते हैं— मिलन्तु चिन्तामणिकोटिकोटयः स्वयं हरिर्द्वारमुपैतु सत्वरः। 'विपिन-राज सीमाके बाहर हरिहूँको न निहारौं' आदि। वेदान्तवेद्य परिपूर्ण सच्चिदानन्दघन परब्रह्म निरतिशय होनेके कारण, तारतम्यविहीन होनेपर भी वृन्दावनधाममें जैसा मधुर अनुभूयमान होता है, वैसा और स्थलोंमें नहीं। अतएव भावुकोंने— 'व्रजे वने निकुञ्जे च श्रेष्ठ्यमत्रोत्तरोत्तरम्।' —के अनुसार द्वारकास्थ, मथुरास्थ श्रीकृष्ण- व्यतिरिक्त श्रीकृष्णमें भी व्रजस्थ-वृन्दावनस्थ-निकुंजस्थ भेदसे तारतम्य स्वीकृत किया है। अभिप्राय यह है कि जैसे एक ही प्रकारका स्वातिबिन्दु स्थलवैचित्र्यसे विचित्र परिणामवाला होता है, शुक्तिकामें पड़कर मोतीके रूपसे, बाँसमें वंशलोचनरूपसे, गोकर्णमें गोरोचनरूपसे तथा गजकर्णमें गजमुक्तारूपसे परिणत होता है, वैसे ही वेदान्तवेद्य तत्त्व एकरूप होता हुआ भी अभिव्यंजक स्थलकी स्वच्छताके तारतम्यसे तथा अभिव्यक्ति-तारतम्य होनेसे तारतम्योपेत होता है।

ब्रजभूमि १६९ जैसे सूर्यतत्त्वकी अभिव्यक्ति काष्ठ-कुड्य आदि अस्वच्छ पदार्थोंपर वैसी नहीं होती, जैसी निर्मल जल, काँच आदिपर होती है, वैसे ही राजस-तामस स्थलोंमें ब्रह्मतत्त्वकी अभिव्यक्ति वैसी नहीं हो सकती, जैसी निर्मल विशुद्ध स्थलोंमें। यह निर्मलता जैसे पार्थिव-प्रपंचमें स्पष्ट अनुभूयमान है, वैसे ही त्रिगुणात्मक प्रपंचमें गुण- विमर्द-वैचित्र्यसे क्वचित् प्रत्यक्षानुमानद्वारा, क्वचित् आगम तथा श्रुतार्थापत्तिद्वारा तारतम्योपेत होकर ज्ञात होती है। इसीलिये किसी स्थलमें जानेसे वहाँ अकस्मात् चित्तप्रसाद और किसी स्थलमें चित्तक्षोभ आदि चिह्नोंद्वारा भी स्थल-वैचित्र्यकी अनुभूति होती है। व्रजवन-निकुंजोंमें क्रमशः एककी अपेक्षा दूसरेमें वैचित्र्य है। अतएव वहाँ पूर्ण-पूर्णतर-पूर्णतमरूपसे एक ही श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका प्राकट्य होता है। तीर्थोंकी यह विशेषता प्रत्यक्ष है कि जिस तीर्थमें जितनी अद्भुत सात्त्विकता एवं शक्ति है, वहाँ उतनी ही सरलतासे प्रभुकी विशेषताकी अनुभूति होती है। परंतु जैसे कामिनीका रूप कामुकोंपर ही प्रभावकारी होता है और सर्प-व्याघ्रादि-दर्शनसे अधिक उद्वेग भीरुको ही होता है, वैसे ही सात्त्विक तथा भगवत्परायणको तीर्थगत विलक्षण शक्तियाँ प्रभावान्वित करती हैं, यद्यपि वैसे कुछ-न-कुछ प्रभाव तो सभी तरहके पुरुषोंपर होता है तथापि वह व्यक्त नहीं होता; परंतु श्रुतार्थापत्तिद्वारा तीर्थोंमें शक्ति-वैलक्षण्य अवश्य ज्ञात है। भावुकोंने व्रजतत्त्वको हिततम वेदवेद्य प्रेमतत्त्वका स्वरूप अर्थात् शरीर ही माना है। प्रेमतत्त्वके व्रजधाम- स्वरूप देहमें श्रीव्रजनवयुवतिजन इन्द्रियरूपिणी हैं। मनःस्वरूप रसिकेन्द्रवर्गमूर्धन्यमणि श्रीव्रजराजकिशोर हैं तथा प्राणरूपा-प्रज्ञाके स्थानमें श्रीव्रजनवयुवति- कदम्ब-मुकुटमणि कीर्तिकुमारी श्रीराधा हैं। यहाँ— इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ (गीता ३।४२) —इस वचनके अनुसार जैसे देह इन्द्रियोंके, इन्द्रियाँ मनके और मन प्राणरूपा प्रज्ञाके परतन्त्र होता है (यहाँपर 'यो वै प्राणः सा प्रज्ञा' (कौषीतकि- ब्राह्मणोपनिषद् ३।४) इस श्रुति-वाक्यके अनुसार क्रिया-शक्ति-प्रधान प्राण और ज्ञानशक्ति-प्रधान प्रज्ञाका ऐक्य विवक्षित है) एवं पूर्व-पूर्वका उत्तरोनरमें ही सम्मिलन होनेसे तद्रूपता ही होती है, उसी तरह व्रज श्रीकृष्णप्रेयसी व्रजांगनाओंसे विभूषित तथा उन्हींके अधीन है। व्रजवनिताजनका जीवन श्रीव्रजेन्द्रकुमार हैं तथा श्रीकृष्ण-हृदयकी अधीश्वरी प्राणाधिका राधिका हैं और वह केवल प्रेमसुधा-जलनिधिमें ही पर्यवसित होती हैं। प्रेममय व्रज प्रेमोद्रेकमें व्रजांगनारूप ही हो जाता है और व्रजांगनाएँ 'असावहं त्वित्यबलास्तदा- त्मिका' (श्रीमद्भा० १०।३०।३), 'कृष्णोऽहं पश्यत गतिम्' (श्रीमद्भा० १०।३०।१९) इत्यादि वचनोंके अनुसार श्रीकृष्ण-भावरस-भरिता होकर नन्दनन्दनस्वरूपा हो जाती हैं। रसिकशिरोमणि श्रीकृष्ण प्रेमोन्मादमें निजप्रेयसी श्रीवृषभानुनन्दिनी-स्वरूप हो जाते हैं तथा श्रीराधिका प्रेमस्वरूपमें ही साक्षात् अपने प्रियतमके साथ निमग्न होती हैं। इस प्रकार साक्षात् वेदान्तवेद्य परम-रसात्मक- सुधाजलनिधिके ही दिव्य-विकास-प्रेममय तत्त्व उसीमें पर्यवसित होते हैं। इसी तरह अनाद्यनन्त रससागरमें रसमय प्रिया-प्रियतम और उनके परिकरकी रसमयी लीलाका धाम अप्राकृत श्रीव्रज भी रसमय ही है। यद्यपि व्रजमें माधुर्य-शक्तिका प्राधान्य है तथापि क्वचित् ऐश्वर्य-शक्तिका भी विकास होता ही है; क्योंकि माधुर्य-शक्तिका ही अधिक आदर होनेपर भी ऐश्वर्य-शक्ति मूर्तिमती होकर प्रभुकी सेवा करनेके सुअवसरकी प्रतीक्षा करती रहती है। प्रभु भी उसका अत्यन्त तिरस्कार नहीं करते हैं। इसीसे मृद्भक्षण आदि लीलाओंमें मुखान्तर्गत ब्रह्माण्ड-प्रदर्शन आदि ऐश्वर्य- शक्तिके कार्य देखे जाते हैं। अतः विशुद्ध माधुर्य- भावका प्राकट्य श्रीवृन्दावनधाममें ही माना जाता है।

