भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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रहते हैं। यहाँ प्रिया-प्रियतमका सार्वदिक् सर्वांगीण सम्पयोगका भान भी सर्वदा ही रहता है। जैसे कि सन्निपातज्वरसे आक्रान्त पुरुष जिस समय शीतल मधुर जलका पान करता है; ठीक उसी समयमें पूर्ण तीव्र पिपासाका भी अनुभव करता है, वैसे ही नित्य निकुंज-धाममें जिस समय प्रिया-प्रियतम पारस्परिक परिरम्भणजन्य रसमें निमग्न होते हैं, उसी कालमें तीव्रातितीव्र वियोग-जन्य तापका भी अनुभव करते हैं। सारस-पत्नी लक्ष्मणा केवल सम्प्रयोगजन्य रसका ही अनुभव करती है और चक्रवाकी विप्रयोगजन्य तीव्र-तापके अनन्तर सहृदय-हृदय-वेद्य सम्प्रयोगजन्य अनुपम रसका आस्वादन करती है; परंतु वह भी विप्रयोग- कालमें सम्प्रयोगजन्य रसास्वादनसे वंचित रहती है; किंतु नित्य-निकुंजमें श्रीनिकुंजेश्वरीको अपने प्रियतम परमप्रेमास्पद श्रीब्रजराजकिशोरके साथ सारस-पत्नी लक्ष्मणाकी अपेक्षा शतकोटि-गुणित दिव्य सम्प्रयोग- जन्य रसकी अनुभूति होती है और साथ ही चक्रवाकीकी अपेक्षा शतकोटि-गुणित अधिक विप्रयोगजन्य तीव्र तापके अनुभवके अनन्तर पुनः दिव्य रसकी भी अनुभूति होती है। ऐसे ही विषयमें भावुकोंने कहा है— मिलेइ रहें मानों कबहुँ मिले ना। —जैसे भावुकोंके भावना-राज्यवाले शून्य निकुंजमें ही प्रियतम संकेतित समयमें पधारते हैं, किसी अन्यके सान्निध्यमें नहीं, वैसे ही वेदान्तियोंके यहाँ भी भगवान्‌से व्यतिरिक्त जो सब दृश्यपदार्थ हैं, उनके संसर्गसे शून्य निर्वृत्तिक और निर्मल अन्तःकरणमें ही 'तत्पदार्थ' का प्राकट्य होता है। जैसे सर्व-व्यापारोंसे रहित होकर पूर्ण प्रतीक्षा ही प्रियतमके संगमका असाधारण हेतु है, वैसे ही वेदान्तियोंके यहाँ भी पूर्ण प्रतीक्षा अर्थात् कायिकी, मानसी आदि सर्व चेष्टाओंके निरोध होनेपर ही 'त्वं पदार्थ' को 'तत्पदार्थ' का संगम प्राप्त होता है। सर्व दृश्य-संसर्गशून्य निर्वृत्तिक निर्मल अन्तःकरणरूप निकुंजमें पूर्ण प्रतीक्षापरायण व्रजांगना-भावापन्न 'त्वं पदार्थ' श्रीकृष्णस्वरूप 'तत्पदार्थ' के साथ यथेष्ट तादात्म्य सम्बन्ध प्राप्त करता है। यही संक्षेपमें व्रजधामतत्त्व तथा उसका रहस्य है। श्रीरासलीलारहस्य श्रीरासपञ्चाध्यायीके वक्ता व्यास-पुत्र महाज्ञानी श्रीशुकदेवजी और श्रोता गर्भज्ञानी श्रीपरीक्षित्जीका माहात्म्य इस अपार संसार-समुद्रमें जिन लोगोंके मन निरन्तर गोते लगा रहे हैं, उन्हें सब प्रकारके दुःखोंसे मुक्तकर अपने परमानन्दमय स्वरूपकी प्राप्ति करानेके लिये अहैतुककरुणामय दीनवत्सल श्रीभगवान् ही स्वयं धर्मावबोधक वेदरूपमें अवतीर्ण होते हैं। जिस समय कालक्रमसे सर्वसाधारणके लिये वेदका तात्पर्य दुर्बोध हो जाता है, उस समय श्रीहरि ही पुराणादिरूपमें आविर्भूत होते हैं। पुराणोंका मुख्य प्रयोजन वेदार्थका निरूपण करना ही है। किंतु यह सब रहते हुए भी परस्पर मतभेद रहनेके कारण वेदार्थ-सम्बन्धी विरोधका निराकरण भगवान्‌की उपासनाके द्वारा शुद्ध हुए अन्तःकरणसे ही हो सकता है। जिन लोगोंकी विवेकदृष्टि पारस्परिक विवादके कारण नष्ट हो गयी है, उन्हें वेदार्थका बोध कराकर परम कल्याणकी प्राप्ति करानेके लिये ही श्रीमद्भागवतका प्रादुर्भाव हुआ है, जैसा कि कहा है— कृष्णे स्वधामोपगते धर्मज्ञानादिभिः सह ॥ कलौ नष्टदृशामेष पुराणार्कोऽधुनोदितः । (श्रीमद्भा० १।३।४३-४४) अर्थात् धर्म एवं ज्ञानादिके सहित भगवान्‌के स्वधाम सिधारनेपर जिन मनुष्योंकी दृष्टि कलियुगके कारण नष्ट हो गयी है, उनके लिये इस समय इस पुराणरूप सूर्यका उदय हुआ है। वस्तुतः यह ग्रन्थ