भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 182

१७२ भक्तिसुधा वेदार्थ-विरोधकी निवृत्तिमें सूर्यके ही समान है। अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां सर्वोपनिषदामपि। गायत्रीभाष्यभूतोऽसौ ग्रन्थोऽष्टादशसंज्ञितः ॥ अर्थात् यह श्रीमद्भागवतपुराण ब्रह्मसूत्र और समस्त उपनिषदोंका तात्पर्य है तथा यह अष्टादशसंज्ञक ग्रन्थ गायत्रीका भाष्यस्वरूप है। प्राचीन आर्षग्रन्थोंमें श्रीमद्भागवत एक अत्यन्त देदीप्यमान उज्ज्वल ग्रन्थरत्न है। इसके दशम और एकादश स्कन्धोंमें परमानन्दघन लीलापुरुषोत्तम भगवान् कृष्णचन्द्रकी दिव्यातिदिव्य लीलाओंका वर्णन है। लीलाविहारी श्रीश्यामसुन्दर सर्वथा रसमय हैं। उनकी कोटि-कोटि कन्दर्प-कमनीय मनोहर मूर्ति भावुक भक्तोंके लिये जैसी मनोमोहिनी है, वैसी ही उनकी लीलाएँ भी हैं। यों तो भगवान्‌की सभी लीलाएँ लोकोत्तर आनन्दातिरेकका संचार करनेवाली हैं तथापि उनकी व्रजलीलाएँ तो महाभाग भक्तों एवं कविपुंगवोंका सर्वस्व ही हैं। उनमें भी, जिसका आविर्भाव एकमात्र रसाभिव्यक्तिके लिये ही हुआ था, वह महारास तो मानो सर्वथा माधुर्यका ही विलास था। प्रभुकी रासक्रीड़ा जैसी मधुर है, वैसी ही रहस्यमयी भी है। उसके भीतर जो गुह्यातिगुह्य रहस्य निहित है, वह आपाततः दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। वह इतना गूढ़ है कि उसमें जितना प्रवेश किया जाता है, उतना ही अधिकाधिक दुरवगाह्य प्रतीत होता है। हम यथामति उसका विचार करनेका प्रयत्न करते हैं। इस रासलीलाका वर्णन श्रीमद्भागवत दशम स्कन्धके अध्याय उनतीससे तैंतीसतक है। ये पाँच अध्याय 'रासपंचाध्यायी' के नामसे सुप्रसिद्ध हैं। ये श्रीमद्भागवतरूप कलेवरके मानो पाँच प्राण हैं अथवा यदि इन्हें श्रीमद्भागवतका हृदय कहा जाय तो भी अयुक्त न होगा। रासपंचाध्यायीके आरम्भमें 'श्रीबादरायणि- रुवाच' ऐसा पाठ है। इस पाठका भी एक विशेष अभिप्राय है। यहाँ 'बादरायणिः' शब्दसे वक्ताका महत्त्व द्योतितकर उसके द्वारा प्रतिपादन किये जानेवाले विषयकी महत्ता प्रदर्शित की गयी है। लौकिक नीतियोंके विषयमें तो प्रायः इस बातपर ध्यान नहीं दिया जाता कि उनका वक्ता कौन है; वहाँ केवल उस उक्तिकी महत्ताका ही विचार किया जाता है। 'ननु वक्तृविशेषनिःस्पृहा गुणगृह्या वचने विपश्चितः।' किंतु धार्मिक अंशोंमें यह नियम नहीं है। वहाँ तो वक्ताकी योग्यताका विचार सबसे पहले किया जाता है। जिस प्रकार गायत्री मन्त्र है, उसका अर्थ किसी भी भाषामें कितने ही सुन्दर ढंगसे कर दिया जाय तथापि जापककी उसमें श्रद्धा नहीं हो सकती और न मूल गायत्रीके जपसे होनेवाला महान् फल ही उससे प्राप्त हो सकता है। अतः धर्मके विषयमें मनुष्यको 'वक्तृविशेष-सस्पृह' होनेकी आवश्यकता है। यहाँ वक्ताके कथनकी अपेक्षा उसके व्यक्तित्वका प्रामाण्य ही अधिक अपेक्षित है। यदि देखा जाय तो लौकिक विषयोंमें भी यही नियम अधिक काम कर रहा है। हमें एक साधारण पुरुषकी ऊँची-से-ऊँची बात उतनी मूल्यवान् नहीं जान पड़ती, जितनी कि किसी गण्यमान्य व्यक्तिकी साधारण-सी बात जान पड़ती है। जिस पुरुषके प्रति हमारी श्रद्धा है, उसकी बहुत मामूली बातपर भी हम बहुत ध्यान देते हैं। इससे निश्चय होता है कि लौकिक विषयोंमें यद्यपि प्रायः 'वक्तृविशेषनिःस्पृहता' होती है; वहाँ बालकसे भी शुभ ज्ञान ग्रहण करने चाहिये—यही नीति काम करती है तथापि सर्वांशमें नहीं। कभी-कभी वक्ताकी आप्तताका मूल्य वहाँ भी बढ़ जाता है। यही बात वेदके विषयमें है। वेद बहुत युक्ति- युक्त अर्थको कहता है, इसीलिये वह माननीय हो— ऐसी बात नहीं है; बल्कि बात तो ऐसी है कि वेदका कथन होनेके कारण ही वेदार्थ माननीय है। चोर अच्छी बात कहे, तब भी उसमें आस्था नहीं हो सकती। अब हम प्रकृत विषयपर आते हैं। रासपंचाध्यायीके वक्ता श्रीबादरायणि हैं।