भावुकोंका कहना है कि अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत सौख्यबिन्दुओंका परम उद्गम-स्थान जो अनन्त सौख्य-सुधा-सिन्धु है, उसका मन्थन करनेपर सारसे भी सारभूत नवनीत-स्थानीय जो तत्त्व हो, उसका भी पुनः सहस्रधा-कोटिधा मन्थन करनेपर जो परम दिव्य-तत्त्व निःसृत हो, वही वृन्दावनधामका स्वरूप है। कारणरूप जो अक्षर-ब्रह्म है, वही व्यापी वैकुण्ठ वृन्दावन है। कार्य-कारणातीत वेदान्तके परम-तात्पर्यके विषयीभूत परमतत्त्व श्रीकृष्णके प्राकट्यका स्थल कारणात्मा अक्षर ही है। ‘पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥’ (ऋग्वेद १०।९०।३), ‘विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥’ (गीता १०।४२) इत्यादि श्रुति-स्मृतिके अनुसार मायाविशिष्ट कारणब्रह्म एकपाद है। उसके ऊपर त्रिपाद्विभूति अमृत है। जो महानुभाव वेदान्त-वेद्य, कार्य-कारणातीत परमतत्त्वको ही वृन्दावन मानते हैं, उनके सिद्धान्तमें वहाँका निवासी कृष्ण-तत्त्व अवैदिक ही होगा। इतना ही कहना पर्याप्त है; क्योंकि एकहीमें आश्रयाश्रयित्व असम्भव है। ‘अव्याकृतमनन्ताख्यमासनं यदधिष्ठितः।’ (श्रीमद्भा० १२।११।१३) इस उक्तिके अनुसार भी अनन्तसंज्ञक अव्याकृत ही भगवान्‌का आसन है। उन्हींका नाम शेष भी है। ‘शिष्यते अवशिष्यते इति शेषः’ अर्थात् जो अवशिष्ट रहे, वही शेष कहा जाता है। कार्यके प्रलयानन्तर कारण ही शेष रहता है। उसका कोई कारणान्तर नहीं है, जिसमें उसका प्रलय हो। कारण सप्रपंच है। निष्प्रपंच ब्रह्मका वही निवासस्थल है। ‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्’ (गीता १४।२७) इस भगवदुक्तिके अनुसार सगुण कारण- ब्रह्मकी, एकपादस्थानीयकी प्रतिष्ठा ‘त्रिपादूर्ध्व उदैत्’ (ऋग्वेद १०।९०।४) ऊर्ध्व अर्थात् कार्य- कारणानन्तर्भूत ब्रह्म परमात्मा ही है। किन्हीं महानुभावोंके सिद्धान्तमें यह प्रकट वृन्दावन ही अक्षर ब्रह्मव्यापी वैकुण्ठ है; परंतु उसका वह स्वरूप अभावितान्तःकरण पुरुषको उपलब्ध नहीं होता है। अद्वैतसिद्धान्तमें समस्त प्रपंच ही ब्रह्मस्वरूप है, परंतु शास्त्राचार्योपदेशजन्य संस्कारोंसे संस्कृतान्तः- करण पुरुष-धौरेयको ही वह उपलब्ध होता है। इसीलिये अद्वैतसिद्धान्त-परिनिष्ठित प्रबोधानन्दसरस्वती तदनुसार ही श्रीवृन्दावनको सच्चिदानन्दमय बतलाते हुए लिखते हैं— यत्र प्रविष्टः सकलोऽपि जन्तुः आनन्दसच्चिद्घनतामुपैति । ‘जिस वृन्दावन-धाममें प्रविष्ट होते ही कीट- पतंगादि भी आनन्दसच्चिद्घनस्वरूप हो जाते हैं’; परंतु तादृशी प्रतीति तबतक नहीं होती, जबतक प्राकृत-संसर्गका बिलकुल अभाव नहीं होता। यद्यपि जीव स्वभावसे ही ‘चेतन अमल सहज सुखरासी’ (रा०च०मा० ७।११७।२) है; परंतु आविद्यिक अनात्मसंसर्गसे अनेकानेक अनर्थ-परिप्लुत प्रतिभासित होते हैं। अविद्याका विद्याद्वारा अपनयन होनेपर उनका स्वाभाविक स्वरूप व्यक्त होता है। अतएव कुछ लोग कहते हैं कि भगवान्‌की अभिव्यक्तिका स्थल ही वृन्दावन है। भगवदाकारसे आकारित वृत्तिपर भगवत्तत्त्वका प्राकट्य होता है, उसे भी वृन्दावन कहते हैं। इस तरह साभास अव्याकृत एवं साभास चरमावृत्तिको भी वृन्दावन कहते हैं। इसीलिये जो महानुभाव वृन्दावनके उपासक होते हुए भी प्रसिद्ध वृन्दावनमें प्रारब्धवश नहीं रह पाते, वे भी व्यापी वैकुण्ठ, कारण-तत्त्व-स्वरूप ब्रह्मके व्यापक होनेसे तत्स्वरूप वृन्दावनका प्राकट्य शक्ति-बलसे कहीं भी रहकर सम्पादन करते हैं। नित्य-निकुंजकी श्रीवृन्दावनसे भी अधिक रसमयता भावुकोंकी दृष्टिमें नित्य-निकुंज श्रीवृन्दावनसे भी अन्तरंग समझा जाता है। नित्य-निकुंजमें वृषभानुनन्दिनी-स्वरूप महाभाव-परिवेष्टित शृंगार- स्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द नित्य ही रसाक्रान्त

