भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 183, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य १७३ 'बदराणां समूहो बादरं नरनारायणाश्रमोऽयन- माश्रयो यस्य स बादरायणः तस्यापत्यं बादरायणिः।' 'बदर' बेरको कहते हैं, यहाँ उससे नरनारायणाश्रम उपलक्षित है। वही जिनका अयन-आश्रय-निवास- स्थान अर्थात् तपोभूमि है, वे भगवान् व्यासजी ही बादरायण हैं। उन्हींके पुत्र श्रीबादरायणि हैं। यहाँ भगवान् शुकदेवजीको जो 'बादरायणि' कहा गया है। उसका तात्पर्य यही है कि उनका महत्त्व अपने व्यक्तित्वके कारण ही नहीं है, बल्कि पिता और पिताकी निवासभूमिसे भी उनकी पवित्रता द्योतित होती है अर्थात् भगवान् श्रीशुकदेवजी स्वयं ही पवित्र हों, ऐसी बात नहीं है, उन्हें तो उनके पिताने परम- पवित्र बदरिकाश्रममें तप करके उस तपके फलस्वरूप ही प्राप्त किया था। बदरिकाश्रम ज्ञानभूमि है; अतः वहाँ जो तप होगा, वह भी अत्यन्त विलक्षण ही होगा। उसके फलस्वरूप श्रीभगवान् या भगवान्के परमान्तरंग निकुंजमन्दिरस्थ लीलाशुक ही श्रीशुकदेवरूपमें प्रादुर्भूत हुए हैं। भगवान् व्यासजीमें भी केवल तपसे ही तेज आया हो—ऐसी बात नहीं है, वे तो वेदार्थका निरूपण करनेके लिये अवतीर्ण हुए साक्षात् श्रीनारायण ही थे—'केशवं बादरायणम्'। यों तो वे स्वयं ही नारायण हैं; तिसपर भी उन्होंने बदरिकाश्रममें विविध प्रकारका तप किया है। उन्हींसे जिसका जन्म हुआ है, वे श्रीशुकदेवजी ही इस तत्त्वके वक्ता हैं। इससे सिद्ध होता है कि उनका कथन भी कोई साधारण बात नहीं है। महापुरुष कोई ग्राम्य-कथा नहीं कहा करते। उनके सामने तो ग्राम्य-कथाओंका विघात हो जाया करता है, किसी दूसरेको भी ऐसी बात कहनेका साहस नहीं होता, फिर वे स्वयं तो ऐसी बात कहेंगे ही क्यों? वे अवश्य किसी दिव्यातिदिव्य रहस्यका ही उद्घाटन करेंगे। यह तो रही वक्ताकी बात; उनके सिवा श्रोता भी कैसे हैं? महाराज परीक्षित् ! 'गर्भे दृष्टमनुध्यायन् परीक्षेत नरेष्विह ॥' (श्रीमद्भा० १। १२। ३०) अर्थात् जिन्होंने जन्म लेते ही इधर-उधर देखकर लोगोंमें यह परीक्षा करनी चाही थी कि जिस मनोमोहिनी मूर्तिको मैंने गर्भमें देखा था, वह यहाँ कहाँ है, जो गर्भमें ही भगवान्का दर्शन कर चुके थे। ध्रुवादिने साधनद्वारा योगमायाका निराकरण करके भगवत्तत्त्वका साक्षात्कार किया था, किंतु इन्हें तो भगवान्की अनुकम्पासे ही उनका दर्शन हो गया था। उनके वंशका महत्त्व भी सुस्पष्ट ही है। इस प्रकार जैसे भगवान् बादरायणि मातृमान्, पितृमान् और आचार्यवान् हैं, वैसे ही पार्थ-पौत्र महाराज परीक्षित् भी हैं। वे यद्यपि स्वभावसे ही तत्त्वज्ञ, शास्त्रज्ञ, ऐहिक, आमुष्मिक विषयोंसे विरक्त एवं सर्वान्तरतम प्रत्यगात्माका साक्षात्कार करनेके इच्छुक थे तथापि राजा होनेके कारण किसी शृंगाररसप्रधान कथाके श्रवणमें उनकी अभिरुचि होनी सम्भव थी। किंतु इस समय तो उन्हें अनिवार्य विप्र-शाप हो चुका था; इसलिये सात दिनमें उनकी मृत्यु निश्चित हो जानेके कारण वे परम उपरत हो गये थे। यदि साधारण मनुष्यको भी अपनी मृत्युका निश्चय हो जाय तो वह किसी ग्राम्य-कथाके श्रवणमें प्रवृत्त नहीं हो सकता; फिर महाभागवत महाराज परीक्षित्-जैसे सर्वसाधनसम्पन्न पुरुषोंकी प्रवृत्ति तो उसमें हो ही कैसे सकती है ? वस्तुतः श्रीमद्भागवत कोई साधारण ग्रन्थ नहीं है। श्रीशुकदेवजीका तो मिलना ही बहुत दुर्लभ था; फिर जिस ग्रन्थका वे वर्णन करें, उसका महत्त्व क्या कुछ साधारण हो सकता है ? जिस समय शौनकादि महर्षियोंने यह सुना कि इस ग्रन्थका वर्णन श्रीशुकदेवजीने किया है तो वे आश्चर्यचकित हो गये और बोले— तस्य पुत्रो महायोगी समदृङ्निर्विकल्पकः। एकान्तमतिरुन्निद्रो गूढो मूढ इवेयते ॥ (श्रीमद्भा० १।४।४) 'वे व्यासनन्दन तो महायोगी, समदर्शी, विकल्पशून्य, एकान्तमति और अविद्यारूप निद्रासे जगे हुए थे। वे तो प्रच्छन्नभावसे मूढवत् विचरते रहते