रहते हैं। यहाँ प्रिया-प्रियतमका सार्वदिक् सर्वांगीण सम्पयोगका भान भी सर्वदा ही रहता है। जैसे कि सन्निपातज्वरसे आक्रान्त पुरुष जिस समय शीतल मधुर जलका पान करता है; ठीक उसी समयमें पूर्ण तीव्र पिपासाका भी अनुभव करता है, वैसे ही नित्य निकुंज-धाममें जिस समय प्रिया-प्रियतम पारस्परिक परिरम्भणजन्य रसमें निमग्न होते हैं, उसी कालमें तीव्रातितीव्र वियोग-जन्य तापका भी अनुभव करते हैं। सारस-पत्नी लक्ष्मणा केवल सम्प्रयोगजन्य रसका ही अनुभव करती है और चक्रवाकी विप्रयोगजन्य तीव्र-तापके अनन्तर सहृदय-हृदय-वेद्य सम्प्रयोगजन्य अनुपम रसका आस्वादन करती है; परंतु वह भी विप्रयोग- कालमें सम्प्रयोगजन्य रसास्वादनसे वंचित रहती है; किंतु नित्य-निकुंजमें श्रीनिकुंजेश्वरीको अपने प्रियतम परमप्रेमास्पद श्रीब्रजराजकिशोरके साथ सारस-पत्नी लक्ष्मणाकी अपेक्षा शतकोटि-गुणित दिव्य सम्प्रयोग- जन्य रसकी अनुभूति होती है और साथ ही चक्रवाकीकी अपेक्षा शतकोटि-गुणित अधिक विप्रयोगजन्य तीव्र तापके अनुभवके अनन्तर पुनः दिव्य रसकी भी अनुभूति होती है। ऐसे ही विषयमें भावुकोंने कहा है— मिलेइ रहें मानों कबहुँ मिले ना। —जैसे भावुकोंके भावना-राज्यवाले शून्य निकुंजमें ही प्रियतम संकेतित समयमें पधारते हैं, किसी अन्यके सान्निध्यमें नहीं, वैसे ही वेदान्तियोंके यहाँ भी भगवान्‌से व्यतिरिक्त जो सब दृश्यपदार्थ हैं, उनके संसर्गसे शून्य निर्वृत्तिक और निर्मल अन्तःकरणमें ही 'तत्पदार्थ' का प्राकट्य होता है। जैसे सर्व-व्यापारोंसे रहित होकर पूर्ण प्रतीक्षा ही प्रियतमके संगमका असाधारण हेतु है, वैसे ही वेदान्तियोंके यहाँ भी पूर्ण प्रतीक्षा अर्थात् कायिकी, मानसी आदि सर्व चेष्टाओंके निरोध होनेपर ही 'त्वं पदार्थ' को 'तत्पदार्थ' का संगम प्राप्त होता है। सर्व दृश्य-संसर्गशून्य निर्वृत्तिक निर्मल अन्तःकरणरूप निकुंजमें पूर्ण प्रतीक्षापरायण व्रजांगना-भावापन्न 'त्वं पदार्थ' श्रीकृष्णस्वरूप 'तत्पदार्थ' के साथ यथेष्ट तादात्म्य सम्बन्ध प्राप्त करता है। यही संक्षेपमें व्रजधामतत्त्व तथा उसका रहस्य है। श्रीरासलीलारहस्य श्रीरासपञ्चाध्यायीके वक्ता व्यास-पुत्र महाज्ञानी श्रीशुकदेवजी और श्रोता गर्भज्ञानी श्रीपरीक्षित्जीका माहात्म्य इस अपार संसार-समुद्रमें जिन लोगोंके मन निरन्तर गोते लगा रहे हैं, उन्हें सब प्रकारके दुःखोंसे मुक्तकर अपने परमानन्दमय स्वरूपकी प्राप्ति करानेके लिये अहैतुककरुणामय दीनवत्सल श्रीभगवान् ही स्वयं धर्मावबोधक वेदरूपमें अवतीर्ण होते हैं। जिस समय कालक्रमसे सर्वसाधारणके लिये वेदका तात्पर्य दुर्बोध हो जाता है, उस समय श्रीहरि ही पुराणादिरूपमें आविर्भूत होते हैं। पुराणोंका मुख्य प्रयोजन वेदार्थका निरूपण करना ही है। किंतु यह सब रहते हुए भी परस्पर मतभेद रहनेके कारण वेदार्थ-सम्बन्धी विरोधका निराकरण भगवान्‌की उपासनाके द्वारा शुद्ध हुए अन्तःकरणसे ही हो सकता है। जिन लोगोंकी विवेकदृष्टि पारस्परिक विवादके कारण नष्ट हो गयी है, उन्हें वेदार्थका बोध कराकर परम कल्याणकी प्राप्ति करानेके लिये ही श्रीमद्भागवतका प्रादुर्भाव हुआ है, जैसा कि कहा है— कृष्णे स्वधामोपगते धर्मज्ञानादिभिः सह ॥ कलौ नष्टदृशामेष पुराणार्कोऽधुनोदितः । (श्रीमद्भा० १।३।४३-४४) अर्थात् धर्म एवं ज्ञानादिके सहित भगवान्‌के स्वधाम सिधारनेपर जिन मनुष्योंकी दृष्टि कलियुगके कारण नष्ट हो गयी है, उनके लिये इस समय इस पुराणरूप सूर्यका उदय हुआ है। वस्तुतः यह ग्रन्थ

१७२ भक्तिसुधा वेदार्थ-विरोधकी निवृत्तिमें सूर्यके ही समान है। अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां सर्वोपनिषदामपि। गायत्रीभाष्यभूतोऽसौ ग्रन्थोऽष्टादशसंज्ञितः ॥ अर्थात् यह श्रीमद्भागवतपुराण ब्रह्मसूत्र और समस्त उपनिषदोंका तात्पर्य है तथा यह अष्टादशसंज्ञक ग्रन्थ गायत्रीका भाष्यस्वरूप है। प्राचीन आर्षग्रन्थोंमें श्रीमद्भागवत एक अत्यन्त देदीप्यमान उज्ज्वल ग्रन्थरत्न है। इसके दशम और एकादश स्कन्धोंमें परमानन्दघन लीलापुरुषोत्तम भगवान् कृष्णचन्द्रकी दिव्यातिदिव्य लीलाओंका वर्णन है। लीलाविहारी श्रीश्यामसुन्दर सर्वथा रसमय हैं। उनकी कोटि-कोटि कन्दर्प-कमनीय मनोहर मूर्ति भावुक भक्तोंके लिये जैसी मनोमोहिनी है, वैसी ही उनकी लीलाएँ भी हैं। यों तो भगवान्‌की सभी लीलाएँ लोकोत्तर आनन्दातिरेकका संचार करनेवाली हैं तथापि उनकी व्रजलीलाएँ तो महाभाग भक्तों एवं कविपुंगवोंका सर्वस्व ही हैं। उनमें भी, जिसका आविर्भाव एकमात्र रसाभिव्यक्तिके लिये ही हुआ था, वह महारास तो मानो सर्वथा माधुर्यका ही विलास था। प्रभुकी रासक्रीड़ा जैसी मधुर है, वैसी ही रहस्यमयी भी है। उसके भीतर जो गुह्यातिगुह्य रहस्य निहित है, वह आपाततः दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। वह इतना गूढ़ है कि उसमें जितना प्रवेश किया जाता है, उतना ही अधिकाधिक दुरवगाह्य प्रतीत होता है। हम यथामति उसका विचार करनेका प्रयत्न करते हैं। इस रासलीलाका वर्णन श्रीमद्भागवत दशम स्कन्धके अध्याय उनतीससे तैंतीसतक है। ये पाँच अध्याय 'रासपंचाध्यायी' के नामसे सुप्रसिद्ध हैं। ये श्रीमद्भागवतरूप कलेवरके मानो पाँच प्राण हैं अथवा यदि इन्हें श्रीमद्भागवतका हृदय कहा जाय तो भी अयुक्त न होगा। रासपंचाध्यायीके आरम्भमें 'श्रीबादरायणि- रुवाच' ऐसा पाठ है। इस पाठका भी एक विशेष अभिप्राय है। यहाँ 'बादरायणिः' शब्दसे वक्ताका महत्त्व द्योतितकर उसके द्वारा प्रतिपादन किये जानेवाले विषयकी महत्ता प्रदर्शित की गयी है। लौकिक नीतियोंके विषयमें तो प्रायः इस बातपर ध्यान नहीं दिया जाता कि उनका वक्ता कौन है; वहाँ केवल उस उक्तिकी महत्ताका ही विचार किया जाता है। 'ननु वक्तृविशेषनिःस्पृहा गुणगृह्या वचने विपश्चितः।' किंतु धार्मिक अंशोंमें यह नियम नहीं है। वहाँ तो वक्ताकी योग्यताका विचार सबसे पहले किया जाता है। जिस प्रकार गायत्री मन्त्र है, उसका अर्थ किसी भी भाषामें कितने ही सुन्दर ढंगसे कर दिया जाय तथापि जापककी उसमें श्रद्धा नहीं हो सकती और न मूल गायत्रीके जपसे होनेवाला महान् फल ही उससे प्राप्त हो सकता है। अतः धर्मके विषयमें मनुष्यको 'वक्तृविशेष-सस्पृह' होनेकी आवश्यकता है। यहाँ वक्ताके कथनकी अपेक्षा उसके व्यक्तित्वका प्रामाण्य ही अधिक अपेक्षित है। यदि देखा जाय तो लौकिक विषयोंमें भी यही नियम अधिक काम कर रहा है। हमें एक साधारण पुरुषकी ऊँची-से-ऊँची बात उतनी मूल्यवान् नहीं जान पड़ती, जितनी कि किसी गण्यमान्य व्यक्तिकी साधारण-सी बात जान पड़ती है। जिस पुरुषके प्रति हमारी श्रद्धा है, उसकी बहुत मामूली बातपर भी हम बहुत ध्यान देते हैं। इससे निश्चय होता है कि लौकिक विषयोंमें यद्यपि प्रायः 'वक्तृविशेषनिःस्पृहता' होती है; वहाँ बालकसे भी शुभ ज्ञान ग्रहण करने चाहिये—यही नीति काम करती है तथापि सर्वांशमें नहीं। कभी-कभी वक्ताकी आप्तताका मूल्य वहाँ भी बढ़ जाता है। यही बात वेदके विषयमें है। वेद बहुत युक्ति- युक्त अर्थको कहता है, इसीलिये वह माननीय हो— ऐसी बात नहीं है; बल्कि बात तो ऐसी है कि वेदका कथन होनेके कारण ही वेदार्थ माननीय है। चोर अच्छी बात कहे, तब भी उसमें आस्था नहीं हो सकती। अब हम प्रकृत विषयपर आते हैं। रासपंचाध्यायीके वक्ता श्रीबादरायणि हैं।

श्रीरासलीलारहस्य १७३ 'बदराणां समूहो बादरं नरनारायणाश्रमोऽयन- माश्रयो यस्य स बादरायणः तस्यापत्यं बादरायणिः।' 'बदर' बेरको कहते हैं, यहाँ उससे नरनारायणाश्रम उपलक्षित है। वही जिनका अयन-आश्रय-निवास- स्थान अर्थात् तपोभूमि है, वे भगवान् व्यासजी ही बादरायण हैं। उन्हींके पुत्र श्रीबादरायणि हैं। यहाँ भगवान् शुकदेवजीको जो 'बादरायणि' कहा गया है। उसका तात्पर्य यही है कि उनका महत्त्व अपने व्यक्तित्वके कारण ही नहीं है, बल्कि पिता और पिताकी निवासभूमिसे भी उनकी पवित्रता द्योतित होती है अर्थात् भगवान् श्रीशुकदेवजी स्वयं ही पवित्र हों, ऐसी बात नहीं है, उन्हें तो उनके पिताने परम- पवित्र बदरिकाश्रममें तप करके उस तपके फलस्वरूप ही प्राप्त किया था। बदरिकाश्रम ज्ञानभूमि है; अतः वहाँ जो तप होगा, वह भी अत्यन्त विलक्षण ही होगा। उसके फलस्वरूप श्रीभगवान् या भगवान्के परमान्तरंग निकुंजमन्दिरस्थ लीलाशुक ही श्रीशुकदेवरूपमें प्रादुर्भूत हुए हैं। भगवान् व्यासजीमें भी केवल तपसे ही तेज आया हो—ऐसी बात नहीं है, वे तो वेदार्थका निरूपण करनेके लिये अवतीर्ण हुए साक्षात् श्रीनारायण ही थे—'केशवं बादरायणम्'। यों तो वे स्वयं ही नारायण हैं; तिसपर भी उन्होंने बदरिकाश्रममें विविध प्रकारका तप किया है। उन्हींसे जिसका जन्म हुआ है, वे श्रीशुकदेवजी ही इस तत्त्वके वक्ता हैं। इससे सिद्ध होता है कि उनका कथन भी कोई साधारण बात नहीं है। महापुरुष कोई ग्राम्य-कथा नहीं कहा करते। उनके सामने तो ग्राम्य-कथाओंका विघात हो जाया करता है, किसी दूसरेको भी ऐसी बात कहनेका साहस नहीं होता, फिर वे स्वयं तो ऐसी बात कहेंगे ही क्यों? वे अवश्य किसी दिव्यातिदिव्य रहस्यका ही उद्घाटन करेंगे। यह तो रही वक्ताकी बात; उनके सिवा श्रोता भी कैसे हैं? महाराज परीक्षित् ! 'गर्भे दृष्टमनुध्यायन् परीक्षेत नरेष्विह ॥' (श्रीमद्भा० १। १२। ३०) अर्थात् जिन्होंने जन्म लेते ही इधर-उधर देखकर लोगोंमें यह परीक्षा करनी चाही थी कि जिस मनोमोहिनी मूर्तिको मैंने गर्भमें देखा था, वह यहाँ कहाँ है, जो गर्भमें ही भगवान्का दर्शन कर चुके थे। ध्रुवादिने साधनद्वारा योगमायाका निराकरण करके भगवत्तत्त्वका साक्षात्कार किया था, किंतु इन्हें तो भगवान्की अनुकम्पासे ही उनका दर्शन हो गया था। उनके वंशका महत्त्व भी सुस्पष्ट ही है। इस प्रकार जैसे भगवान् बादरायणि मातृमान्, पितृमान् और आचार्यवान् हैं, वैसे ही पार्थ-पौत्र महाराज परीक्षित् भी हैं। वे यद्यपि स्वभावसे ही तत्त्वज्ञ, शास्त्रज्ञ, ऐहिक, आमुष्मिक विषयोंसे विरक्त एवं सर्वान्तरतम प्रत्यगात्माका साक्षात्कार करनेके इच्छुक थे तथापि राजा होनेके कारण किसी शृंगाररसप्रधान कथाके श्रवणमें उनकी अभिरुचि होनी सम्भव थी। किंतु इस समय तो उन्हें अनिवार्य विप्र-शाप हो चुका था; इसलिये सात दिनमें उनकी मृत्यु निश्चित हो जानेके कारण वे परम उपरत हो गये थे। यदि साधारण मनुष्यको भी अपनी मृत्युका निश्चय हो जाय तो वह किसी ग्राम्य-कथाके श्रवणमें प्रवृत्त नहीं हो सकता; फिर महाभागवत महाराज परीक्षित्-जैसे सर्वसाधनसम्पन्न पुरुषोंकी प्रवृत्ति तो उसमें हो ही कैसे सकती है ? वस्तुतः श्रीमद्भागवत कोई साधारण ग्रन्थ नहीं है। श्रीशुकदेवजीका तो मिलना ही बहुत दुर्लभ था; फिर जिस ग्रन्थका वे वर्णन करें, उसका महत्त्व क्या कुछ साधारण हो सकता है ? जिस समय शौनकादि महर्षियोंने यह सुना कि इस ग्रन्थका वर्णन श्रीशुकदेवजीने किया है तो वे आश्चर्यचकित हो गये और बोले— तस्य पुत्रो महायोगी समदृङ्‌निर्विकल्पकः। एकान्तमतिरुन्निद्रो गूढो मूढ इवेयते ॥ (श्रीमद्भा० १।४।४) 'वे व्यासनन्दन तो महायोगी, समदर्शी, विकल्पशून्य, एकान्तमति और अविद्यारूप निद्रासे जगे हुए थे। वे तो प्रच्छन्नभावसे मूढवत् विचरते रहते

१७४ भक्तिसुधा थे। वे किस प्रकार इस बृहत् आख्यानका श्रवण करानेमें प्रवृत्त हो गये?' उनकी महिमाको द्योतित करनेवाला एक अन्य श्लोक भी है— यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव। पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु- स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि॥ (श्रीमद्भा० १।२।२) अर्थात् जिन्होंने उपनयनसंस्कारके लिये विधिवत् गुरूपसदन नहीं किया और जैसे-तैसे पिताके उपनयन- संस्कार कर देनेपर भी जो उपनयन-सम्बन्धी क्रियाकलापसे उपरत थे, उन शुकदेवजीको जाते देखकर उनके विरहसे आतुर होकर जिस समय 'हे पुत्र! हे पुत्र!', इस प्रकार पुकारते हुए श्रीव्यासजी उनके पीछे गये तो प्रत्येक वृक्षमेंसे जो 'पुत्र' शब्दकी प्रतिध्वनि आ रही थी, वह ऐसी जान पड़ती थी, मानो वृक्ष भी तन्मयभावसे 'पुत्र-पुत्र' चिल्ला रहे हैं। भगवान् शुकदेवजी परम तत्त्वज्ञ और महायोगी होनेके कारण सर्वभूतहृदय हैं। 'सर्वभूतानां हृत् अयते विजानाति।' जो सम्पूर्ण भूतोंके हृत् और उसके विचारोंको जानते हैं अथवा 'स सर्वभूतानां हृत् अयते नियमयति' जो समस्त प्राणियोंके हृत्का अयन—नियमन करते हैं, इन व्युत्पत्तियोंके अनुसार श्रीशुकदेवजी सर्वभूतहृदय हैं। उनके सिवा अन्य तत्त्वज्ञ भी यद्यपि अपने पारमार्थिक स्वरूपसे सर्वान्तरात्मा ही हैं तथापि दूसरेके चित्तके नियन्त्रणादिकी शक्ति बिना योगके नहीं हो सकती; इसीसे 'हृत् अयते नियमयति' यह दूसरी व्युत्पत्ति उनके महायोगित्वका परिचय देती है। उससे उनका परमतत्त्व और महायोगी होना सिद्ध होता है। इस प्रकार सबके हृदय होनेके कारण वे वृक्षोंके भी अन्तरात्मा हैं। अतः उस समय वृक्षोंसे 'पुत्र' शब्दकी जो प्रतिध्वनि हो रही थी, उससे जान पड़ता था कि वह वृक्षोंके द्वारा मानो स्वयं ही श्रीव्यासजीको 'पुत्र' कहकर सम्बोधन कर रहे थे। ऐसा करके वे उन्हें उपदेश कर रहे थे कि 'पिताजी! आप जो हमें पुत्र-पुत्र कहकर पुकार रहे हैं, यह आपका व्यामोह ही है। हमारा-आपका जो पिता- पुत्र-सम्बन्ध है, वह तात्त्विक नहीं है। कभी हम आपके पुत्र होते हैं तो कभी आप भी हमारे पुत्र हो जाते हैं; अतः आपको इस मायिक सम्बन्धके मोहमें न फँसना चाहिये।' उस समय एक दूसरी घटना भी हुई। उससे भी उनकी निर्विकार समदृष्टिका पता चलता है। उस घटनाका वर्णन इस श्लोकद्वारा किया गया है— दृष्ट्वानुयान्तमृषिमात्मजमप्यनग्नं देव्यो हिया परिदधुर्न सुतस्य चित्रम्। तद्वीक्ष्य पृच्छति मुनौ जगदुस्तवास्ति स्त्रीपुम्भिदा न तु सुतस्य विविक्तदृष्टेः॥ (श्रीमद्भा० १।४।५) श्रीशुकदेवजीके पीछे-पीछे भगवान् व्यास जा रहे थे। मार्गमें एक जलाशयपर कुछ देवांगनाएँ स्नान कर रही थीं। श्रीव्यासजी यद्यपि वस्त्र धारण किये हुए थे तथापि उन्हें देखकर उन अप्सराओंने लज्जावश अपने वस्त्र धारण कर लिये; किंतु बाल-योगी दिगम्बर-वेश शुकदेवजीको देखकर ऐसा नहीं किया। भगवान् शुकदेवजी परम सुन्दर थे। वे श्यामवर्ण होनेके कारण साक्षात् आनन्दकन्द भगवान् कृष्णचन्द्रके समान मनोमोहक थे। उनकी मनोहर मूर्तिको देखकर कुल-कामिनियोंके अन्तःकरणोंमें भी क्षोभ हो जाता था तथा बहुत-से बालक उनके पीछे लगे रहते थे। ऐसे होनेपर भी उन्हें देखकर देवांगनाओंने वस्त्र धारण नहीं किये, किंतु वृद्ध और विकलेन्द्रिय व्यासजीको देखकर बड़ी फुर्तीसे वस्त्र पहन लिये। यह देखकर जब व्यासजीने उनसे इसका कारण पूछा तो वे कहने लगीं—'महाराज! आपको तो स्त्री- पुरुषका भेद है, किंतु आपके पवित्र-दृष्टि पुत्रको ऐसा कोई भेद नहीं है। इसका आत्मभाव शुद्ध परब्रह्ममें सुस्थिर है, दृश्यपर तो इसकी दृष्टि ही नहीं

श्रीरासलीलारहस्य १७५ है। हमलोग अप्सराएँ हैं। हमसे लोगोंकी मनोवृत्ति छिपी नहीं रह सकती। महर्षियोंकी तपस्या भंग करनेके लिये ही हमारी नियुक्ति की जाती है। अतः 'ताँत बाजी और राग बूझा', हम महर्षियोंको देखते ही उनके हृदयको परख लेती हैं।' वस्तुतः दृश्य-संसर्ग ही दृष्टिके मालिन्यका हेतु है। जहाँ वह दृश्य-संसर्गसे निवृत्त हुई कि उसका मालिन्य भी निर्मूल हो गया। ऐसी स्थिति प्राप्त होते ही परब्रह्मका साक्षात्कार हो जाता है। यही स्थिति श्रीशुकदेवजीकी थी। भला जो गोदोहन-वेलासे अधिक कहीं खड़े नहीं होते थे, उन श्रीशुकदेवजीने किस प्रकार श्रीमद्भागवत सुनायी ? ऐसी शंका होनेपर श्रीसूतजीने कहा—यह महाराज परीक्षित्का सौभाग्य ही था। स गोदोहनवेलां वै गृहेषु गृहमेधिनाम्। अवेक्षते महाभागस्तीर्थीकुर्वंस्तदाश्रमम्॥ यहाँ एक दूसरी शंका भी हो सकती है। महाभारतके कथनानुसार श्रीशुकदेवजी अपने तपके प्रभावसे ब्रह्मभावापन्न हो गये थे। उन्हें बाह्य प्रपंचका अनुसन्धान भी नहीं रहा था। फिर इस महासंहिताके स्वाध्यायमें उनकी किस प्रकार प्रवृत्ति हुई ? इसका उत्तर श्रीसूतजी महाराजने इस प्रकार दिया है— हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणिः। अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः ॥ (श्रीमद्भा० १।७।११) सूतजी कहते हैं—ठीक है, यद्यपि श्रीशुकदेवजी ऐसे ही निर्विशेष परब्रह्ममें परिनिष्ठित थे, शास्तृ, शिष्य आदि सम्बन्धोंमें उनकी प्रवृत्ति होनी सर्वथा असम्भव थी तथापि उन्हें एक व्यसन था। उससे आकृष्ट होकर ही उन्होंने इस महान् आख्यानका अध्ययन किया था। व्याससूनू भगवान् शुकदेवजीकी बुद्धि श्रीहरिके गुणोंसे आक्षिप्त थी, वह हरिगुणगानकी मनोमोहिनी माधुरीमें फँसी हुई थी। 'हरते इति हरिः' जो बड़े-बड़े योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंके मनको भी हर लेते हैं, उन दिव्य मंगलमूर्ति भगवान्‌का नाम ही 'श्रीहरि' है। भगवान्‌के परम दिव्य नाम, गुण, चरित्र एवं स्वरूप ऐसे ही मधुर हैं। उन्हींके गुणोंने श्रीशुकदेवजीके शुद्धब्रह्माकारवृत्तिसम्पन्न मनको भी हठात् अपनी ओर आकर्षित कर लिया था। इसीसे उन्होंने इस बृहत् संहिताका स्वाध्याय किया था। अहा! उन श्रीव्यासनन्दनकी हरिभक्तिप्रवणताका कहाँतक वर्णन किया जाय ? यद्यपि निरन्तर आत्मसुखमें विश्रान्त रहनेके कारण उनकी मनोवृत्ति किसी दूसरी ओर नहीं जाती थी; उनके हृदयसे द्वैतप्रपंचका सर्वथा तिरोभाव हो गया था; तथापि परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रकी ललित लीलाओंने उन्हें अपनी ओर आकृष्ट कर ही लिया। इसीसे उन्होंने भगवल्लीलाके निगूढ़तम रहस्यभूत इस महाग्रन्थका आविर्भाव किया। स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावो- ऽप्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम् । व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ॥ (श्रीमद्भा० १२।१२।६८) 'स्वसुखनिभृतचेताः' स्वानन्दसे ही पूर्ण है चित्त जिनका, यद्यपि प्राणियोंका चित्त विषयोंसे पूर्ण देखा जाता है तथापि स्वभावतः वह आत्मानन्दसे ही पूर्ण है। जिस प्रकार घटकी आकाशद्वारा स्वाभाविक पूर्णता जलादिद्वारा होनेवाली अस्वाभाविक पूर्णतासे निवृत्त-सी हो जाती है, उसी प्रकार चित्तकी स्वाभाविक ब्रह्माकाराकारिता उसकी अस्वाभाविक विषयाकारा- कारितासे निवृत्त हुई-सी जान पड़ती है। किंतु श्रीशुकदेवजीका चित्त तो विषयव्यामोहसे निवृत्त होकर आत्मानन्दमें ही विश्रान्त हो गया था। इसीसे उन्हें 'स्वसुखनिभृतचेताः' कहा है। इस प्रकार 'तद्व्युदस्तान्यभावः' आत्मानन्दमें विश्रान्त होनेके कारण अन्य पदार्थोंसे जिनकी सत्यत्वबुद्धि निवृत्त हो गयी है, ऐसे जिन शुकदेवजीने 'अजितरुचिर- लीलाकृष्टसारः' जिनकी ब्रह्माकारवृत्तिकी निश्चलता भगवान् अजितकी रुचिर लीलासे अपहृत हो गयी है;

१७६ भक्तिसुधा ऐसे होकर कृपावश इस तत्त्वप्रदर्शक पुराणका विस्तार किया, उन निखिलपापापहारी श्रीव्यासनन्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। यद्यपि ऐसे महानुभावोंकी प्रवृत्ति ग्रन्थाध्ययनमें नहीं हुआ करती तथापि भगवल्लीलाओंसे आकृष्टचित्त होनेके कारण ही उन्होंने इस महासंहिताका अध्ययन किया था। परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया। गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ (श्रीमद्भा० २।१।९) इस सम्बन्धमें एक इतिहास भी प्रसिद्ध है। एक बार श्रीशुकदेवजी संसारसे उपरत होकर वनमें चले गये और वहाँ ध्यानाभ्यासमें तत्पर होकर समाधिस्थ हो गये। उनकी बुद्धिवृत्ति निखिल दृश्यप्रपंचका निरासकर अशेष-विशेष-शून्य शुद्ध बुद्ध मुक्त परब्रह्ममें लीन हो गयी और उन्हें बाह्य जगत्का कुछ भी भान न रहा। इसी समय भगवान् व्यासदेवके कुछ शिष्यगण उधर आ निकले। उन्होंने उन बालयोगीन्द्रको देखकर कुतूहलवश श्रीव्यासजीसे जाकर कहा कि भगवन्! हमने वनमें एक परम सुन्दर बालकको देखा है। वह बहुत दिनोंसे पाषाण-प्रतिमाके समान निश्चल भावसे एक ही आसनसे बैठा हुआ है। उसे बाह्य जगत्का कुछ भी भान होता नहीं जान पड़ता। तब भगवान् व्यासदेवने सारी परिस्थिति समझकर उन्हें एक श्लोक कण्ठ कराया और कहा कि तुम उस बालयोगीके पास जाकर इसे सुमधुर ध्वनिसे गाया करो। तदनन्तर शिष्यगण वनमें जाकर इस श्लोकका गान करने लगे— बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै- र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।५) शिष्योंके निरन्तर गान करनेसे भगवान् शुकदेवजीके अन्तःकरणमें इस श्लोकके अर्थकी स्फूर्ति हुई। यह नियम है कि जितना ही चित्त शुद्ध होगा, उतना ही शीघ्रतर उसमें भगवत्तत्त्वका अनुभव होगा। इसीसे किन्हीं-किन्हीं उत्तम अधिकारियोंको, जिनकी उपासना पूर्ण हो चुकी होती है, महावाक्यका श्रवण करते ही स्वरूप-साक्षात्कार हो जाता है। उस श्लोकार्थकी स्फूर्ति होनेपर भगवद्विग्रहकी अनुपम रूपमाधुरीने उनके चित्तको क्षुभित कर दिया। उनकी समाधि खुल गयी और उन्होंने श्रीश्यामसुन्दरकी स्वरूपमाधुरीका वर्णन करनेवाले इस श्लोकको कई बार उन बालकोंसे कहलाया और कितनी ही बार आनन्दविभोर होकर स्वयं भी कहा। शिष्योंने भगवान् व्यासदेवके पास उन्हें यह सारा वृत्तान्त सुनाया। श्रीव्यासजी सोचने लगे कि इसे सुनकर भी वह आया क्यों नहीं! जब उन्होंने ध्यानस्थ होकर इसके कारणका अन्वेषण किया, तब उन्हें मालूम हुआ कि उसे यह सन्देह है कि जिसका सौन्दर्य-माधुर्य ऐसा विलक्षण है, वह मेरे-जैसे अकिंचन पुरुषसे स्नेह क्यों करेगा? तब व्यासजीने इस शंकाकी निवृत्ति करनेके लिये भगवान्की दयालुताको प्रकट करनेवाला यह श्लोक उन बालकोंको पढ़ाया और पूर्ववत् उन्हें श्रीशुकदेवजीके पास जाकर इसे गानेका आदेश किया— अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी । लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम ॥ (श्रीमद्भा० ३।२।२३) इस श्लोकको सुनकर श्रीशुकदेवजीको आश्वासन हुआ और उन्होंने बालकोंसे पूछा कि तुमने यह श्लोक कहाँसे याद किया है? बालकोंने कहा— 'हमारे गुरुदेव श्रीव्यासभगवान्ने एक अष्टादश सहस्र श्लोकोंकी महासंहिता रची है। ये श्लोक उसीके हैं।' यह सुनकर वे भगवान् व्यासदेवके पास आये और उनसे उस महाग्रन्थका अध्ययन किया। अध्ययन करनेमें एक दूसरा हेतु और भी था। 'नित्यं विष्णुजन-

प्रियः' (श्रीमद्भा० १।७।११) भगवान् शुकदेवजीको सर्वदा विष्णुभक्तोंका संग प्रिय था। श्रीमद्भागवत वैष्णवोंका परमधन है। अतः इसके कारण उन्हें सदा ही वैष्णवोंका सहवास प्राप्त होता रहेगा, इस लोभसे भी उन्होंने उसका अध्ययन किया। इससे शौनकजीके प्रश्नका उत्तर हो जाता है। वे हरिगुणाक्षिप्तमति थे, इसीलिये आत्माराम होनेपर भी उन्होंने इस महासंहिताका अध्ययन किया। वस्तुतः भगवान्‌के गुणगण ही ऐसे हैं— आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) यहाँ 'निर्ग्रन्थाः' इस पदके दो अभिप्राय हैं— (१) 'निर्गता ग्रन्थयो येभ्यस्ते' अर्थात् ब्रह्ममें परिनिष्ठित होनेके कारण जो आत्मानात्मसम्बन्धी ग्रन्थियोंसे मुक्त हो गये हों, वे निर्ग्रन्थ हैं। अथवा (२) 'निर्गता ग्रन्था येभ्यस्ते' परब्रह्ममें परिनिष्ठित होनेके कारण जिनका ग्रन्थावलोकन छूट गया हो। वास्तवमें योगकी सिद्धि तो होती ही उस समय है, जिस समय कि शास्त्रोक्त विविध वादोंसे विचलित हुई बुद्धि उन सब विवादोंसे ऊपर उठकर निश्चल भावसे एक तत्त्वमें स्थित हो जाय। श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥ (गीता २।५३) जिस समय बुद्धि मोहातीत हो जाती है, उस समय वह श्रोतव्य और श्रुतसे उपरत हो जाती है; फिर तो एकमात्र ब्रह्मवीथीमें ही उसका विचरण हुआ करता है। श्रीभगवान् कहते हैं— यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥ (गीता २।५२) श्रीविद्यारण्यस्वामी तो ऐसी अवस्थामें शास्त्र- संन्यासकी व्यवस्था भी करते हैं— शास्त्राण्यधीत्य मेधावी अभ्यस्य च पुनः पुनः। परमं ब्रह्म विज्ञाय उल्कावत्तान्यथोत्सृजेत्॥ भगवती श्रुति भी कहती है— 'तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथ***।' (मु० उ० २।२।५) यहाँ यह विरोध प्रतीत होता है कि जब श्रुति- स्मृति और आचार्य सभीका यह मत है कि स्वरूप- साक्षात्कार होनेके पश्चात् शास्त्राभ्यासमें प्रवृत्ति नहीं होती और होनी भी नहीं चाहिये तो श्रीशुकदेवजीकी इस महाग्रन्थके अध्ययनमें कैसे प्रवृत्ति हुई? इसका एकमात्र हेतु, जैसा कि हम ऊपर कह चुके हैं, यही था कि वे हरिगुणाक्षिप्तमति थे। वे यद्यपि स्वयं उसमें प्रवृत्त नहीं हुए थे तथापि भगवान्‌के गुणोंकी मधुरिमाने उन्हें स्वयं उस ओर खींच लिया था। वेदान्तसिद्धान्तमें भी यह युक्तियुक्त ही है। इस विषयमें आचार्योंका ऐसा मत है कि जिस समय ब्रह्मज्ञान होता है, उस समय आवरण नष्ट हो जाता है, किंतु प्रारब्धभोगोपयोगी विक्षेप तो बना ही रहता है। ब्रह्मज्ञानसे केवल मूलाविद्याका नाश होता है, लेशाविद्या तब भी रह जाती है। उसकी निवृत्ति प्रारब्धक्षय होनेपर होती है। इसीसे श्रीनारद, सनकादि, शुकदेव और वसिष्ठादि परमसिद्ध ब्रह्मनिष्ठ महात्माओंकी लोकमें भी नाना प्रकारकी चेष्टाएँ देखी जाती हैं। जिस प्रकार परम ब्रह्मनिष्ठ होनेपर भी श्रीनारदजीको हरिनाम-संकीर्तन और सनकादिको हरिगुणगानका व्यसन था, उसी प्रकार श्रीशुकदेवजीको भी हरिकथामृतके पानका व्यसन था। जिस प्रकार स्वरूपानुभव हो जानेपर भी प्रारब्धभोगके लिये इन्द्रियोंकी विषयोंमें प्रवृत्ति होती है, उसी प्रकार हरिगुणगानमें भी प्रीति हो ही सकती है। वस्तुतः भगवान्‌में आत्माराम-चित्ताकर्षकत्व एक गुण है। उसीसे आकृष्ट होकर भगवान् शुकदेवजीने इस शास्त्रका अध्ययन किया था। इससे सिद्ध हुआ कि ऐसे पूर्ण परब्रह्ममें परिनिष्ठित महामुनि शुकदेवजीकी इस कारणसे इस

भागवत-शास्त्रके अध्ययनमें प्रवृत्ति हुई तथा इसके वर्णनमें इसलिये भी प्रवृत्ति हुई कि जिससे विष्णुजन स्वयं ही आकर उन्हें मिल जाया करें। इस भागवत- शास्त्रमें भगवान्‌का दिव्यातिदिव्य रहस्य निहित है; अतः जिस प्रकार वशीकरणमन्त्रसे लोगोंको अपने अधीन कर लिया जाता है, उसी प्रकार इस परम मन्त्रके कारण भक्तजन स्वयं ही आकृष्ट हो जाते हैं। इसके सिवा भगवान्‌के गुण, चरित्र और स्वरूपकी माधुरी स्वयं भी ऐसी मोहिनी है कि बड़े-बड़े सिद्ध- मुनीन्द्र भी उनके कीर्तनमें प्रवृत्त हो जाया करते हैं। भाष्यकार भगवान् शंकराचार्यने नृसिंहतापिन्युपनिषद्के भाष्यमें कहा है— 'मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा तं भजन्ते।' अर्थात् मुक्तजन भी लीलासे देह धारणकर भगवान्‌का गुणगान किया करते हैं। यही बात सनकादिके विषयमें भी कही जा सकती है। भक्तोंके लिये तो एकमात्र श्रीहरिश्रवण ही परमावलम्ब है जिस समय महाराज परीक्षित् गंगातटपर आकर बैठे, उस समय बहुतसे ऋषि, मुनि, सिद्ध एवं योगीन्द्रगण उनके पास आये। उन सबसे उन्होंने यही प्रश्न किया कि 'भगवन्! मैं मरणासन्न हूँ; अतः मुमूर्षु पुरुषके लिये जो एकमात्र कर्तव्य हो, वह मुझे बतलाइये।' इस विषयमें उस मुनीन्द्र-मण्डलीमें विचार हो रहा था; भिन्न-भिन्न महानुभाव अपने भिन्न- भिन्न मत प्रकट कर रहे थे; अभी कुछ निश्चय नहीं हो पाया था कि इतनेमें ही शुकदेवजी आ गये। उनसे भी यही प्रश्न हुआ। राजाने पूछा—'भगवन्! अब मेरी मृत्युमें केवल सात दिन शेष हैं; अतः कोई ऐसा कृत्य बतलाइये, जिसके करनेसे मैं धीरोंकी प्राप्तव्य गतिको प्राप्त कर सकूँ।' तब श्रीशुकदेवजी बोले—'राजन्! अन्य अनात्मज्ञ लोगोंके लिये तो सहस्रों साधन हैं, परंतु भक्तोंके लिये तो एकमात्र श्रीहरिश्रवण ही परमावलम्ब है।' इसके तीन भेद हैं—श्रीहरिका स्वरूपश्रवण, गुणश्रवण और नामश्रवण। इसी प्रकार श्रीहरि-कीर्तन भी तीन प्रकारका है—स्वरूपकीर्तन, गुणकीर्तन और नामकीर्तन। उपनिषदादिसे भगवान्‌का स्वरूपकीर्तन होता है, इतिहास-पुराणादिसे रूप-गुण-कीर्तन होता है और विष्णुसहस्रनामादिसे नामकीर्तन होता है। कर्मकाण्ड भी भगवान्‌का ही स्वरूप है— 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।' (यजु० ३१।१६) कर्म ही क्या, यह सारा प्रपंच एकमात्र भगवान् ही तो है; भूत, भविष्यत्, वर्तमान जो कुछ है